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नवसृजन की क्षमता केवल महिला में

By Raj Express | Publish Date: 3/8/2017 12:36:34 PM
नवसृजन की क्षमता केवल महिला में

समस्त ब्रह्मांड में नवसृजन क्षमता केवल महिला अथवा मादा को ही है। इसीलिए नारी को सृजन की देवी कहा गया है। मनुष्य के सारे रिश्ते जन्म से शुरू होते हैं परंतु एक मां का शिशु से रिश्ता जन्म से भी 9 माह पहले शुरु हो जाता है। इसीलिए एक बच्चे को मां से बेहतर कोई नहीं समझ सकता। नारी की सहजता सहनशीलता उसकी कमजोरी नहीं नहीं है बल्कि उसकी शक्ति भी यही है वह दर्द भी सहती है चुप भी रहती है। अवहेलना पर तड़प भी उठती है उपेक्षा व अनादर के भाव भी पढ़ लेती है। फिर भी कुछ नहीं कहती इसलिए नहीं कि वह असमर्थ है।  क्योंकि उसकी सामथ्र्य क्षमता तुम से कहीं अधिक है। वह रिश्ता निभाना जानती है अपना बनाना जानती है। हर कमी को अपनाकर रिश्तो को बांधना जानती है नारी प्रत्येक क्षण परिवार के लिए त्याग के लिए तत्पर रहती है। आधुनिक युग में नारी दोहरी भूमिका निभाती है ऑफिस में वह परिपक्व बॉस होती है, तो घर में समर्पित पत्नी और बच्चों के साथ एक चिंतित मां जो हर पल सजग रहकर बच्चे की भविष्य की चिंता करती है। जीवन के हर रास्ते पर निडर होकर चलती है। पति की मृत्यु होने पर संघर्ष करके बच्चों को पालने वाली कितनी ही वीरांगनाएं मिल जाती है। बेगम हजरत महल ने नवाब वाजिद अली शाह की मृत्यु के पश्चात सत्ता की कमान अपने हाथ में लेकर अपने पुत्र को राजगद्दी पर आसीन किया था। नारी की इसी क्षमता के कारण नारी को नारायणी कहा गया है। राम प्रसाद विस्मिल की माता मूलमती थी। उन्होंने अपने पुत्र की फांसी के समय उनका हौसला बढ़ाते हुए कहा मुझे तुम पर गर्व है। नारी हर रूप में सफल हो सकती हैं। कैप्टन लक्ष्मी सहगल वर्मा आजाद हिंद फौज में थी और उन्होंने कुशलतापूर्वक अपना धर्म निभाया विवाह को बेड़ियां ना बनाते हुए मेरी कॉम ने बच्चों के जन्म के पश्चात मेडल जीते। इंदिरा गांधी जी की नेतृत्व क्षमता को पूरा विश्व लोहा मानता है पीवी सिंधु, साइना नेहवाल, पर्वतारोही संतोष यादव जिन्होंने एवरेस्ट की ऊंचाई को अपने हौसलों के आगे पस्त कर दिया करनम मल्लेश्वरी पहली भारतीय महिला जिन्होंने ओलंपिक में वेटलिफ्टिंग जैसे क्षेत्र में पदक हासिल किया। सावित्री बाई फुले जी जिन्होंने अपने पति के साथ मिलकर दलित उत्थान एवं शिक्षा के प्रचार-प्रसार का कार्य किया। ऐसी अनेक महिलाएं भारतवर्ष ही नहीं पूरे विश्व का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। एक महिला अपने पूरे जीवन में मां बहन बेटी पत्नी अलग-अलग रूपों में त्याग तपस्या एवं प्रेम से अपने परिवार के पुरुषों को आगे बढ़ाने का हर संभव प्रयास करती है। कई बार इस रास्ते पर मैं खुद एक गुमनाम से जिंदगी में खोकर कर रह जाती है परंतु फिर भी उदास नहीं होती। भारत परिवार की उन्नति में ही अपना सर्वस्य सुख मान लेती हैं। अपने इस त्याग बलिदान के लिए उन्हें किसी मेडल की आवश्यकता नहीं परंतु अपने हिस्से का सम्मान तो हमारा हक है ना हम महिलाएं बराबरी का हक खैरात में नहीं चाहती। बल्कि अपनी योग्यता और लक्ष्य के प्रति अपने समर्पण भाव के लिए ही बराबरी का हिस्सा चाहते हैं दुनिया की आधी आबादी अपना प्रतिनिधित्व खुद करना चाहती है। जरूरत सिर्फ साथ की है सहारे की नहीं।

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