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लेख

चाणक्य की दृष्टि और राजधर्म निभाने की भारतीय परंपरा

By Raj Express | Publish Date: 3/16/2017 5:48:55 PM
चाणक्य की दृष्टि और राजधर्म निभाने की भारतीय परंपरा

पिछले चुनावों में नेताओं पर स्याही फैंकना, मुंह पर थप्पड़ मारने आदि जैसी घटनाएं भी हुई, जिस पर सोशल नेटवकिर्ंग फेसबुक, ट्विटर आदि पर अनेक लोगों ने नेताओं की खिल्ली भी उड़ाई। आम चुनाव असभ्य जनता के लिए खिलवाड़ हो सकते हैं लेकिन भारत जैसे प्राचीन सभ्यता वाले देश की प्रजा के लिए खिलवाड़ नहीं हैं। प्रजा ने जिन सांसदों को चुना है वे उनके इष्ट देवी-देवताओं से किसी भी दृष्टि से कम नहीं हैं। प्रजा के मत भिन्न हो सकते हैं परन्तु नव-निर्मित प्रतिनिधियों में विश्वास रखना उनका धर्म है। भारत अन्य सभी राष्ट्रों से भिन्न है। इस देश ने कभी भी अपने हिन्दु, बौद्ध, जैन, सिख आदि मतों  को दूसरों पर थोपने की कोशिश नहीं की। प्रजा में विभिन्न मतों के होते हुए भी राजा निष्पक्ष रहे हैं। ऐसे धर्म को निभाने की इस देश में परम्परा रही है। आज कोई भी पार्टी किसी भी राज्य अथवा केंद्र में विद्वेष कर राज्य नहीं चला सकती, इसलिए सेकुलरिज्म की बहस निर्थक है। यदि आज राम मंदिर बनाने की बात चलती है तो उसे देश के असंख्य हिन्दुओं की मत स्वतंत्रता समझा जाये। मत और धर्म में बहुत बड़ा अंतर है। मत का सम्बन्ध पूजा-पद्वति आदि से होने से व्यक्तिगत है। जबकि धर्म का अर्थ धारण होने से इसका सम्बन्ध राष्ट्र से है। सन 1991 में डाक्टर चंद्रप्रकाश द्विवेदी द्वारा निर्देशित चाणक्य नाम से एक सीरिअल दूरदर्शन पर दिखाया गया था, यद्यपि यह सीरियल उस समय की घटनाओं का एक काल्पनिक वर्णन है, परंतू राज-धर्म, प्रजा-धर्म आदि विषयों पर भारतीय चिंतन को समझने में सहायक है। एक ज्ञानसभा में मगध के राज-दरबार द्वारा आयोजित किया है, इसमें देश के विभिन्न गुरुकुलों से आये छात्रों से आचार्य राजनीति से सम्बंधित प्रश्न पूछते हैं, राजा घनानंद ज्ञानसभा में जाने के प्रति बहुत उत्साहित नहीं थे। उनके अनुसार, आचार्य एवं छात्र मुझ पर अपने खोखले आदशोर्ं एवं नीतियों को थोपने का प्रयास करेंगे, परंतु अपने अमात्य के कहने पर वे उस सभा में उपस्थित हुए।

छात्र, धर्म और अर्थ का स्रोत राज्य है: धर्म का सम्बन्ध किसी जाती, सम्प्रदाय अथवा पूजा-पद्वति विशेष से नहीं होता। गुरुकुल छात्रों को धर्म की शिक्षा दे शेष जीवन यापन के नियमों का ज्ञान कराते थे।

आचार्य राज्य का मूल क्या है: छात्र ने आगे राज्य की उपमा एक वृक्ष से दी। छात्र ने राजा, मंत्री-परिषद सेना आदि शासन के विभिन्न अंगों को प्रजा एवं देश की सम्पन्नता के लिए उत्तरदायी ठहराया, परंतू देश की सम्पन्नता से प्रजा में सभी का सुख सुनिश्चित नहीं होता।

अर्थ का मूल राज्य है: राज्य का मुख्य लक्ष्य देश में समृद्धि लाना है। एक समृद्ध देश ही अन्य राष्ट्रों से आपसी व्यवहार के मानकों को तय कर सकता है और उनका पालन भी करवा सकता है। एक गरीब देश का कोई धर्म नहीं हो सकता, क्योंकि वह तो हमेशा अन्य राष्ट्रों की दया पर ही जीवित रहेगा। राज्य में यदि कोई व्यक्ति जाती, सम्प्रदाय, योग्यता आदि किसी भी कारण से अथरेपार्जन नहीं कर सकता तो वह अधर्म को बढ़ावा देगा और दूसरों के दु:ख का कारण भी बनेगा। शासन की सहायता के लिए प्रजा में कुल एवं परिवार की परम्परा थी। जिनका धर्म कुल के अपंग एवं असहायों का भरण-पोषण करना था। गृहस्थों का धर्म गुरुकुल एवं उनके शिक्षार्थियों को दान एवं भिक्षा से पालन करना था। शासन की भी इन सामाजिक व्यवस्थाओं पर नज़र रहती थी। राजा एवं राज्य प्रजा के लिए अथरेपार्जन सुलभ कराता है। उस धन के अंश से शिक्षा एवं शिक्षकों द्वारा छात्रों में धर्म स्थापित किया जाता है, जो वास्तव में राज्य का एक संचित धन है, यदि शासन में भ्रष्टाचार आदि के कारण प्रजा दुखी होती है, तो यह धर्म रूपी संचित धन ही राज्य की सत्ता को पुनस्र्थापित कर सकता है। शिक्षा एवं शिक्षक की गुणवत्ता एवं सामथ्र्य भी इसी कसौटी पर सुनिश्चित की जा सकती है की वे आवश्यकता उत्पन्न होने पर धनानंद जैसे भ्रष्ट शासक एवं शासन को हटा नए शासन को स्थापित कर पाएं। ऋग्वेद में इस प्रकार से तैयार किए गए छात्रों को सोम संज्ञा से विभूषित किया है। सोम कोई पीने का पदार्थ नहीं था, परंतू देश के शासक इंद्र हमेशा सोम पीने को आतुर रहते थे। 

 
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