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संपादकीय

आजाद से प्रेरणा लेता रहेगा आजाद भारत

By Raj Express | Publish Date: 2/27/2017 11:39:14 AM
आजाद से प्रेरणा लेता रहेगा आजाद भारत

 वतन के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने वाले और उसे अंग्रेजों की बेड़ियों से मुक्त कराने में अपना पूरा जीवन खपाने वाले क्रांतिकारियों की शहादत को याद रखना हर देशवासी का कर्तव्य है।27फरवरी को आज ही के दिन चंद्रशेखर आजाद ने अंग्रेजों के साथ लड़ते-लड़ते अपने प्राण की आहुति दे दी थी। ऐसे बलिदानियों को भूलने का मतलब अपराध करना है। इसी के मद्देनजर दो साल पहले केंद्र सरकार ने‘याद करो कुर्बानी’नाम के एक कार्यक्रम की शुरुआत की थी,जिसका उद्देश्य उन शहीदों को याद करना व उन्हें श्रद्धांजलि देना है,जिन्हें या तो भुला दिया गया है अथवा जिनके बारे में लोगों को पता ही नहीं है। देश की आजादी के लिए अपना बलिदान देने वालों के परिजन आज दर-दर की ठोकरें खाने को विवश हैं। चंद्रशेखर आजाद के वंशज पंडित सुजीत आजाद कहते हैं कि उनका परिवार हाशिए पर है। उन्हें कोई नहीं पूछता। वे बताते हैं कि किसी सरकारी कार्यालय में अपना कोई काम कराने जाते हैं,तो अपना परिचय जब शहीद चंद्रशेखर आजाद वाला बताते हैं,तो बाबू उपहास करते हैं।

वह दिन कोई नहीं भूल सकता,जिस दिन आजाद ने लाला लाजपतराय की मौत का बदला लेने के लिए एक अंग्रेज अफसर को मारने का प्लान बनाया था।17दिसंबर1928 को चंद्रशेखर आजाद,भगतसिंह व राजगुरु ने संध्या के समय लाहौर में पुलिस अधीक्षक के दफ्तर को जा घेरा। जैसे ही जॉन सांडर्स अपने अंग रक्षक के साथ मोटर साइकल पर बैठकर निकला,राजगुरु ने गोली दाग दी, जो सांडर्स के मस्तक पर लगी और वह मोटर साइकल से नीचे गिर पड़ा। भगत सिंह ने आगे बढ़ कर चार-छह गोलियां और दागकर उसे बिलकुल शांत कर दिया। जब जॉन सांडर्स के अंगरक्षक ने पीछा किया तो चंद्रशेखर ने अपनी गोली से उसे भी ढेर कर दिया। इसके बाद पूरे लाहौर में जगह-जगह परचे चिपका दिए गए कि लाला लाजपतराय की मौत का बदला चंद्रशेखर ने सांडर्स को मारकर ले लिया है। इस घटना के बाद क्रांतिकारियों में आजाद का नाम गूंजने लगा। अंग्रेजों ने आजाद को जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए पांच हजार का इनाम घोषित कर दिया,पर वे अंत तक उनके हाथ नहीं आए। बलिदानियों के परिवारजनों के अलावा देशवासियों के भीतर भी पीड़ा है कि देश की आजादी में भाग लेने वाले अनेक लोगों को भुला दिया गया है। उनका स्मरण होना चाहिए। यह सच है कि कुछ मुट्ठीभर नाम छोड़कर हजारों स्वतंत्रता सेनानियों को इतिहास के पन्नों में जगह नहीं मिली। यहां हमारा आशय उन आंदोलनकारियों से बिलकुल नहीं है, जो गांधी जी और उनके साथियों के नेतृत्व में देश के लिए मर-मिटने को तैयार होकर निकले थे। भारत में हजारों ऐसे दीवाने हुए,जिन्होंने कांग्रेस के साथ या उससे अलग आजादी का बिगुल बजाया।
चंद्रशेखर आजाद ने उस वक्त युवाओं की एक फौज अंग्रेजों से लड़ने के लिए तैयार की थी,पर कुछ देशवासी उनका विरोध कर रहे थे। यह वे लोग थे,जिन्हें अंग्रेजों की गुलामी पसंद थी। सोच बदलने वाली सियासत उस वक्त भी हावी थी। आजाद भी इसके शिकार हुए। उनकी लोकप्रियता कुछ लोगों को खटक रही थी। उन्हें ठिकाने लगाने के लिए मुखबिर ने पुलिस को सूचना दी कि आजाद इलाहाबाद के अल्फंरेड पार्क में अपने एक साथी के साथ बैठे हुए हैं। वह27फरवरी-1931का दिन था। चंद्रशेखर आजाद सुखदेव राज के साथ विचार-विमर्श कर रहे थे। पुलिस ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया और पुलिस अधीक्षक नॉटबाबर ने आजाद पर गोली दाग दी। गोली उनकी टांग में जा घुसी। लेकिन आजाद ने हिम्मत दिखाते हुए घिसटकर एक जामुन के वृक्ष की ओट लेकर दूसरे वृक्ष की ओट में छिपे नॉटबाबर के ऊपर फायर किया। निशाना सही लगा व उनकी गोली ने नॉटबाबर की कलाई तोड़ दी। एक घनी झाड़ी के पीछे सीआईडी इंस्पेक्टर विश्वेश्वर सिंह छिपा हुआ था,उसने खुद को सुरक्षित समझकर आजाद को गाली दी। इससे आजाद को क्रोध आया। जिस दिशा से गाली की आवाज आई थी, उस दिशा में आजाद ने गोली दाग दी। निशाना इतना सही लगा कि गोली ने विश्वेश्वर का जबड़ा तोड़ दिया।
जब दोनों तरफ से गोलीबारी हो रही थी। इसी बीच आजाद ने सुखदेव राज को वहां से भगा दिया। पुलिस की कई गोलियां आजाद के शरीर में समा गईं। उनके माउजर में केवल एक गोली बची थी। उन्होंने सोचा कि यदि मैं इसे भी चला दूंगा तो जीवित गिरफ्तार होने का भय है। इसलिए उन्होंने वह आखिरी गोली खुद पर ही चला ली और इस तरह उनका प्राणांत हो गया। चंद्रशेखर आजाद के शहीद होने का समाचार जवाहरलाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू को मिला। उन्होंने ही कांग्रेसी नेताओं व देशभक्तों को यह समाचार बताया। श्मशान घाट से आजाद की अस्थियां लेकर एक जुलूस निकला। इलाहाबाद की मुख्य सड़कें अवरुद्ध हो गईं,ऐसा लग रहा था कि मानो सारा देश अपने इस सपूत को अंतिम विदाई देने के लिए उमड़ पड़ा है। इसके साथ ही एक युग के अध्याय का अंत हो गया। आजादी के लिए अपना सब कुछ लुटाने वाले चंद्रशेखर आजाद को शत्-शत् नमन..।
 रमेश ठाकुर (स्वतंत्र टिप्पणीकार)
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