• 14 साल की लड़की को बंधक बना 1000 लोगों से बनवाया शारीरिक संबंध
  • प्रशांत भूषण को पीटने वाले को बीजेपी ने बनाया प्रवक्ता
  • राजस्थान: लैंडिंग से पहले बाड़मेर में क्रैश हुआ सुखोई, दोनों पायलट सुरक्षित
  • 'लालू परिवार' हुआ रघुवंश से नाराज, राबड़ी ने बयान को बोला फूहड़
  • गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र को पांचवां प्रांत घोषित करने की तैयारी में पाकिस्तान
  • सिद्धू को मिल सकता है कांग्रेस से झटका, अमरिंदर नहीं चाहते कोई डिप्टी CM
  • लोकसभा में भाजपा सांसदों ने किया पीएम मोदी का स्वागत, लगे 'जयश्री राम' के नारे
  • पंजाब और गोवा विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद आम आदमी पार्टी में फूट के आसार!

होम |

संपादकीय

ऐसे बयानों पर संतुलित प्रतिक्रिया दें

By Raj Express | Publish Date: 2/27/2017 12:54:08 PM
ऐसे बयानों पर संतुलित प्रतिक्रिया दें

जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला के एक बयान ने सियासी भूचाल ला दिया है। बीते शुक्रवार को उन्होंने कहा था कि कश्मीर में आतंकवादी बन रहे युवक विधायक या सांसद बनने के लिए नहीं,बल्कि इस कौम और वतन की आजादी के लिए अपनी जान कुर्बान कर रहे हैं। वे आजादी और अपने हक के लिए लड़ रहे हैं। हालांकि,कुछ देर बाद ही उन्होंने कहा कि हम हिंसा व आतंकवाद का समर्थन नहीं करते। हम चाहते हैं कि रियासत के युवाओं के साथ बातचीत बहाल हो। हाईकोर्ट के किसी जज के नेतृत्व में एक आयोग बने,जो युवाओं के द्वारा बंदूक उठाने के कारणों की जांच करे। वैसे अब्दुल्ला ने कश्मीर समस्या के लिए भारत व पाकिस्तान,दोनों को कोसा। उन्होंने कहा कि दोनों1948में किए गए वादों को भूल गए हैं। दमनकारी नीतियों से कश्मीरियों की सियासी उमंगों को नहीं दबाया जा सकता। उन्होंने कहा कि गोली के बदले गोली की नीति से अमन नहीं होगा,हालात और ज्यादा बिगड़ेंगे। गोली के बजाय बोली की जरूरत है। इससे पहले25नवंबर-2016को उन्होंने कहा था कि पीओके पर भारत अपना कब्जा कैसे बता सकता है। वह क्या उसकी बपौती है। कश्मीर सिर्फ कश्मीरियों का है। इसके एक साल पहले उन्होंने दावा किया था कि प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी कश्मीर मसला सुलझाने के लिए एलओसी को अंतरराष्ट्रीय सीमा मानने के लिए राजी थे।

वास्तव में कश्मीर मसला बेहद दिलचस्प है। जो विपक्ष में रहता है,उसको हिंसक आंदोलन और आतंकवाद के प्रति सहानुभति रहती है। अगर पीडीपी के पुराने बयान देखें तो वे फारूक के बयानों से कतई अलग नहीं रहे हैं। कश्मीर से आए किसी भी देशप्रेम के बयान व कश्मीरियों को गाली देने वालों को पहले तो कश्मीर के हालात,उसके अतीत और वहां के लोगों की मानसिक स्थिति को समझना जरूरी होगा। देश को आजादी के साथ ही विरासत में मिली समस्याओं में कश्मीर सबसे दुखती हुई रग है। समय के साथ मर्ज बढ़ता जा रहा है, कई लोग इस समस्या के लिए नेहरू या कांग्रेस को दोषी बताते हैं, तो देश में‘एक ही धर्म,एक ही भाष या एक ही संस्कृति’ के समर्थक कश्मीर को मुसलमानों के द्वारा उपजाई गई समस्या और इस का मूल कारण धारा370को बताते हैं।

गौरतलब है कि करीब दो लाख बाईस हजार किलो मीटर में फैले जम्मू कश्मीर राज्य की कश्मीर घाटी में चिनार जंगलों में अलगाववाद के सुर्ख फूल पनपते रहे हैं। घाटी में कट्टरपंथी तत्व सन1942में उभरे,जब पीर सईउद्दीन ने जम्मू-कश्मीर में जमात-ए-इस्लामी का गठन किया। इस पार्टी की धारा-3में यह स्पष्ट था कि वह पारंपरिक मिश्रित संस्कृति को नष्ट कर इस्लामी संस्कृति की नींव डालना चाहती थी।1947में द्वि-राष्ट्र के सिद्धांत को स्वीकार करते हुए भारत आजाद हुआ। हैदराबाद व कश्मीर को छोड़कर अधिकांश रियासतों का भारत में विलय सहजता से हो गया। कश्मीर के राजा हरिसिंह विलय के लिए तैयार नहीं थे और वे कश्मीर को एक छोटा सा स्वतंत्र राज्य बनाए रखना चाहते थे। उधर,शेख अब्दुल्ला जनता के नुमांइदे थे और राजशाही के विरोध में आंदोलन करने के कारण जेल में थे।22 अक्टूबर-1949को अफगान व बलूच कबाइलियों ने (पाकिस्तान के सहयोग से) कश्मीर पर हमला कर दिया। भारत ने विलय की शर्त पर कश्मीर के राजा को सहयोग दिया। इस तरह1948में कश्मीर का भारत में विलय हुआ। कबाइली इससे पहले घाटी के बड़े हिस्से पर कब्जा कर चुके थे,जो आज भी है। फिर भारत व पाकिस्तान का निर्माण ही एक-दूसरे के प्रति नफरत से हुआ है। अत: तभी से दोनों देशों की सीमा के निर्धारण के नाम पर कश्मीर को निरंतर सुलगाया जाता रहा है। इसमें अंतरराष्ट्रीय हथियार व्यापारी,भारत की प्रगति से जलने वाले कुछ देश और हमारे कुछ नेता समय-समय पर समस्या की खाई को चौड़ा करते रहे हैं।

इसी दरमियान कश्मीर को बाहरी पूंजीपतियों से बचाने के लिए उसे विशेष दर्जा धारा370के अंतर्गत दिया गया। तब से इस धारा का विरोध एक सियासी पार्टी के लिए ईंधन का काम करता रहा है। वैसे आतंकवाद एक अंतरराष्ट्रीय त्रसदी है और कश्मीर में सक्रिय कतिपय अलगाववादी ऐसी ही अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के सदस्य हैं। उनका कश्मीर में इस्लाम से उतना ही सरोकार है,जितना धारा370की सियासत करने वालों का हिंदुत्व से। हिंदुत्व के हिमायती यह प्रचार करते हैं कि केवल धार्मिक कट्टरता ही घाटी में भारत विरोधी जन-उन्माद का मुख्य कारण है। आप याद करें उस दौर को,जब केंद्र सरकार ने जम्मू कश्मीर की फारूक अब्दुल्ला सरकार को बर्खास्त कर दूसरी बार जगमोहन को बतौर राज्यपाल भेज दिया था। तभी से वहां के हालात बद से बदतर होते चले गए। हालांकि,हालात चाहे जितने भी बदतर रहे हों, लेकिन कश्मीर समस्या को भारत के लोग एक राजनीतिक या पाकिस्तान-प्रोत्साहित समस्या ही समझते रहे हैं। संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु की फांसी पर जब सुप्रीम कोर्ट ने अपनी मुहर लगाई थी,तभी से एक बड़ा वर्ग, जिसमें कुछ कानून के जानकार भी शामिल थे,वे दो बातों के लिए माहौल बना रहे थे। एक-अफजल को फांसी जरूर हो और दूसरी-उसके बाद कभी कानून का पालन न करने, तो कभी कश्मीर की अशांति की दुहाई देकर मामले को देशव्यापी बनाया जाए। याद करें,कुछ साल पहले ही अमेरिका की अदालत ने एक ऐसे पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी नागरिक को सजा सुनाई थी,जो अमेरिका में कश्मीर के नाम पर लॉबिंग करने के लिए फंडिंग करता था व उसके नेटवर्क में कई भारतीय भी शामिल थे।

यह जानकर आश्चर्य होगा कि उनमें कई एक हिंदू हैं। एक अधिवक्ता का बयान लोग भूले नहीं हैं, जिसमें उन्होंने कश्मीर में रायशुमारी के आधार पर उसके भारत से अलग होने का समर्थन किया था। जब अफजल को कानूनी मदद की जरूरत थी,तब उसके लिए सहानुभूति दिखाने वाले किताब लिख रहे थे,अखबारों में प्रचार कर रहे थे और जिन एनजीओ से वे जुड़े हैं,उनके लिए फंड जमा कर रहे थे। जबकि उन्हें मालूम था कि अफजल की कानूनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक लड़ी जा चुकी है और आगे की गुंजाइश लगभग खत्म है। लेकिन वे यह सब इसलिए कर रहे थे कि कश्मीर को चर्चा में लाया जा सके। अब फारूक अब्दुल्ला के बयान को सिर्फ इसलिए देशद्रोह नहीं बताया जा सकता कि वे मुस्लिम हैं और न इसीलिए समर्थन किया जा सकता है कि वे कश्मीर से जुड़े हैं। यह दोनों ही स्थितियां कश्मीर के लिए मुफीद नहीं मानी जा सकती हैं। वहां शांति के लिए आतंकियों के साथ कड़ाई व आम नागरिकों में विश्वास की बहाली जरूरी है। तब चाहे फारूक अब्दुल्ला हों या महबूबा मुफ्ती या फिर हुर्रियत के लोग,सभी के बयानों पर संतुलित प्रतिक्रिया ही दी जानी चाहिए।

 पंकज चतुर्वेदी (वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार)

Contact us: contact@rajexpress.com
Copyright © 2016 RajExpress.com. All Rights Reserved.
Designed by : 4C Plus