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संपादकीय

नेताओं पर कार्रवाई से बचता है आयोग

By Raj Express | Publish Date: 2/28/2017 11:29:18 AM
नेताओं पर कार्रवाई से बचता है आयोग

 उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव के पांचवें चरण की वोटिंग के एक दिन पहले चुनाव आयोग ने एक बार फिर से सभी राजनीतिक दलों के नेताओं से संयम बरतने की अपील की है। सभी दलों को लिखे खत में चुनाव आयोग ने कहा है कि ऐसा कोई बयान न दें,जिससे धर्म और राजनीति का घालमेल होता हो। आयोग ने यह भी कहा है कि वोटरों को लुभाने के लिए धर्म का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए,क्योंकि इससे धार्मिक कटुता और ध्रुवीकरण का खतरा पैदा हो जाता है। चुनाव आयोग पहले भी इस तरह की गाइडलाइंस जारी करता रहा है, पर इसको सख्ती से लागू करवाने का कोई प्रयास इस संवैधानिक संस्थान की ओर से दिखाई नहीं देता है। नियमित अंतराल पर एडवायजरी जारी कर राजनीतिक दलों को उनके कर्तव्यों की याद दिलाई जाती  है। आयोग ने सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को आदेश दिया है कि वे इस तरह के बयानों से बचें,जिसकी व्याख्या से धार्मिक तनाव पैदा हो सकता है। चुनाव आयोग का मानना है कि मौजूदा समय में किसी भी तरह का कोई भी बयान किसी क्षेत्र विशेष में सीमित नहीं रहता है व टीवी पर प्रसारण के अलावा सोशल मीडिया के विस्तार से वह तेज गति से हर जगह पहुंच जाता है। चुनाव आयोग के मुताबिक इन बातों का असर उस इलाके के मतदाताओं के दिमाग पर पड़ता है,जहां चुनाव हो रहे होते हैं। कई बार तो उनसे समाज में दरार पैदा होने के हालात पैदा हो जाते हैं। आयोग कोई नई बात नहीं कर रहा है। इसी वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने भी एक फैसले में धर्म को चुनाव प्रचार से अलग करने का आदेश दिया था। चुनाव आयोग के पास कानून का डंडा भी है,पर वह नेताओं के मसले पर नरम दिखाई पड़ता है। चुनाव आचार संहिता उल्लंघन के मामले में नेताओं के खिलाफ कार्रवाई बहुत ही विरले होती है। ऐसा लगता है कि चुनाव आयोग भी राजनीतिक दलों व उनके नेताओं पर सीधी कार्रवाई करने से बचता रहता है।

हाल ही में एक अखबार की बेवसाइट पर जनता की राय के नाम से एक सर्वेनुमा एग्जिट पोल छप गया था,तो उसके संपादक व मालिक के खिलाफ केस दर्ज करने का आदेश चुनाव आयोग ने दे दिया था। संपादक की तो गिरफ्तारी भी हुई,बाद में वे जमानत पर छूटे थे। कितने नेताओं के मामलों में चुनाव आयोग ऐसी त्वरित कार्रवाई करता है?कितने नेतागणों को चुनाव के दौरान आचार संहिता के उल्लंघन में जेल जाना पड़ता है?इस पर विचार किया जाना आवश्यक है। चुनाव आयोग की प्राथमिक जिम्मेदारी सही तरीके से चुनाव करवाने की है व उसमें वह सफल भी रहता है। वह फ्री व फेयर इलेक्शन के बुनियादी सिद्धांत की रक्षा भी करता है,लेकिन हाल के दिनों में जिस प्रकार से चुनावों के दौरान एक दूसरे पर भाषा के तीर चलते हैं,उसे रोकने के लिए चुनाव आयोग को कदम उठाने की जरूरत है। जिस प्रकार से राजनीतिक दल एक समुदाय विशेष को टिकट देकर और फिर उसका सार्वजनिक प्रचार करते हुए उस समुदाय के वोटरों को लुभाने की कोशिश करते हैं,यह तो परोक्ष रूप से धर्म के आधार पर वोट मांगने की कोशिश जैसा है। यह वैसा ही मामला है,जैसे हमारे देश में शराब के विज्ञापन पर पाबंदी है,मगर शराब कंपनियां उसी नाम से कोई अन्य उत्पाद बनाकर उसका विज्ञापन कर ग्राहकों तक अपनी बात पहुंचाती हैं। ऐसा ही कुछ राजनीति दल भी करते रहे हैं। ऐसे में चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि वह इन बयानों को भी चिन्हित करे और उन्हें रोकने के लिए उचित कार्रवाई करे। चुनाव आयोग को धर्म के नाम पर वोट मांगने की मंशा को पहचान कर उसको रोकने के अलावा जाति के नाम पर वोट मांगने की कोशिशों पर भी रोक लगानी होगी। जातीय संगठनों पर भी नजर रखनी होगी, क्योंकि ये संगठन चुनाव के दौरान कुकुरमुत्ता की तरह उग आते हैं व राजनीतिक दल इनकी आड़ में अपनी सियासी रोटी सेंकते हैं। चुनाव आयोग को इनके अलावा मर्यादाहीन बयानों पर भी रोक लगाने की दिशा में दृढ़ता से काम करना होगा।
उत्तरप्रदेश चुनाव के दौरान इशारों में ही सही,प्रधानमंत्री को गधा,रावण और आतंकवादी तक कहा गया और चुनाव आयोग पूरी तरह से खामोश ही रहा। मुलायम सिंह यादव के मरने के वक्त की घोषणा तक की गई,प्रियंका गांधी पर अभद्र टिप्पणी की गई,लेकिन चुनाव आयोग नेताओं की सफाई भर से ही संतुष्ट नजर आया। चुनाव आयोग यह मानता है कि आज सूचनाओं के तेज संप्रेषण के दौर में देश के किसी कोने में दिया गया बयान चुनाव वाले क्षेत्र में असर डाल सकता है। यह टीवी का दौर है व नेताओं को लगता है कि टीवी पर उनके भाषण का वह हिस्सा ही दिखाया जाएगा,जो विवादित होगा। स्वस्थ आलोचना कभी भी भाषा की मर्यादा को नहीं तोड़ती और यह सच है कि जब भाषा की मर्यादा नहीं टूटती,तो न्यूज चैनलों में स्पंदन नहीं होता। पूरे दिन चलने वाले समाचार चैनलों में नेताओं के विवादित बयानों को दिखाया जाता है। भाषा अपनी सीमाओं का बार-बार अतिक्रमण करती है। क्या चुनाव आयोग को इस पर भी नजर रखने की जरूरत नहीं है?जरूरी है कि आज इन्हीं सब बातों पर विचार किया जाए।
 अनंत विजय (टेलीविजन पत्रकार और स्तंभकार)
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