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संपादकीय

विरोधी विचारों को तवज्जो दें छात्र संगठन

By Raj Express | Publish Date: 3/1/2017 12:48:02 PM
विरोधी विचारों को तवज्जो दें छात्र संगठन

 दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के रामजस कॉलेज में एक ‘संगोष्ठी’ में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के विद्यार्थी उमर खालिद को बुलाए जाने का जो विरोध हुआ था, वह मामला दिन गुजरने के साथ ठंडा पड़ने की जगह न केवल और-और गर्म हो रहा है, बल्कि उस पर राजनीति भी होती लग रही है। गौरतलब है कि डीयू में संगोष्ठी का आयोजन वामपंथी छात्र संगठन आइसा (ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन) ने किया था, जिसका विषय था, कश्मीर में भारतीय सेना द्वारा मानवाधिकारों का दमन। हालांकि, विवाद हुआ तो आयोजक अब कहने लगे हैं कि नहीं, यह विषय नहीं था। जो भी हो, लेकिन उमर खालिद को वक्ता के तौर पर बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने इसका विरोध किया। विरोध की वजह वह आरोप है, जो उमर खालिद पर बीते दिनों लगा था। कन्हैया कुमार, उमर खालिद समेत जेएनयू के पांच-छह छात्रों पर पिछले दिनों आरोप लगा था कि उन्होंने अपने विश्वविद्यालय परिसर में संसद भवन पर हमले के दोषी व फांसी पर चढ़ाए जा चुके अफजल गुरु की न केवल पुण्यतिथि मनाई, भारत विरोधी नारे भी लगाए।

लिहाजा एबीवीपी से जुड़े छात्र नहीं चाहते थे कि उमर खालिद को रामजस कॉलेज में बुलाया जाए। आइसा के छात्र उसे बुलाने पर अड़ गए और दोनों छात्र समूहों में हिंसक झड़प तक होते-होते बची। दिल्ली पुलिस पर यह आरोप है कि उसने एबीवीपी के छात्रों का पक्ष लिया। एक प्रोफेसर को भी पीटा गया। इसमें कोई संदेह नहीं है कि हम अपने युवाओं को राजनीति से दूर नहीं रख सकते हैं। छात्र राजनीति ने देश को अनेक राजनीतिज्ञ दिए हैं, मगर अब छात्र संवाद की जगह विवाद को तवज्जो देने लगे हैं। कारण यही है कि छात्रसंघों की स्थापना का जो मकसद था, अब वह लगभग समाप्त हो चुका है। एबीवीपी और आइसा, दोनों ही छात्र संगठन ऐसे हैं, जो यह मानकर चलते हैं कि जो वे कह रहे हैं, सिर्फ और सिर्फ वही सत्य है, बाकी सब गलत। विरोधी विचार को समझने व सुनने की क्षमता दोनों ही संगठनों में नहीं है। लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यह है कि हम विरोधी से चाहे सहमत न हों, लेकिन उसे बोलने देंगे, उसकी अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा हर सूरत में करेंगे, जबकि ये तो अपने-अपने विरोधियों को बोलने तक नहीं देते हैं। अगर उमर खालिद उस संगोष्ठी में शामिल हो जाता, उसे अपनी बात कहने का मौका मिल जाता तो इससे किसी का जरा भी नुकसान नहीं होना था। उसका विरोध भी गलत नहीं था, मगर इसके लिए उन तौर-तरीकों को अपनाया जाना चाहिए था, जो कि लोकतंत्र में स्वीकृत हैं। हिंसा की तो कोई जगह ही नहीं हो सकती है, लेकिन हुआ यही है। जहां एबीवीपी की दिक्कत यह है कि उसे लगता है कि केवल उसी का विचार सही है, तो आइसा आदि की दिक्कत दूसरी है। उसका आचरण भी लोकतांत्रिक नहीं है। जम्मू कश्मीर की समस्या राजनीतिक है, मगर उसका धार्मिक कोण भी है, जबकि आइसा जैसे संगठन इस तथ्य को मानना ही नहीं चाहते। उन्हें लगता है कि यह समस्या केवल राजनीतिक है। यदि ऐसा है भी तो अलगाववादी मस्जिदों का इस्तेमाल क्यों करते हैं, अपने आंदोलन के लिए? कश्मीर में जो भी उत्पात होता है, वह शुक्रवार को होता है, जुमे की नमाज के बाद। यही सच यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि कश्मीर समस्या धार्मिक है। वामपंथी छात्र संगठनों को यह तथ्य स्वीकार करना चाहिए और जब तक वे इसे मानेंगे नहीं, उस तरह नहीं देख पाएंगे, जिस तरह से हमारा पूरा देश इस समस्या को देखता है। देश के ज्यादातर नागरिक यही मानते हैं कि जम्मू कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है। वामदलों के तमाम धड़े भी यही मानते हैं, लेकिन कुछेक हैं, जो हमारे देश से अलग विचार रखते हैं। इसीलिए ये कश्मीर पर कुछ भी बोल जाते हैं। टकराव तब होता है, जब ये लोग कुछ भी बोलते हैं एवं एबीवीपी वाले कुछ भी सुनने के लिए तैयार नहीं होते। दोनों पक्ष अपनी-अपनी जगह सही नहीं हैं। हम आइसा को तब सही कहेंगे, जब वह देश के सामूहिक मनोभाव को समझकर ही कश्मीर पर बात करे, जबकि एबीवीपी को तब सही माना जाएगा, जब उसके लोग मानेंगे कि जो वे कह रहे हैं, केवल वही सही नहीं है। लेकिन दोनों सुधरने के लिए तैयार नहीं हैं और इसकी वजह से दोनों के मूल राजनीतिक संगठनों का नुकसान होता है। बताना जरूरी है कि एबीवीपी के कारण भाजपा निशाने पर आती है, उस पर फासीवादी होने का आरोप लगता है, जबकि आइसा जैसों की हरकतों से निशाने पर वामपंथी दल आते हैं। इनका जनाधार इसी वजह से कम हो रहा है कि नागरिक मानकर चलते हैं कि ये लोग भारत को एक राष्ट्र के रूप में स्वीकार नहीं करते। इसीलिए कभी कश्मीर के अलगाववादियों का समर्थन करने लगते हैं, तो कभी-कभी नक्सलवादियों का। एबीवीपी का विरोध करने वाली छात्र, जो कि शहीद जवान की बेटी है, उस पर कैसी-कैसी टिप्पणियां नहीं की गईं? भाजपा विचार करे कि ये क्या सही हैं? वामदल भी विचार करें कि वे प्राय: राष्ट्र के विरोध में खड़े क्यों हो जाते हैं?

 हरीश कुमार ‘शम्स’ (राजनीतिक विश्लेषक)

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