• 14 साल की लड़की को बंधक बना 1000 लोगों से बनवाया शारीरिक संबंध
  • प्रशांत भूषण को पीटने वाले को बीजेपी ने बनाया प्रवक्ता
  • राजस्थान: लैंडिंग से पहले बाड़मेर में क्रैश हुआ सुखोई, दोनों पायलट सुरक्षित
  • 'लालू परिवार' हुआ रघुवंश से नाराज, राबड़ी ने बयान को बोला फूहड़
  • गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र को पांचवां प्रांत घोषित करने की तैयारी में पाकिस्तान
  • सिद्धू को मिल सकता है कांग्रेस से झटका, अमरिंदर नहीं चाहते कोई डिप्टी CM
  • लोकसभा में भाजपा सांसदों ने किया पीएम मोदी का स्वागत, लगे 'जयश्री राम' के नारे
  • पंजाब और गोवा विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद आम आदमी पार्टी में फूट के आसार!

होम |

संपादकीय

बदलता नहीं दिख रहा बीजिंग

By Raj Express | Publish Date: 3/1/2017 12:51:56 PM
बदलता नहीं दिख रहा बीजिंग
वैश्विक कूटनीति में आ रहे बदलावों और हितों के नए टकरावों को देखते हुए अब यह जरूरत महसूस होने लगी है कि भारत व चीन के बीच स्वस्थ और समृद्ध संबंध निर्मित हों। इस तथ्य से चीन भी अनजान नहीं है, पर इसके बावजूद वह कूटनीतिक और सामरिक धरातल पर जिन उपायों का आश्रय लेता है, उन्हें किसी भी दृष्टि से भारत-चीन मैत्री का प्रतीक नहीं माना जा सकता। ऐसे में विदेश सचिव एस. जयशंकर का भारत-चीन रणनीतिक वार्ता में शामिल होने के लिए बीजिंग पहुंचना और मुख्य रूप से उन तीन मुद्दों पर चीन का ध्यान आकर्षित करना, जो भारत के लिए विशेष महत्व रखते हैं। मगर चीन की तरफ से उन पर कोई सकारात्मक संकेत नहीं मिलना, किसी बेहतर उपलब्धि का सूचक नहीं माना जा सकता है। विदेश सचिव की चीन यात्र मुख्यतया तीन मुद्दों पर केंद्रित थी। एक-पाकिस्तानी आतंकी एवं जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर के प्रस्ताव पर संयुक्त राष्ट्र संघ में चीन का वीटो। दो-एनएसजी में भारत की सदस्यता को लेकर चीनी अड़ंगा एवं तीन-चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे पर भारत का नजरिया। ध्यान रहे, अभी कुछ समय पहले ही भारत के मसूद अजहर पर प्रतिबंध लगाने संबंधी प्रस्ताव पर चीन ने वीटो कर दिया था। जैश की आतंकी गतिविधियों व पठानकोट हमले में मसूद की भूमिका से जुड़े पक्के सबूत के साथ उसे प्रतिबंधित करने हेतु भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक प्रस्ताव लाया था। भारत ने कहा था कि 2001 से जैश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की प्रतिबंधित सूची में शामिल है, क्योंकि वह आतंकवादी संगठन है और उसके अलकायदा से लिंक हैं, लेकिन तकनीकी कारणों के चलते जैश के मुखिया मसूद पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सका।
भारत का तर्क था कि इस तरह के आतंकी संगठनों को प्रतिबंधित न किए जाने का खामियाजा पूरी दुनिया को उठाना पड़ सकता है। इस तर्क पर कमेटी के 15 में से 14 सदस्य सहमत भी थे, पर चीन की असहमति ने मसूद को प्रतिबंधित सूची में जाने से रोक लिया। खास बात यह है कि चीनी विदेश मंत्रलय के प्रवक्ता हांग लेई की तरफ से इस संदर्भ में कहा गया था कि ‘चीन आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय सहयोग में संयुक्त राष्ट्र में एक केंद्रीय व समन्वित भूमिका निभाने का समर्थन करता है। लेकिन वह एक वस्तुनिष्ठ और सही तरीके से तथ्यों व कार्यवाही के महत्वपूर्ण नियमों पर आधारित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद समिति के तहत मुद्दे सूचीबद्ध करने पर ध्यान देता है, जिसकी स्थापना राष्ट्रसंघ के प्रस्ताव 1267 के तहत की गई थी। विदेश सचिव ने चीन से स्पष्ट शब्दों में कहा है कि मसूद पर सबूत देना हमारा काम नहीं है। उनका कहना था कि अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां मसूद की गतिविधियों के बारे में बहुत सारी सूचनाएं जुटा चुकी हैं। उस पर पाबंदी लगाने की मुहिम में भारत अकेला नहीं है, दूसरे देश भी इसके पक्ष में हैं। इधर, न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप में भारत के प्रवेश पर भी चीन का नजरिया नकारात्मक रहा है, जबकि ताशकंद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से आग्रह किया था कि चीन भारत के आवेदन पर निष्पक्षता से विचार करे तथा मेरिट के आधार पर निर्णय ले। मगर जिनपिंग ने उस समय भी जवाब दिया था कि यह एक जटिल व नाजुक मामला है। उस समय चीन के अस्त्र-शस्त्र नियंत्रण विभाग के महानिदेशक वांग कुन का तर्क था कि यदि कोई देश एनएसजी का सदस्य बनना चाहता है तो उसके लिए परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर हस्ताक्षर करना अनिवार्य है। उन्होंने यह चेतावनी भी दी थी कि यदि यहां या फिर एनपीटी के सवाल पर अपवादों को अनुमति दी जाती है तो अंतरराष्ट्रीय परमाणु अप्रसार की परिकल्पना ढह जाएगी। कुल मिलाकर चीन भारत के एनएसजी में प्रवेश के विरोध में तब तक है, जब तक हम एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं कर देते। खास बात यह है कि इस रणनीतिक वार्ता के बाद भी इस विषय पर चीन में कोई परिवर्तन नहीं दिखा। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) में भारत के शामिल होने का विषय भी विदेश सचिव की इस यात्र के दौरान उठा। भारत ने चीन से यह बताने को कहा कि वह सीपीईसी में कैसे शामिल होगा, जबकि पाक अधिकृत कश्मीर से गुजरने वाली यह परियोजना उसकी संप्रभुता के खिलाफ है। उल्लेखनीय है कि इसी वर्ष मई में होने वाले सम्मेलन में चीन ने भारत को भी शामिल होने का निमंत्रण दिया है। विदेश सचिव का कहना था कि हम चीन के प्रस्ताव पर विचार कर रहे हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि यह परियोजना एक ऐसे भौगोलिक हिस्से से गुजर रही है, जो कि भारत के लिए काफी संवेदनशील है। यूं भी चीन भौगोलिक संप्रभुता को लेकर काफी संवेदनशील रहता है। लेकिन उसे इस बात का जवाब देना चाहिए कि किस तरह से कोई देश इसमें शामिल हो सकता है, जिसकी संप्रभुता इससे प्रभावित होती हो। बहरहाल, विदेश सचिव एस. जयशंकर के नेतृत्व में भारतीय दल ने बीते बुधवार को बीजिंग में भारत -चीन रणनीतिक वार्ता की पहली बैठक में हिस्सा लिया और इस दौरान चीन को लेकर भारत की कूटनीति में कुछ दिनों से दिख रहे बदलाव को विदेश सचिव ने पूरी तरह साफ कर दिया। महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों देशों की तरफ से यह वक्तव्य दिया गया कि उनकी रणनीतिक बातचीत सफल व सकारात्मक रही है। लेकिन चीनी विदेश मंत्रलय के प्रवक्ता गैंग शुआंग ने मसूद अजहर और एनएसजी में भारत की सदस्यता से जुड़े सवाल टाल दिए। सवाल यह उठता है कि जब प्रमुख तीनों मुद्दों में से दो पर चीन अपने पुराने निर्णय पर अडिग हो तो वार्ता के नतीजों को किस रूप में देखा जाना चाहिए? ध्यान रहे, जब दो देश अपने विवादित पारंपरिक मुद्दों को भुलाकर समान हितों पर सहमति बनाते हैं, तो उसे रणनीतिक वार्ता कहा जाता है। विशेषकर उन परिस्थितियों में, जब अमेरिकी नीति एशिया पीवोट से मास्को पीवोट की ओर शिफ्ट हो रही हो और मास्को का नजरिया नई दिल्ली से इस्लामाबाद की ओर शिफ्ट होता दिख रहा हो, तब यह आवश्यक हो जाता है कि नई दिल्ली बीजिंग की गतिविधियों को बेहद गंभीरता से देखे और उसे मास्को-इस्लामाबाद के बीच सेतु बनने से रोके। हालांकि चीन पाकिस्तान को अपना ऑलव्हेदर दोस्त मानता है और सीपीईसी तथा स्ट्रिंग ऑफ पल्र्स में पाकिस्तान को रणनीतिक महत्व के केंद्र में रख आगे बढ़ रहा है। ऐसे में यह बेहद मुश्किल प्रश्न है कि बीजिंग का इस्लामाबाद प्रेम कम होगा या फिर वह नई दिल्ली के प्रति अपना नजरिया बदलेगा। हालांकि बीजिंग अपने समक्ष आ रही चुनौतियों को देखते हुए नई दिल्ली के प्रति अगर अपना नजरिया बदल ले तो आने वाले समय में वह कहीं अधिक लाभ की स्थिति में रहेगा, लेकिन शायद वह ऐसा करेगा नहीं।
 डॉ. रहीस सिंह (अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार)
Contact us: contact@rajexpress.com
Copyright © 2016 RajExpress.com. All Rights Reserved.
Designed by : 4C Plus