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संपादकीय

विषमता का एक पहलू यह भी

By Raj Express | Publish Date: 3/1/2017 12:58:24 PM
विषमता का एक पहलू यह भी

 वर्ष-1992 के बाद देश में आर्थिक विषमता बढ़ी है, गरीब तो और गरीब हुआ है, जबकि अमीर और भी अमीर। यह वह तीखा सच है, जिस पर देश-विदेश की तमाम संस्थाएं समय-समय पर प्रकाश डालती ही रहती हैं, लेकिन दुनिया की जानी-मानी बाजार पर शोध करने वाली संस्था ‘न्यू वल्र्ड वेल्थ’ ने अपनी ताजा रिपोर्ट में आर्थिक विषमता के दूसरे पहलू की तरफ भी ध्यान खींचा है। इसके अनुसार भारत के महानगरों में समृद्धि ज्यादा बढ़ी है, जबकि छोटे शहरों और कस्बों में कम। जो शहर जितना छोटा है, उसमें समृद्धि भी उतनी ही कम बढ़ी है, जबकि गांवों का हाल बहुत बुरा है। यदि इस रिपोर्ट को सही मानें तो भारत के गांव 1992 के बाद से गरीब से गरीब होते चले गए हैं। वैसे भी यह तथ्य गलत नहीं हो सकता, क्योंकि हमारे गांव और ग्रामीण किन विषम परिस्थितियों में जी रहे हैं, सभी को पता है। वहां के रोजगार के मूल साधन खेती की कमर टूट गई है, इसलिए ग्रामीणों को रोजगार के लिए शहरों की तरफ पलायन करना पड़ता है। बेशक, सरकारें किसानों को तमाम सुविधाएं दे रही हैं, पर इस सच से मुठभेड़ किए बिना बात नहीं बनेगी कि किसानी अब लाभ का धंधा नहीं रह गई है।

गांवों की तरह कस्बे और छोटे शहर भी अगर विकास की दौड़ में पिछड़ गए हैं तो इसके कारण भी स्पष्ट हैं। यहां न तो उस तरह से उद्योग स्थापित हो रहे हैं, जैसे होने चाहिए और न ही रोजगार के आधुनिक साधनों का भी विस्तार हुआ। यहां सेवा क्षेत्र का जरूर विस्तार हो रहा है, लेकिन इतना नहीं कि वह वहां के नागरिकों को वहीं उनकी योग्यता के अनुसार रोजगार मुहैया करा सके। अत: कस्बों और छोटे शहरों के लोग भी महानगरों की तरफ पलायन करने लगे हैं, क्योंकि ये वे नगर हैं, जो विकासहीनता के महासागर में विकास के टापुओं की तरह उभरे हैं। न्यू वल्र्ड वेल्थ की रिपोर्ट के अनुसार मुंबई देश का सबसे समृद्ध शहर है, जहां 28 अरबपति और 46 हजार करोड़पति रहते हैं। 18 अरबपतियों और करीब 23 हजार करोड़पतियों के साथ दिल्ली का स्थान दूसरा है। बेंगलुरू तीसरे स्थान पर है, जहां सात अरबपति और छह हजार करोड़पति रहते हैं। कुल मिलाकर इस सूची में जितने भी शहर शामिल हैं, वे देश के बड़े-बड़े महानगर हैं, चाहे चेन्नई हो या पुणो या इंदौर।
वैसे तो गरीबों-अमीरों के बीच की चौड़ी होती आर्थिक खाई भी बहुत ही चिंता का विषय है, लेकिन उससे भी ज्यादा चिंता की बात विकास का महानगरों तक सिमटते जाना है। रोजगार के लिए लोग इन्हीं नगरों में पहुंचते हैं, जिसकी वजह से इन पर आबादी का बोझ बढ़ रहा है। इसी का नतीजा है कि इन महानगरों में आबादी के हिसाब से स्वास्थ्य और शैक्षिक सुविधाएं कम होती जा रही हैं। न पानी की माकूल व्यवस्था हो पाती है, न बिजली की। यदि विकास को विकेंद्रित किया जाए, उद्योगपतियों-कंपनियों को छोटे-छोटे शहरों में कारोबार स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए तो ही यह समस्या सुलझेगी, वरना नहीं। इस दिशा में तभी कुछ होगा, जब हम न्यू वल्र्ड वेल्थ की रिपोर्ट को चुनौती की तरह स्वीकार करेंगे।
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