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संपादकीय

रोमांच बढ़ाने लगा है उत्तरप्रदेश का चुनाव

By Raj Express | Publish Date: 3/2/2017 11:17:30 AM
रोमांच बढ़ाने लगा है उत्तरप्रदेश का चुनाव

उत्तरप्रदेश के मिजाज को समझ पाना इस समय जितना कठिन है, उतना इससे पहले शायद ही कभी रहा हो। अब तक का अनुभव यह है कि लोकसभा व विधानसभा के चुनाव में आमतौर पर समझ में आ जाता था कि ऊंट किस करवट बैठ रहा है, मगर इस बार ऐसा नहीं है। चुनावी राजनीति के ज्ञाता भी कुछ नहीं बता पा रहे हैं। जब उनसे सवाल करो कि उत्तरप्रदेश में अब की बार किसकी सरकार, तो वे बगल में झांकने लगते हैं या फिर इस प्रकार के निष्कर्ष निकाल देते हैं कि जब इन चुनावों के परिणाम आएं, तो वे गलत साबित न हों। हम भी उत्तरप्रदेश के नतीजों को लेकर कुछ नहीं कहना चाहते। यह अनैतिक होगा एवं चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन भी। अत: जब तक अंतिम चरण का मतदान न हो जाए, हम सड़क छाप भविष्यवाणी करने से बचें। लेकिन मतदाताओं की चुप्पी और सूझ-बूझ जरूर गौरतलब है, जिसने चुनावी पंडितों को ही नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों को भी चकरा दिया है। वैसे तो अपनी-अपनी जीत का दावा सभी कर रहे हैं, लेकिन जब इस तरह का दावा किया जाता है, तो हम देखते हैं कि नेताओं का आत्मविश्वास डोला हुआ है।

भाजपा के सबसे बड़े प्रचारक और देश के प्रधानमंत्री पहले तो अपने भाषणों में साफ-साफ कहते थे कि उनकी पार्टी को ही उत्तरप्रदेश की जनता पूर्ण बहुमत देगी, लेकिन अब वे कहने लगे हैं कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी द्वारा उत्तरप्रदेश की विधानसभा को त्रिशंकु बनाने की साजिशें हो रही हैं। बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती को यदि हर जनसभा में कहना पड़ रहा है कि चाहे कुछ भी हो जाए, पर उनकी पार्टी अब भाजपा के साथ मिलकर सरकार नहीं बनाएगी, तो इसका मतलब यही है कि उनका आत्मविश्वास भी कमजोर पड़ने लगा है। वैसे, उनके इस बयान का मतलब यह भी है कि वे मुस्लिमों से यह वादा कर रही हैं कि वे भाजपा से दूर रहेंगी। वस्तुत: गुजरे वक्त में उन्होंने इस पार्टी के साथ मिलकर सरकारें बनाई हैं एवं यह तो बताने की जरूरत ही नहीं कि कारण यही है, जो उन्हें मुस्लिमों के वोट उनकी पार्टी को मिलने के प्रति आश्वस्त नहीं होने देता। यह तथ्य भी न तो राजनीतिक दलों से छिपा है और न ही जानकारों से कि भाजपा कहती चाहे कुछ भी रहे, लेकिन मुस्लिमों के वोट उसे नहीं मिलते हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में उसे थोड़े-बहुत मुस्लिम वोट मिले भी थे। इसका कारण यह है कि उस समय नरेंद्र मोदी की जो छवि थी, वह विकास पुरुष की थी। लेकिन उसके बाद चीजें बड़ी तेजी से बदली हैं। नरेंद्र मोदी की छवि को साक्षी महाराज, साध्वी निरंजन ज्योति, योगी आदित्य नाथ आदि फायर ब्रांड हिंदुत्ववादी नेताओं ने नुकसान पहुंचाया है। ऐसे में मुस्लिम भाजपा के साथ तो गए ही नहीं होंगे, ऐसे दल से भी बचेंगे, जो उसके साथ जाता रहा हो। मायावती इसीलिए उन्हें बार- बार आश्वस्त करती हैं, पर इसकी दूसरी वजह यह है कि उनका आत्मविश्वास कमजोर पड़ा है। उन्हें चुनावों को लेकर तरह-तरह की आशंकाएं हैं।

यही कहानी उत्तरप्रदेश की सत्ता के तीसरे दावेदार अखिलेश की भी है। वैसे तो उनके कमजोर आत्मविश्वास का पता तब ही चल गया था, जब उन्होंने कांग्रेस के साथ गठजोड़ किया था। यह बात, जो कि भाजपा के ज्यादातर नेता कहते हैं, पूरी तरह से सच है कि अगर अखिलेश को भरोसा होता कि वे सत्ता में अपने दम पर वापस आ जाएंगे तो वे गठबंधन कतई नहीं करते। मगर उसके बाद भी उनका आत्मविश्वास बढ़ा नहीं है। मुस्लिम वोटों के दूर होने का डर उनके मन में समाया हुआ है। अत: वे बार-बार यही कहते हैं कि बुआ (मायावती) एक बार फिर भाजपा के साथ न केवल रक्षाबंधन मना सकती हैं, बल्कि मोदी को भी इससे परहेज नहीं होगा। वे आरोप लगाते हैं कि दोनों को सत्ता चाहिए, वह चाहे जैसे मिले। उनका यह आरोप अपनी जगह है, लेकिन सामने जो तथ्य आता है, वह यह है कि उत्तरप्रदेश के मतदाताओं के मन की थाह मिल ही नहीं रही है, इसीलिए एक भी राजनीतिक दल अपने ऊपर भरोसा नहीं कर पा रहा है, न भाजपा, न मायावती और न ही अखिलेश यादव। मतदाताओं के दिमाग में क्या था, यह समझने के लिए हमने भी कम प्रयास नहीं किए, पर हासिल कुछ भी नहीं हुआ। और तो और, यह बात भी समझ में नहीं आई कि इस बार मतदाताओं ने जाति और धर्म की दीवारों को तोड़कर वोट डाला है या वे उनके भीतर ही हमेशा की तरह कैद बने रहे हैं? यहां जो बात दावे के साथ कही जा सकती है, वह यह है कि ज्यादातर मुस्लिम मतदाता अपने धर्म की दीवारों में कैद बने रहे हैं। यह भी कहा जा सकता है कि मायावती का पारंपरिक वोटबैंक यानी जाटव उनके साथ रहा, तो अखिलेश के साथ यादव भी रहे हैं। लेकिन सवर्ण, खासतौर पर ब्राह्मण किस तरफ गए, कोई नहीं बता सकता। कम संख्या वाली पिछड़ी और दलित जातियां किस ओर गईं, यह भी रहस्य है। इस तरह यह चुनाव पूरी तरह रहस्य की चादर में लिपटा हुआ है। ऐसे में कुछ भी कहना असंभव है और राजनीतिक दलों का आत्मविश्वास अगर लड़खड़ाने लगा है, तब गलत वह भी नहीं। मतदाताओं की यह समझ सराहनीय है।

 श्वेता (स्वतंत्र टिप्पणीकार)

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