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संपादकीय

सही आर्थिक पैमाना नहीं विकास दर!

By Raj Express | Publish Date: 3/3/2017 1:39:34 PM
सही आर्थिक पैमाना नहीं विकास दर!
केंद्रीय सांख्यिकी संगठन ने चालू वित्तीय वर्ष की तीसरी तिमाही (अक्टूबर से दिसंबर-2016) के आंकड़े जारी किए, जिनमें अनुमान लगाया गया है कि इस अवधि में देश की विकास दर (जीडीपी) सात प्रतिशत रही है। अगर इस आंकड़े पर सवाल उठाया जा रहा है तो इसका कारण यह है कि नवंबर में सरकार ने नोटबंदी कर दी थी। कोई माने या न माने, पर नोटबंदी का देश की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ा है। रोजगारों के अवसरों में साफ-साफ कमी देखी जा सकती है। छंटनियों की जो खबरें नवंबर में आना प्रारंभ हुई थीं, वे अब भी आ रही हैं व इस दुखद सिलसिले पर पूर्ण विराम शायद अप्रैल-2017 के बाद लगेगा। तब, जब अर्थव्यवस्था रफ्तार पकड़ेगी। नोटबंदी का एक सच यह भी है कि देशभर में बहुत सारे छोटे-छोटे कारोबार करीब -करीब बंद हो गए हैं। विनिर्माण क्षेत्र मंदा पड़ा है, जबकि सबसे ज्यादा नुकसान रियल इस्टेट क्षेत्र को पहुंचा है। अत: मजदूरों को तमाम संकटों के दौर से गुजरना पड़ रहा है। छोटे-छोटे दुकानदारों से लेकर ठेले-खोमचे वालों के काम पर भी असर पड़ा है। इन आर्थिक हालातों में विकास दर में गिरावट दर्ज की जानी चाहिए थी। बेशक, वह पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में कम है। इन्हीं दिनों पिछले साल विकास दर 7.4 के आसपास थी, जो कि अब सात फीसदी बताई जा रही है। जाहिर है कि इस दर में 0.4 फीसदी की गिरावट आई है, पर यह वैसी गिरावट नहीं है, जिसके बारे में माना जाए कि नोटबंदी के कारण अर्थव्यवस्था को जो नुकसान पहुंचा है, वह इस गिरावट में समायोजित हो गया होगा। अगर सात फीसदी विकास दर को सही मान लें तो मानना यह भी पड़ेगा कि नोटबंदी से भारतीय अर्थव्यवस्था को बिलकुल भी नुकसान नहीं पहुंचा है। हम यह बात मान भी लेते, पर जमीनी हकीकत ऐसा मानने नहीं दे रही। फिर, तमाम अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं नोटबंदी के बाद विकास दर में गिरावट का अनुमान बता चुकी हैं। दुनिया के तमाम नामचीन अर्थशास्त्री भी विकास दर में गिरावट के अनुमान जाहिर कर चुके हैं। यहां तक कि हमारे रिजर्व बैंक ने तक चालू वित्त वर्ष में विकास दर में गिरावट का अनुमान जताया है। पहले उसने यह अनुमान लगाया था कि चालू वित्तीय वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर 7.5 फीसदी रहेगी। नोटबंदी के बाद उसने इस अनुमान को घटाकर 7.1 फीसदी कर दिया था। उसने एक बार फिर अनुमान घटाया और उसे 6.9 कर दिया। सबसे ज्यादा चिंता चालू वित्तीय वर्ष की तीसरी एवं चौथी तिमाही को लेकर ही थी। दरअसल, ये वह तिमाहियां हैं, जिन पर नोटबंदी का सबसे ज्यादा प्रभाव अनुमानित किया गया था। लेकिन तीसरी तिमाही के परिणाम तो कुछ और ही कह रहे हैं। सात फीसदी विकास दर का मतलब यह है कि अर्थव्यवस्था पर नोटबंदी का दुष्प्रभाव पड़ा ही नहीं। लिहाजा, मोदी सरकार विरोधी अर्थशास्त्री और विपक्षी दल यह सवाल उठा रहे हैं कि सरकार ने जीडीपी के आंकड़ों को ‘मैनेज’ कर लिया है, ताकि देश को यह बताया जा सके कि देखो, नोटबंदी का देश की अर्थव्यवस्था पर जरा भी असर नहीं पड़ा है। सरकार जब यह मानने को तैयार नहीं होती कि नोटबंदी ने अर्थव्यवस्था पर थोड़ा-बहुत बुरा असर डाला है, तब यह सवाल वाजिब सा लगने लगता है। मगर याद रखिएगा कि लगने और होने में बहुत फर्क होता है। जैसा लग रहा है, वैसा हो भी, यह जरूरी नहीं है। जो लोग जीडीपी की गणना के तरीकों को जानते हैं, वे यह भी जानते होंगे कि इसके आंकड़ों को मैनेज नहीं किया जा सकता। जीडीपी की गणना का काम छह संस्थाएं अलग-अलग करती हैं। अलग-अलग आर्थिक सेक्टरों की विकास दर भी अलग-अलग मापी जाती है। जैसे-विनिर्माण क्षेत्र की दर अलग से मापी जाती है, तो कृषि, सेवा क्षेत्र आदि तमाम क्षेत्रों की अलग। फिर, इन सेक्टरों के अंदर जो इकाइयां होती हैं, उनकी भी अलग-अलग विकास दर निकाली जाती है। जैसे-हम विनिर्माण क्षेत्र का उदाहरण दें तो उसकी वस्त्र, मोटर, औषधि आदि दर्जनों इकाइयों की विकास दर अलग-अलग निकाली जाती है। विभाजन यहीं तक सीमित नहीं है। ऑटोमोबाइल (मोटर) सेक्टर के भीतर जाकर यह भी देखा जाता है कि ट्रकों की विकास दर कितनी रही, कारों, जीपों, दुपाहिया आदि की कितनी रही। दुपाहिया के भीतर जाकर अलग-अलग कीमतों के अलग-अलग वाहनों की विकास दर भी देखी जाती है। यह तो उदाहरण दिया जा रहा है, सभी क्षेत्रों की इसी तरह से बाल की खाल उधेड़ी जाती है, तभी विकास दर का आकलन होता है। इसका और कोई रास्ता भी नहीं है।
केंद्रीय सांख्यिकी संगठन केवल यह करता है कि सभी प्रकार के आंकड़ों को मिला कर हमारे सामने एक आंकड़ा रख देता है। साफ है कि विकास दर को मैनेज नहीं किया जा सकता। सरकार यदि इस काम में लग जाएगी तो वह केवल यही कर पाएगी, शेष कामों के लिए उसके पास समय नहीं बचेगा। ऐसे में विकास दर को मैनेज करने का आरोप गलत है। पूरी तरह गलत। समझना यह होगा कि विकास दर अर्थव्यवस्था को मापने का सही पैमाना नहीं है। सो, जरूरत इसकी जगह किसी दूसरे पैमाने को लाने की है।
 डॉ. अनीता (आर्थिक मामलों की जानकार)
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