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संपादकीय

राजनीति में गिरावट:दोषी कौन?

By Raj Express | Publish Date: 3/3/2017 1:41:32 PM
राजनीति में गिरावट:दोषी कौन?
हालांकि, यह मान लेना सही नहीं है कि हमारे यहां चुनाव अभियानों में भाषा का स्तर बिलकुल गिर गया है। इससे भी सहमत होना कठिन है कि चुनाव पूरी तरह वास्तविक मुद्दों से विरक्त हो गया है। इसी तरह यह मानना भी गलत होगा कि चुनाव अभियान में भाषा का स्तर मर्यादाओं की सीमा के अंदर बना हुआ है या चुनाव काफी हद तक मुद्दों पर ही लड़े जा रहे हैं। इन दोनों में दुखदायी गिरावट कोई भी महसूस कर सकता है। संसदीय लोकतंत्र की कुछ अच्छाइयां हैं, तो कुछ दोष भी इसके साथ आबद्ध हो गए हैं। दुर्भाग्यवश, चुनाव इसमें सवरेपरि हो गया है। वही आपके सत्ता में जाने या सत्ता से बाहर रहने का निर्धारण करता है। जब चुनाव सवरेपरि है, तो फिर राजनीतिक दलों और नेताओं में हर हाल में जीतने की मानसिकता पैदा होती है। इसके लिए चुनाव अभियान में घातक प्रतिस्पर्धा चलती है। मतदाताओं के समक्ष स्वयं को बेहतर तथा दूसरे को बेकार साबित करना ही इस प्रतिस्पर्धा का मुख्य स्वर होता है। ऐसे में दूसरे के सम्मान का कौन ध्यान रखे, कौन सोचे कि भाषणों को मान्य मुद्दों तक सीमित रखा जाए, सामने वाले नेता के सम्मान का भी ध्यान रखा जाए। कौन पूरी तरह संयमित होकर पराजय का जोखिम उठाने जाए..। इस घातक प्रतिस्पर्धा ने हमारे चुनाव अभियान को वाकई बट्टा लगाया है। वैसे तो भारत के अलावा विकसित देशों के चुनाव अभियानों में भी हमने भाषा की मर्यादाएं टूटते देखीं। पिछले वर्ष अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप और हिलेरी क्लिंटन के खेमे ने एक दूसरे पर कैसे-कैसे आरोप लगाए, वह सब हमारे सामने है। अमेरिकी मीडिया ने भी माना कि उसके यहां चुनाव का स्तर इतना पहले नहीं गिरा था। अब यह तो तुलनात्मक अध्ययन से ही समझ में आएगा कि पहली बार ऐसा हुआ या इसके पहले भी हुआ था। किंतु हमारे यहां यह मानना होगा कि कई मामलों में चुनाव अभियान का स्तर निचले पायदान को छू जाता है। कई बार बड़े माने जाने वाले नेता भी अपने आप पर संयम नहीं रख पाते। यह भी न भूलिए कि हमारा ध्यान केवल उन भाषणों, वक्तव्यों की ओर जाता है, जो मीडिया के माध्यम से हम तक पहुंचते हैं। ऐसे अनेक वक्तव्य और भाषण हम तक आते भी नहीं होंगे, जो कहीं ज्यादा शर्मनाक या जहर बुझे हो सकते हैं। तब सवाल उठता है कि ऐसा क्यों होता है? क्या इससे बचा नहीं जा सकता? चुनाव में जीतने की आकांक्षा होना बुरा नहीं है। कोई दल या नेता राजनीति करता है, तो उसका लक्ष्य सत्ता में जाना होगा, जिसके जरिए वह अपनी सोच को साकार कर सके। इसके लिए उसमें चुनाव जीतने की चाहत होनी ही चाहिए। लेकिन चुनाव जीतें तो कैसे? किन रास्तों पर चलकर चुनाव अभियान को सफल बनाएं, यह प्रश्न तो सामने होना चाहिए? वास्तव में यह राजनीतिक सोच, शिक्षा, समझ, संस्कार और निर्धारित लक्ष्य पर निर्भर करता है कि आप कितने संयमित और संतुलित रहते हैं। कहा जाता है कि संविधान की स्वीकृति के बाद पहले आम चुनाव और उसके पूर्व या बाद के राज्यों के चुनावों में बिलकुल आदर्श माहौल था। लोगों के सामने नेता सामान्य ढंग से जाते थे और अपने मुद्दे रखते थे। उस समय राष्ट्र निर्माण का भाव सवरेपरि था। नेताओं के लिए सत्ता साध्य नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण, जन कल्याण का साधन मात्र थी, इसलिए चुनाव अभियान का ऊंचा स्तर बना रहा। दूसरे चुनाव तक भी यही हालत रही, लेकिन तीसरे आम चुनाव से स्थितियां बिगड़ने लगीं। जिस माहौल में भारत को आजादी मिली और उसके लिए संघर्ष करने वाले सत्ता में आए, उसमें एक-दूसरे के प्रति सम्मान का भाव रहा ही होगा। पर यह न भूलं विपक्ष नहीं था। संसद और विधानसभाओं के अंदर तो छोड़िए, बाहर भी विपक्ष का अभाव था। ईश्वर ने उस समय के नेताओं को विशेष सांचे में ढालकर भेजा व आज उसने सांचा बदल दिया, ऐसा नहीं है। हां, बहुत से नेताओं को आजादी के संघर्ष से जो संस्कार मिले थे, उनकी छाप राजनीति पर थी। तब जितने राजनीतिक दल बने, सबके पीछे गहरा आदर्श था। वे चुनाव में जाते थे, तो लोगों के सामने रखते थे कि उन्हें कैसा भारत बनाना है। जब आप इस तरह के मुद्दे सामने रखते हैं, तो इसमें स्तर गिरने की आशंका ही नहीं होती। ज्यादा से ज्यादा आप सरकार की आलोचना करते हैं कि वह इन मोर्चो पर कैसे विफल है। ऐसे चुनाव अभियान में यदि भाषा का स्तर गिरेगा भी तो उसकी सीमाएं हांगी। अब आज की स्थिति से उसकी तुलना कर लीजिए। राजनीति केवल चुनाव के दौरान सक्रिय होने का कार्य नहीं है। यह एक सतत प्रक्रिया है। हमारे देश में जितने दलों का निर्माण हुआ, उनमें से ज्यादातर अपने विस्तार के लिए लोगों के बीच सतत जाते थे, उन्हें अपने विचारों से अवगत कराते थे, उन्हें अपने साथ जोड़ते थे। जो जुड़ गए, उन्हें विचारधारा का प्रशिक्षण मिलता था। यही नहीं, पार्टियां और नेता जनता के मुद्दां को लेकर संघर्ष करते थे। आजादी के बाद भी विपक्ष के बड़े-बड़े नेताओं को आंदोलनों में जेल जाना पड़ता था।थोड़े शब्दों में कहंे तो जनता से सतत जुड़ाव, लोगों को अपनी विचारधारा से जोड़ना, राजनीतिक कार्यकर्ताओं का निर्माण तथा जन समस्याआंे को लेकर जन-जागरण व संघर्ष, यही राजनीति थी। राजनीति का अर्थ केवल चुनाव नहीं होता था और चुनाव में भी जीत-हार से ज्यादा महत्व इस बात का होता था कि हमने कितनी Ÿोष्ठ राजनीति की है। इसमें यह कला भी लोग सीख जाते थे कि चुनाव आएगा, तो कैसे भाषण देना है, क्या मुद्दे उठाने हैं तथा लोगों से कैसे संपर्क करना है। ये स्थितियां आज लुप्तप्राय हैं।
जब राजनीतिक विचारधारा का प्रशिक्षण ही नहीं है, तो ऐसा लगता है, जैसे राजनीति का मतलब केवल चुनाव लड़ना तथा सत्ता तक पहुंचना है। सत्ता ही साध्य और साधन, दोनों हो गयी है। सत्ता भी ऐसी, जो आपको शक्ति देती है और अगर आप भ्रष्ट हैं तो आपको संपत्ति भी प्रदान करती है। ऐसे में इसके लिए दूसरे को जितना लांछित किया जाए, वह कम ही होता है।
चुनाव अभियान का स्तर गिरने का अर्थ केवल और केवल शब्दों का गिरता स्तर नहीं है। आप चुनाव जीतने के लिए यदि प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से जाति, समुदाय, संप्रदाय, क्षेत्र, भाषा की भावना उभारते हैं, मतदाताओं को किसी तरह का प्रलोभन देते हैं, लालच देते हैं, तो यह सब भी चुनावी स्तर का भू-लुंठित होता जाना ही है, राजनीति की मर्यादा का तार-तार होना ही है। यह प्राय: हो रहा है। आज कुछ लोग यह विचार देने लगे हैं कि दरअसल, लोकतंत्र की संसदीय प्रणाली में ही दोष है, जिसमें सत्ता की चाहत का भाव पैदा होता है तथा राजनीति विकृत होती है। इस प्रणाली में दोष हैं, लेकिन मूल दोष तो हमारे राजनीतिक प्रतिष्ठान में है। यह प्रतिष्ठान अगर चाहे तो संसदीय लोकतंत्र सुंदर हो सकता है।
 अवधेश कुमार (वरिष्ठ पत्रकार)
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