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संपादकीय

महिला विरोधी है यह फैसला

By Raj Express | Publish Date: 3/3/2017 1:53:53 PM
महिला विरोधी है यह फैसला

 तेलंगाना सरकार ने एक ऐसा निर्णय लिया है, जो निहायत ही गलत है। उसने राज्य के सामाजिक कल्याण महिला आवासीय महाविद्यालयों में शादीशुदा महिलाओं का प्रवेश रोक दिया है। वर्ष-2017 की प्रवेश परीक्षा के लिए जारी की गई नियमावली में साफ तौर पर लिखा गया है कि केवल अविवाहित महिलाएं ही आवेदन करें। अब तक इन महाविद्यालयों के स्नातक पाठ्यक्रमों में विवाहित महिलाएं भी प्रवेश लेती रही हैं। यह सही है कि इनमें प्रवेश परीक्षा के जरिए दाखिला मिलता है, मगर इस परीक्षा में बैठने की मनाही राज्य की किसी भी महिला के लिए नहीं थी, जबकि राज्य सरकार की अब अगर चल गई तो शादीशुदा महिलाएं शिक्षा के इन मंदिरों में प्रवेश नहीं ले पाएंगी। यह निर्णय जितना गलत है, उससे ज्यादा गलत वह तर्क है, जो इन महाविद्यालयों को चलाने वाली संस्था के प्रमुख ने दिया है। उन्होंने कहा है कि शादीशुदा महिलाएं लड़कियों का ध्यान भटकाती हैं। जब उनके परिजन और पति उनसे मिलने के लिए आते हैं, तो लड़कियों का ध्यान पढ़ाई से उचटता है। जब इस हास्यास्पद तर्क के लिए उन्हें धिक्कारा जाने लगा तो उन्होंने झट से दूसरा तर्क हाजिर कर दिया। उन्होंने बताया कि बाल विवाह पर रोक लगाने के लिए आवासीय महाविद्यालयों में शादीशुदा महिलाओं को पढ़ने से रोका गया है। लेकिन दलील तो यह भी सही नहीं है। सरकार बाल विवाह के खिलाफ अपनी विधानसभा में कानून पास कराए और उसे लागू करे। फिर मान ही लंे कि उसकी मंशा बाल विवाह रोकने की है, तो समझ में यह नहीं आता कि जिन लड़कियों का विवाह बचपन में हो ही चुका है, उन्हें पढ़ाई से रोकने से बाल विवाह कैसे रुकेंगे? हम जिस समाज में रह रहे हैं, उसमें पहली बात तो यही है कि ज्यादातर लोग लड़कियों को पढ़ाना ही नहीं चाहते और दूसरी बात, जो लोग अपनी बेटियों को पढ़ाते हैं, उनमें भी ऐसे ही ज्यादा हैं, जो उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए पढ़ाते हैं, ताकि उन्हें अच्छा घर और वर मिल सके। जिस समाज की औसत सोच लड़कियों के विवाह तक जाकर खत्म हो जाती है, उसके लोग आवासीय महाविद्यालयों में पढ़ाई की लालच में लड़कियों का विवाह नहीं करेंगे, यह बात कौन मानेगा? लिहाजा, कहानी कुल मिलाकर यही है कि पहले गलत निर्णय ले लिया गया और फिर उसे सही साबित करने के लिए तर्को का जाल बुना जा रहा है। यह उस लक्ष्य के खिलाफ है, जिसे हासिल करने के लिए आंध्रप्रदेश (तेलंगाना) में आवासीय महिला महाविद्यालय खोले गए थे, वर्ष-1988 में। इनका लक्ष्य लड़कियों को नि:शुल्क शिक्षा देकर समाज को उनकी शिक्षा के प्रति जागरूक करना था। आंध्र के विभाजन के बाद ऐसे 23 महाविद्यालय तेलंगाना के हिस्से में आए हैं, जिनमें चार हजार महिलाएं पढ़ रही हैं। महिला संगठनों ने वैसे तो तेलंगाना सरकार के इस निर्णय का विरोध प्रारंभ कर दिया है। अत: हो सकता है कि वह अपने कदम पीछे खींच ले, पर जवाब तो इस प्रश्न का मिलना चाहिए कि इस तरह के निर्णय लिए क्यों जाते हैं, महिला विरोधी सोच के तहत या चर्चा में आने हेतु?

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