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संपादकीय

सीबीएसई का निर्देश बच्चों के हित में

By Raj Express | Publish Date: 3/4/2017 11:29:55 AM
सीबीएसई का निर्देश बच्चों के हित में

 बच्चों की सुरक्षा को लेकर केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा मंडल (सीबीएसई) ने निर्देश दिया है कि जो बच्चे घर से स्कूल तक स्कूल बस से जाते हैं, उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी अब संबंधित स्कूल की होगी। लापरवाही करने पर स्कूल की मान्यता तक रद्द हो सकती है। यह निर्देश वास्तव में सर्वोच्च न्यायालय के एक आदेश के तारतम्य में दिया गया है। यह स्थिति का कैसा व्यंग्य है कि जिस देश में बच्चों को बालगोपाल, बालकृष्ण और लड्डूगोपाल की पावन वात्सल्यमयी अवधारणा से जोड़ा गया है, उस देश में घर से स्कूल की आवक-जावक जैसे प्रसंग में तक सुरक्षा का मुद्दा इतना अहम हो गया है कि माध्यमिक शिक्षा का नियमन करने वाले केंद्रीय संस्थान को सक्रियता दिखाकर सीधा हस्तक्षेप करना पड़ा है। तब स्थिति निश्चित ही चिंतनीय है। भारतीय वांग्मय में वात्सल्य को एक प्रमुख रस माना जाता है। भक्तकवि सूर और तुलसी ने भगवान राम और कृष्ण के बालपन को लेकर अत्यंत सुंदर व सरस साहित्य की रचना की है। नजीर अकबराबादी और निदा फाजली ने बच्चों पर जो कुछ लिखा है, वह उर्दू साहित्य की थाती है। फिर बच्चों के लिए अलग से बाल साहित्य की रचना हो रही है। विचारणीय है कि हमारा अर्थाधारित एवं घोर भौतिकवादी समाज आज कहां से कहां पहुंच गया है, जो संविधान सम्मत बाल अधिकारों के बावजूद बच्चों की सुरक्षा के लिए इस तरह के हस्तक्षेप करने पड़ रहे हैं। समाजशास्त्री कहते हैं कि हम बच्चों से उनका बचपन छीन रहे हैं। शिक्षाविद् बच्चों के भारी भरकम स्कूल बैग को लेकर चिंतित रहते हैं, जिनका वजन बहुधा संबंधित छात्र के वजन से भी ज्यादा होता है। चिंताओं के इन आयामों में भी क्या बच्चों की सुरक्षा जैसे मूल तत्व के लिए कोई जगह नहीं है? वर्तमान में शिक्षा क्षेत्र का घोर बाजारीकरण हो गया है। डॉ. अंबेडकर और डॉ. कलाम जैसे महापुरुष तथाकथित पब्लिक स्कूलों के प्रोडक्ट नहीं थे, बल्कि वे तो टाट-पट्टी वाले सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे, जहां धौल-धप्पे की संस्कृति भी थी। माता-पिता या पालक अपने बच्चों को स्कूल भेजकर निश्चिंत हो जाते थे। जहां तक उनकी सुरक्षा और कुशल-मंगल का प्रश्न था, तो ठेठ देसी स्कूलों के गुरुजन छात्रों की चिंता उनके पालकों से कहीं अधिक ही करते थे। आज हम अपने बच्चों को जिन महंगे इंग्लिश स्कूलों में भेजते हैं, वे तो शिक्षा की दुकान हैं। नन्हें-नन्हें बालगोपालों को जब उनकी मम्मी या पापा उनका बैग और वाटर बॉटल लेकर स्कूल बस तक छोड़ने जाते हैं, तो उनके मन में एक ही आशा रहती है कि वही स्कूल बस तीसरे पहर उनके बच्चे को सकुशल घर वापस लाए। मगर आज तो घर से स्कूल का आना-जाना अत्यंत जोखिम भरा हो चुका है। बहुत ही असुरक्षित। पब्लिक स्कूलों में दाखिला हमने स्टेटस सिंबल बना दिया है। इन स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना हमारी हैसियत का दिखावा बनता जा रहा है। लोग रात-रात भर खड़े रहकर एडमिशन फार्म लेते हैं। दाखिले के समय ऐसे सब्जबाग दिखाए जाते हैं, मानो स्कूल का माहौल घर से सौ गुना बेहतर है। सबसे पहला सवाल बच्चों को स्कूल भेजने के लिए यातायात का होता है। महानगरों में दूरियां हैं। सम्पन्न पालक भी निजी वाहन के बदले स्कूल बस से ही बच्चों को भेजना पसंद करते हैं व यहीं से दुकानदारी चालू हो जाती है। बस मालिकों और स्कूल-प्रबंधकों के बीच विशुद्ध व्यावसायिक समझौता रहता है। मनमाना किराया लिया जाता है, क्योंकि पालकों के पास कोई विकल्प नहीं होता। यद्यपि नियम है कि स्कूल बस में कितने बच्चे ले जाए जाएं, मगर बस का कंडक्टर बच्चों को असबाब की भांति ठूंसता है व चालक अंधाधुंध चलाता है। यात्र के दौरान बच्चों की सुरक्षा शायद ही सुनिश्चित रहती हो। कभी-कभी तो बसों के कंडक्टरों या ड्राइवर द्वारा बच्चों से अशोभनीय हरकतें करने के मामले भी सुने जाते हैं। ऐसे भी प्रकरण सामने आए हैं, जब स्कूल बस के चालक-परिचालक की मिली-भगत से बच्चों का अपहरण हो गया था। जहां तक स्कूल-प्रशासन का प्रश्न है, वह भारी-भरकम फीस पहले ही जमा करा चुका होता है, जिसमें बस का किराया भी शामिल रहता है। अत: स्कूल अपनी बसों के विरुद्ध शिकायत नहीं सुनते। सभी नहीं, ज्यादातर। अब तो हमारे बच्चे स्कूल में भी सुरक्षित नहीं हैं। भोपाल के एक नर्सरी स्कूल में एक छोटी सी बच्ची के साथ जो अशोभनीय घटना घटी, उसके बाद हर पालक अपने बच्चे के प्रति चिंताग्रस्त रहेगा। यह कृत्य करने का आरोप स्कूल संचालक पर लगा है एवं पुलिस का रवैया भी घोर आपत्तिजनक रहा। जब इस मामले को स्थानीय मीडिया ने जोर-शोर से उठाया, तब कार्रवाई हुई। सवाल  है कि क्या हम अपने बच्चों को स्कूल भेजकर उनकी सुरक्षा के प्रति निश्चिंत हो सकते हैं? सो, सीबीएसई द्वारा स्कूलों को बच्चों की सुरक्षा के लिए उत्तरदायी बनाना सही है। पर इसमें एक खामी है। यह सीबीएसई का प्रशासनिक आदेश है, जबकि इसे विधिवत राज्य सरकारों के द्वारा कानून के रूप में लागू किया जाना चाहिए। इधर, सभी स्तर के स्कूलों की निरंतर मॉनीटरिंग भी होती ही रहना चाहिए, ताकि नियमों का पालन सुनिश्चित हो सके।

 घनश्याम सक्सेना (वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार)

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