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संपादकीय

क्या बगदादी पस्त पड़ गया है?

By Raj Express | Publish Date: 3/4/2017 11:33:27 AM
क्या बगदादी पस्त पड़ गया है?
खबर है कि इस्लामिक स्टेट के सरगना अबू बक्र अल बगदादी ने अपने लड़ाकों से कहा है कि वे मोसुल शहर छोड़कर भाग जाएं या फिर खुद को अल्लाह के रास्ते पर कुर्बान कर लें। इस राह पर कुर्बानी का मतलब यह है कि वे स्वयं को मार डालें यानी आत्महत्या कर लें। दुनिया के लिए यह राहत की खबर है कि बगदादी ने अब अपनी हार स्वीकार कर ली है। वैसे भी अगर आज नहीं तो कल, उसे हारना ही था। मानवता के दुश्मनों को इस दुनिया ने पहले भी हारते हुए देखा है, आगे भी यही होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है। प्रभाकरण मारा गया, ओसामा मारा गया और अगर थोड़ा पीछे मुड़कर देखें तो हिटलर व मुसोलिनी, तोजो का हश्र भी अभी बहुत पुरानी बात नहीं है, जिन्होंने इतिहास को रक्त रंजित कर दिया, फिर खुद दुर्गति को प्राप्त हुए। इन लोगों के सामने बगदादी की कोई खास हैसियत वैसे भी नहीं है। हालांकि, उसने बीते तीन-चार  वर्ष में दरिंदगी उतनी ही दिखाई, जितनी दिखा सकता था। इस्लामिक स्टेट के आतंकवादियों ने लोगों को जिंदा जलाया, जिंदा दफनाया और गर्दनों पर छुरियां चलाईं। इन दरिंदों ने छोटी से छोटी बच्चियों के साथ भी सामूहिक दुष्कर्म किए। महिलाओं को बाजार में बेचा। यह सब ज्यादातर उन लोगों-महिलाओं के साथ हुआ है, जिनकी आस्था दूसरे मजहबों में थी। यानी, ये लोग शिया, ईसाई या यजीदी थे। धर्म के आधार पर ऐसी पशुता भूतकाल में भी होती रही है, पर बगदादी के कारण प्रगतिशीलता एवं विज्ञान का आधुनिक युग भी इसका गवाह बना। लेकिन पाप का घड़ा अंतत: भरता ही है। अमेरिका और इराक की सेना के अभियान में बगदादी टिक नहीं पाया। उसे सबसे ज्यादा नुकसान तो रूस के हमलों से हुआ था। फिर, तुर्की सरकार को भी जल्दी अहसास हो गया कि पर्दे के पीछे रहकर इस्लामिक स्टेट की उसने जो मदद की है, वह उसी पर भारी पड़ रही है। अत: उसने अपनी फौज को उसके खिलाफ उतार दिया। परिणाम यह आया कि बगदादी द्वारा कब्जाया गया इराक और सीरिया का भूभाग उससे छिनने लगा। दो-ढाई वर्ष पहले उसने जिस तेजी से इन दोनों ही देशों की भूमि पर कब्जा करके अपनी खिलाफत (इस्लामिक राजशाही) की स्थापना की थी, उसी तेजी से उसका पतन भी प्रारंभ हो गया। अब तो उसके पास केवल मोसुल बचा है, लेकिन जिस तरह से इराकी फौज इस शहर को घेरकर खड़ी है, ऐसे में वह दिन दूर नहीं, जब यह शहर भी उसके नियंत्रण से बाहर निकल जाएगा। उसे भी इसका अहसास हो गया है। अत: उसने अपने लड़ाकों से भागने के लिए कह दिया है। मगर सवाल यह भी है कि क्या ऐसा सचमुच हुआ है या फिर इस प्रकार का प्रचार करने के पीछे इराक की कोई रणनीति है? यह प्रश्न तब उठता है, जब हम देखते हैं कि जिस वीडियो में अबू बक्र अल बगदादी अपने सैनिकों से भागने या मरने की अपील कर रहा है, उसका प्रसारण बस इराक के टेलीविजन चैनलों पर हुआ है। बगदादी ने अपने लड़ाकों से भागने की अपील करते हुए जो पर्चे बांटे हैं, वह भी केवल इराक की फौज को ही मिले हैं। बगदादी से पांच-छह देशों की फौजों के साथ कुर्द और शिया लड़ाके भी लड़ रहे हैं। तब वे पर्चे तो सभी को मिलने चाहिए थे, लेकिन मिले केवल इराक की फौज को हैं, तो आखिर क्यों? ऐसे में जो लोग यह मानकर चल रहे हैं कि इसके पीछे इराक की कोई चाल है, तो उनकी आशंका गलत नहीं लगती। लिहाजा, यह सवाल भी अपने आप पैदा हो जाता है कि जो आशंका जताई जा रही है, अगर वह सही भी है तो इसके पीछे इराक की चाल क्या हो सकती है? इस सवाल के केवल दो जवाब ही हो सकते हैं। हो सकता है कि बगदादी और इराक सरकार के बीच कोई समझौता हो गया हो, वह युद्ध रुकने और उसका भूभाग खाली करने की स्थिति में बगदादी को छिपाने के लिए तैयार हो गई हो। इसीलिए उसने बगदादी की अपील को प्रसारित कर दिया हो, ताकि युद्ध तो कम से कम खत्म हो ही जाए। अगर यह अनुमान सही नहीं है तो इराक की दूसरी रणनीति बगदादी का वैश्विक समर्थन कम करने की हो सकती है। गौरतलब है कि एक मोटे अनुमान के मुताबिक इस समय इस्लामिक स्टेट के पास आतंकियों की संख्या 18 हजार से भी अधिक है। सामरिक गतिविधियों पर नजर रखने वाले दुनिया के ज्यादातर जानकारों का अनुमान है कि जब से इस्लामिक स्टेट कमजोर पड़ना शुरू हुआ है, तभी से दुनिया के तमाम देशों में मौजूद उसके समर्थक परेशान हैं। जो इराक और सीरिया में जाकर उसके लिए लड़ सकते हैं, वे वहां जाने भी लगे हैं। अभी हाल ही में ब्रिटेन से 12 युवा गायब हुए थे, जिनके बारे में कहा जा रहा है कि वे इराक पहुंच गए हैं। पिछले दो हफ्तों में यूरोप के कुछ और देशों के युवाओं की इराक पहुंचने की खबर है। बांग्लादेश में पिछले तीन सप्ताह में ऐसे 47 युवक गिरफ्तार किए गए हैं, जिन पर संदेह है कि वे इस्लामिक स्टेट के पक्ष में लड़ने के लिए इराक जाने की तैयारी कर रहे थे। कुछ रूसी युवाओं के वहां पहुंचने की भी खबर है। तुर्की के युवा तो इराक या सीरिया जाते हैं और इस्लामिक स्टेट के पक्ष में लड़कर अपने देश में वापस भी चले आते हैं। अत: हो सकता है कि इराक ने बगदादी की हार का संदेश इसलिए ही प्रचारित किया हो, ताकि दुनिया के दूसरे देशों से जो युवा उसके पक्ष में लड़ने के लिए आ रहे हों, वे न आएं और उसे हराना आसान हो जाए। यदि यह रणनीति है तो लाजवाब भी है।
लेकिन इराक ने बगदादी से यदि कोई समझौता कर लिया है तो उसने अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मार ली है। जब तक उसकी जान पर खतरा है, वह भीगी बिल्ली बना रहेगा और ज्यों ही खतरा टलेगा, वह फिर से खूंखार बन जाएगा और तब इराक का ही सबसे ज्यादा नुकसान होगा। विश्व बिरादरी को हमेशा याद रखना चाहिए कि अबू बक्र अल बगदादी अब व्यक्ति से ज्यादा एक विचार बन चुका है। ऐसा विचार जो पूरी दुनिया के इस्लामीकरण का सपना देखता है। एक ऐसा विचार, जिसे अपने इस अभियान के लिए न तो बच्चों को कत्ल करने में कोई शर्म या संकोच होता है, न बुजुर्गो और महिलाओं के कत्ल में। यह विचार दुनिया में फैल भी रहा है, जिसे देख कर हर मानवता प्रेमी इंसान को चिंता होती है। सो, इराक यदि कोई गलती अगर सचमुच कर रहा है तो उसे उससे बचना ही चाहिए। लेकिन बगदादी अगर सचमुच पस्त पड़ गया है तो यह दुनिया के लिए खुशी की बात है। जो खुशी हमें बुराई की हार से मिलती है, वैसी और किसी काम से नहीं मिलती। हां, याद यह भी रखना ही होगा कि जब तक मुस्लिमों का एक धड़ा कट्टर है और जब तक दुनिया के अमेरिका जैसे देश इस कट्टरता से फायदा उठाने के चक्कर में बने रहेंगे, शक्ल बदल-बदलकर बगदादी भी पैदा होते रहेंगे। कभी ओसामा बिन लादेन तो कभी मुल्ला उमर जैसों की शक्ल में वे बार-बार आते और अपने कृत्यों से दुनिया को दहलाते रहेंगे।
 हरिशंकर द्विवेदी (सामरिक मामलों के जानकार)
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