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संपादकीय

राष्ट्रपति की चिंता पर गौर करे देश

By Raj Express | Publish Date: 3/4/2017 11:34:42 AM
राष्ट्रपति की चिंता पर गौर करे देश
देश में बढ़ती वैचारिक असहिष्णुता के कारण राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी चिंतित हैं। कोच्चि (केरल) में बुधवार को उन्होंने आजादी, असहमति, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रभक्ति को लेकर जो भी कहा है, उसे पूरे देश को सुनना चाहिए। साफ है कि जब वे यह सब कह रहे थे, तब उनके जेहन में दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में चल रहा विवाद तो होगा ही, केरल में जो हो रहा है, वह भी होगा। इन दोनों ही स्थानों पर वामपंथी और दक्षिण पंथी विचार आमने-सामने हैं। टकराव इतना प्रबल है कि लगता है कि दोनों ही समूह एक-दूसरे की तार्किक बातों को भी नहीं सुनना चाहते। यह सही है कि राष्ट्रीय कहे जाने वाले मीडिया ने केरल की घटनाओं को उतनी तवज्जो नहीं दी है, जितनी दिल्ली के रामजस कॉलेज में हुए विवाद को दी। यह विवाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के एक विवादित छात्र को रामजस कॉलेज में एक सेमिनार में बुलाने, न बुलाने को लेकर हुआ था, जो अभी चल ही रहा है। दक्षिण पंथी एवं वामपंथी छात्र समूह अब भी एक-दूसरे के विरुद्ध आंदोलित हैं। इस कारण शिक्षा के मंदिर में पढ़ाई का माहौल ध्वस्त प्राय है। लेकिन केरल में भी कोई कम उत्पात नहीं हो रहा है। आरएसएस का यह आरोप है कि वहां उसके कार्यकर्ताओं को मारा जा रहा है। संघ यह आरोप केरल में सत्तारूढ़ वामपंथियों पर लगाता है। वामपंथी ऐसा ही आरोप संघ के समर्थकों-कार्यकर्ताओं पर लगाते हैं। संघ की बात में दम तो लगता है, मगर यह कहना गलत होगा कि केरल में केवल एक ही पक्ष गलत राह पर है। दो फरवरी को मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के एक दफ्तर को आग के हवाले कर दिया गया था, फिर इस पार्टी की युवा शाखा के दो कार्यकर्ताओं की हत्या की भी खबर आई थी। उसके बाद संघ कार्यालय के आसपास बम फोड़ा गया। इसके कार्यकर्ताओं की हत्याएं भी आम बात हैं। वहां इन दोनों समूहों को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को ही याद करना चाहिए, जो कहते थे कि अगर हम आंख के बदले आंख फोड़ने पर आमादा हो उठे तो फिर दुनिया अंधों से भर जाएगी। केरल सरकार को यह बात खासतौर पर याद रखनी चाहिए, क्योंकि प्रदेश की कानून व्यवस्था उसी के हाथ में है। जो लोकतांत्रिक सरकार अपने वैचारिक विरोधियों की रक्षा नहीं कर सकती, उसे लोकतांत्रिक मानें भी तो कैसे? इस शासन व्यवस्था की बड़ी खूबसूरती यह होती है कि इसमें विरोधियों को भी अपनी बात रखने का मौका दिया जाता है। मगर दिल्ली के रामजस कॉलेज और केरल में इसी सुंदरता को नष्ट करने का ही प्रयास किया गया है। ऐसे में राष्ट्रपति की चिंता स्वाभाविक है, मगर देश के लिए चिंता की बात यह है कि दोनों ही समूह उनके बयान की अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार व्याख्या कर रहे हैं। दक्षिण पंथी समूहों को लगता है कि प्रणबदा ने केवल और केवल वामपंथियों को फटकारा है, तो वामपंथी इसके विपरीत निष्कर्ष निकाल रहे हैं। यह व्याख्या ही गलत है। राष्ट्रपति ने उन सभी ताकतों को धिक्कारा है, जो अभिव्यक्ति की आजादी की कोई सीमा नहीं मानतीं, जो विरोधी विचारों को नकारती हैं। अत: उनकी तकलीफ पूरा देश समझे।
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