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संपादकीय

किसानों पर न्यायालय की चिंता वाजिब

By Raj Express | Publish Date: 3/6/2017 11:30:23 AM
किसानों पर न्यायालय की चिंता वाजिब

देश में किसानों की आत्महत्या को रोकने के लिए तीन हफ्ते में एक रोडमैप बने, यह सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार से कहा है। उसने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा है कि किसानों की खुदकुशी का मुद्दा बेहद गंभीर है और घटना के बाद किसान-परिवारों को मुआवजा देना समस्या का असली समाधान नहीं है। किसान बैंकों से कर्ज लेते हैं और जब वे उसे चुका नहीं पाते, तो मजबूरी में खुदकुशी कर लेते हैं। सरकार इन खुदकुशियों को रोकने की योजना बनाए। कोर्ट का कहना था कि किसानों की खुदकुशी की घटनाएं कई दशकों से होती आ रही हैं और फिर भी यह ताज्जुब की बात है कि सरकारों ने खुदकुशी के पीछे की वजह पर गौर करने के लिए अभी तक कुछ नहीं किया है। अदालत की यह चिंता सही भी है। इस मामले में यदि सरकारें वाकई संजीदा होतीं तो खुदकुशी के मामलों में निश्चित तौर पर कमी आती। यह पहली मर्तबा नहीं, जब अदालत ने किसानों की खुदकुशी के मामले में सरकारों से जवाब तलब किया है, बल्कि इससे पहले जनवरी में भी उसने इन्हें खूब फटकारा था। गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय किसानों की खुदकुशी पर एनजीओ ‘सिटिजन्स रिसॉर्स एंड एक्शन एंड इनीशिएटिव’ द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा है। साल-2014 में दायर इस याचिका में दावा किया गया है कि गुजरात में 2003 से 2013 के बीच 619 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। याचिकाकर्ता की अदालत से मांग थी कि इन किसानों के परिवारों को पांच लाख रुपए का मुआवजा दिलवाया जाए। मामले की जब सुनवाई शुरू हुई, तो अदालत ने इसका दायरा बढ़ाकर पूरा देश कर दिया। उस का इस बारे में यह कहना था कि चूंकि यह समस्या पूरे देश में है, लिहाजा इस समस्या का समाधान निकाला जाना बेहद जरूरी है। बहरहाल, सुनवाई के दौरान प्रस्तुत अतिरिक्त सालिसिटर जनरल पीएस नरसिम्हा ने कहा कि वर्ष- 2015 में शुरू की गयी फसल बीमा योजना से किसानों को राहत मिलेगी। इससे आत्महत्या के मामलों में गिरावट की उम्मीद है। यही नहीं, दूसरी योजनाओं के जरिए भी किसानों को यह यकीन दिलाने की कोशिश की जा रही है कि सूखे जैसे हालात में भी सरकार उनके साथ है। इस दलील पर अदालत ने अपनी नाखुशी जतलाते हुए कहा है-‘समस्या कई दशक से चली आ रही है। अभी तक इसकी वजहों से निपटने के लिए कोई ठोस एक्शन नहीं लिया गया है। आप हमें सिलसिलेवार तरीके से बताएं कि आपकी सरकार क्या करना चाहती है।’ अदालत ने इस मामले में जिस तरह के तेवर अख्तियार किए हैं, उनसे लगता है कि अब वह सरकार को कोई रियायत देने को तैयार नहीं है। उसका यह रवैया सही भी है। सरकारों की किसान विरोधी नीतियों के कारण देश में आज किसान बेहद परेशान हैं। खाद, बीज और कीटनाशक की कीमतें बढ़ने से कृषि उत्पादों के लागत मूल्य में जिस औसत से वृद्धि हो गई है, उसके अनुपात में उन्हें फसलों के दाम नहीं मिल पाते हैं। उनके लिए खेती घाटे का धंधा बन गई है। उन्हें अकसर अपनी उपज का वाजिब दाम नहीं मिल पाता। जब फसल चौपट होती है, तब तो किसान मुसीबत में होते ही हैं, जब पैदावार अच्छी होती है, तब भी कई बार वे स्वयं को ठगा हुआ महसूस करते हैं। सत्ता में आने से पहले हर सियासी पार्टी किसानों की बेहतरी की बात करती है, लेकिन सत्ता में आते ही वे सब भूल जाती हैं। यह सिलसिला वर्षो से चला आ रहा है। अफसोस, सरकारों के द्वारा कृषि विकास व किसानों की आमदनी दोगुनी करने के दावों और वादों के बावजूद किसानों की हालत में कोई सुधार नहीं आया है। आलम यह है कि हर 24 घंटे में इस समय देश में 52 किसान आत्महत्या करते हैं। महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा किसान आत्महत्या करते हैं। सच तो यह है कि हमारे देश के सभी राज्यों की कहानी ऐसी ही है। अत: सवाल यह उठता है कि किसानों की खुदकुशी के ये आंकड़े घटने के बजाय क्यों बढ़ रहे हैं? इस सवाल का जवाब ज्यादा मुश्किल भी नहीं है। किसान खुदकुशी का यह बढ़ता सिलसिला हमारी दोषपूर्ण आर्थिक नीति का नतीजा है। एक ऐसी नीति, जिसमें गरीब और गरीब हो रहे हैं, जबकि अमीर और अमीर। किसानों की आत्महत्याओं की मुख्य वजह कर्ज है। कर्ज को चुकाने का उनके ऊपर इस कदर दवाब होता है कि वे इसी की परेशानी में आत्महत्या कर लेते हैं।फसल की बर्बादी की वजह से भी किसान आत्महत्या करते हैं। किसानों की बेहतरी के लिए सरकारों ने अभी तक कई प्रकार कमेटियां बनाईं। इन कमेटियों ने अच्छी सिफारिशें भी प्रस्तावित कीं, लेकिन फिर भी किसानों की हालत में कोई सुधार नहीं आया है। जमीनी स्तर पर आज किसानों की हालत बेहद खराब है। उन्हें तमाम परेशानियों से जूझना पड़ रहा है। सरकारें किसानों के लिए कोई ठोस काम करतीं, इसके उलट मूल समस्या को नजरअंदाज कर सिर्फ दिखावे के लिए कुछ काम हो रहे हैं। किसान टीवी एवं मृदा स्वास्थ्य कार्ड आदि अच्छी योजनाएं हैं, लेकिन किसानों की खुदकुशी को रोकने के लिए यह नाकाफी हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की चिंता वाजिब है। सरकारें भी उसकी चिंता को समझें।

 जाहिद खान (स्वतंत्र टिप्पणीकार)

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