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संपादकीय

घुटना मुड़कर पेट की तरफ गया

By Raj Express | Publish Date: 3/6/2017 11:33:09 AM
घुटना मुड़कर पेट की तरफ गया
लग यह रहा था कि महाराष्ट्र में भाजपा व शिवसेना के बीच टकराव उस समय और बढ़ जाएगा, जब बृहन्मुंबई महानगर पालिका के महापौर का चुनाव होगा और उसमें भाजपा अपना प्रत्याशी भी उतार देगी। वस्तुत: चुनाव परिणाम आने के बाद से ही जहां भाजपा यह दावा कर रही थी कि महापौर उसी का होगा, तो शिवसेना यह कि वह अपना महापौर बनाकर मानेगी। दोनों ही पार्टियों की यह भाषा उन्हें उस टकराव की ओर लेकर जा रही थी, जो बाला साहेब ठाकरे के निधन के बाद ही शुरू हो गया था। फिर तो हमने देखा ही कि शिवसेना ने नरेंद्र मोदी को भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का पीएम पद का उम्मीदवार जैसे तैसे स्वीकार किया था व लोकसभा का चुनाव मिलकर लड़ा था। इसके बाद दोनों दलों के बीच तल्खी और बढ़ती चली गई। इतनी कि महाराष्ट्र विधानसभा का चुनाव दोनों दलों ने अलग-अलग लड़ा था। यह सही है कि बहुमत का समीकरण साधने के लिए दोनों को बाद में इकट्ठा होना पड़ा था। आज की स्थिति यह है कि महाराष्ट्र की देवेंद्र फड़नवीस सरकार में शिवसेना शामिल तो है। वह केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में भी शामिल है, लेकिन दोनों में तनाव भी बरकरार है। इतना कि महाराष्ट्र के निकाय चुनाव भी दोनों दलों ने मिलकर नहीं लड़े। इसका मूल कारण यह है कि शिवसेना यह चाहती है कि महाराष्ट्र में भाजपा उसका वैसा ही सम्मान करे, जैसे वह बाला साहेब के जमाने में किया करती थी, उसे उसी तरह से अपना बड़ा भाई माने, जैसे बाल ठाकरे की शिवसेना को भाजपा मानती रही है।
मगर, वैसी स्थिति अब नहीं रही। आज की भाजपा वह नहीं, जो अटल-आडवाणी की भाजपा हुआ करती थी। आज की शिवसेना भी वैसी नहीं है, जैसी बाला साहेब के जमाने में होती थी। बाल ठाकरे का एक अलग रुतबा था, एक अलग तरह का दबदबा। उद्धव ठाकरे वह हासिल नहीं कर पाए हैं और कर भी नहीं सकते हैं। न तो वे बाला साहेब जैसे दबंग हैं, न ही उनकी संभाषण शैली और उनका व्यक्तित्व भी उनके जैसा है। अत: महाराष्ट्र में भाजपा उन पर भारी पड़ती है। एक समय इस राज्य में भाजपा कुछ हासिल कर भी लेती थी, तो उसे शिवसेना का प्रसाद माना जाता था, मगर अब उसने विधानसभा के बाद  निकाय चुनावों में भी बढ़त बनाकर सिद्ध कर दिया है कि वह शिवसेना की कृपा की आकांक्षी नहीं है। उसे केंद्र की भांति अगर महाराष्ट्र में भी भाजपा का छोटा भाई बनकर रहना है तो रहे, वरना रास्ता खुला हुआ है। दरअसल, यह मोदी की भाजपा है व शिवसेना की नाराजगी की मूल वजह भी यही है कि वह अपनी क्षमता से कहीं ज्यादा सम्मान चाहती है और निर्णयों में दखल भी, जो भाजपा देने के लिए तैयार नहीं। कारण यही था कि दोनों दलों ने निकाय चुनाव भी साथ-साथ नहीं लड़े। ज्यादातर नगर और जिला निकायों में ऊंट किसी न किसी करवट बैठ गया है, जबकि मुंबई नगर निगम की कहानी अटक गई। अपने बलबूते पर लड़कर भाजपा ने इन चुनावों में शानदार प्रदर्शन किया है। शिवसेना का प्रदर्शन भी कमजोर नहीं रहा, मगर मुंबई में बहुमत का जादुई आंकड़ा कोई नहीं छू पाया। गौरतलब है कि 227 सदस्यीय महानगरपालिका में बहुमत के लिए 114 पार्षदों की जरूरत थी, लेकिन शिवसेना के हाथ आईं केवल 84 और भाजपा को मिलीं कुल 82 सीटें। 31 सीटें तो कांग्रेस को मिलीं, जबकि नौ शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस को। निर्दलीय और छोटे-छोटे दल जहां 14 सीटें ले गए, तो वहीं राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना मात्र सात सीटें ही जीत सकी। इस समीकरण में कमजोर प्रदर्शन करने के बावजूद सत्ता की चाबी कांग्रेस के हाथ में चली गई, जिससे भाजपा का खेल खराब हो गया, शानदार चुनावी प्रदर्शन के बाद भी। चूंकि बृहन्मुंबई महानगर पालिका एशिया की सबसे धनी महानगर पालिकाओं में से एक है। हमारे देश के कई राज्यों से ज्यादा होता है, बीएमसी का बजट। फिर जो राजनीतिक दल बीएमसी पर काबिज होता है, उसको चंदा भी खूब मिलने की बात कही जाती है। शिवसेना यह चांदी की चम्मच भाजपा के लिए कभी नहीं छोड़ सकती है। भाजपा इस पर काबिज तो होना चाहती है, लेकिन अगर महापौर के चुनाव में वह अपना उम्मीदवार उतार देती तो उसकी हार पक्की थी। उसे हराने के लिए कांग्रेस या तो खुद मैदान में उतर जाती या फिर शिवसेना का समर्थन करने लगती। हालांकि, वह घोषित तौर पर समर्थन तो खैर नहीं कर सकती थी। अगर वह ऐसा करती तो उसके उन मतदाताओं में गलत संदेश जाता, जो शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ताओं से त्रस्त हैं। मगर वह भाजपा को बीएमसी से दूर रखने के लिए कुछ तो करती। फिर जब शिवसेना की समझ में आ जाता कि उसे कांग्रेस के कारण बीएमसी की सत्ता मिली है, तो लाभ का बंटवारा भी हो ही जाता। जिससे कांग्रेस की महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि केंद्रीय स्तर पर भी आर्थिक स्थिति मजबूत होती, जो कि इस समय ध्वस्त है। हरियाणा के हाथ से निकलने के बाद कांग्रेस की आर्थिक स्थिति कुछ ज्यादा ही बिगड़ गई है। वह बहुत ही खराब है। बताते चलें कि राजनीतिक दलों के पास जो पैसा आता है, उसमें पहला हिस्सा मुंबई का होता है, तो दूसरा हरियाणा और पंजाब का। तीसरा भाग उत्तरप्रदेश का होता है। बाद में बेंगलुरु और पुणो का स्थान आता है। यह वे स्थान हैं, जहां सबसे ज्यादा औद्योगिक इकाइयां हैं। गुड़गांव की वजह से हरियाणा, तो नोएडा, गाजियाबाद और ग्रेटर नोएडा की वजह से उत्तरप्रदेश की सत्ता नेताओं एवं राजनीतिक दलों को लुभाती है। देश में धन के और भी बहुत से केंद्र हैं, लेकिन वहां के दल अलग हैं। जैसे-चेन्नई का उद्योगपति कांग्रेस या भाजपा को नहीं, डीएमके व एआईडीएमके को चंदा देगा। बहरहाल, मुंबई में अपने प्रभाव को जमाने के लिए कांग्रेस शिवसेना के साथ जाने के लिए तैयार थी और यही बात भाजपा समझ गई। लिहाजा, उसने महापौर और उपमहापौर के लिए शिवसेना का रास्ता साफ कर दिया। अब इन दोनों पदों के लिए भाजपा अपने प्रत्याशी नहीं उतारेगी। इसके पीछे गणित बिलकुल सीधा सा है। कांग्रेस अगर मजबूत हुई तो वह पूरे देश में भाजपा को चुनौती देगी, जबकि शिवसेना तो चाहे कितनी भी मजबूत हो जाए, लेकिन उसकी चुनौती केवल महाराष्ट्र तक सीमित रहेगी। अत: भाजपा ने यह चुनौती स्वीकार कर ली है। उसे कांग्रेस ज्यादा असहज करती है, तो शिवेसना कम। दोनों का लंबे समय तक गठजोड़ रहा है। दोनों की विचारधारा भी लगभग एक जैसी है और इस समय दोनों में दरार चाहे जैसी हो, पर जब घुटना मुड़ेगा, तो पेट की तरफ ही जाएगा।  बीएमसी महापौर के लिए भाजपा ने जो रणनीति अपनाई है, उसका अर्थ यही है कि घुटना पेट की तरफ मुड़ गया है। इससे कांग्रेस को सत्ता से दूर रखने का प्रयास भी सफल हो गया है। अत: इसे बढ़िया रणनीति माना जा सकता है।
हरीश कुमार ‘शम्स’ (राजनीतिक विश्लेषक)
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