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संपादकीय

चकित कर रही है यह राजनीति

By Raj Express | Publish Date: 3/6/2017 11:37:33 AM
चकित कर रही है यह राजनीति

देश यह देखकर चकित है कि उत्तरप्रदेश की सत्ता के तीन में से दो दावेदारों ने बनारस को अपने शक्ति प्रदर्शन के अखाड़े में तब्दील कर दिया है। वैसे, रविवार को वहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद राहुल गांधी और अखिलेश यादव का रोड शो हुआ था, तो बहुजन समाजपार्टी की सुप्रीमो मायावती की रैली भी। इन तीनों ही कार्यक्रमों में उमड़ी भीड़ को देखकर यह अंदाजा लगाना कठिन था कि बनारस की जनता आखिर है किसके साथ? पर मायावती तो रैली करके चलती बनीं, जबकि मोदी, राहुल और अखिलेश तो सोमवार को भी बनारस में थे। खबरें तो यहां तक आती रहीं कि ये लोग वहां एक-दो दिन और रहेंगे। फिर केंद्र सरकार के आधा दर्जन से अधिक मंत्री वहां डेरा डाले हुए हैं, जबकि उत्तरप्रदेश की तो पूरी सरकार ही वहीं पड़ी हुई है। सवाल है कि बनारस में ऐसा है क्या कि उसे शक्ति प्रदर्शन का अड्डा बना लिया गया? जिस तरह से यह माना जाता है कि केंद्र की सत्ता का रास्ता उत्तरप्रदेश से होकर गुजरता है, उसी तरह यह भी माना जाता है कि यूपी की सत्ता का रास्ता मध्य उत्तरप्रदेश व पूर्वाचल से होकर जाता है। इन दोनों इलाकों की खासियत यह है कि वहां के नतीजे एकतरफा ज्यादा रहते हैं। यहां विधानसभा की 88 सीटें हैं और जिसने इनमें से 80 भी जीत लीं, उत्तरप्रदेश की सत्ता उसे ही मिलती है। मध्य यूपी की 48 सीटों के लिए मतदान हो चुका है, जबकि पूर्वाचल की 40 सीटों के लिए अंतिम चरण में मतदान होना है। बनारस पूर्वाचल का केंद्र है और यहां की 40 सीटों पर जीत सुनिश्चित करने के लिए ही यूपी के सभी प्रतिस्पर्धी राजनीतिक दल भगवान भोलेनाथ की नगरी में अपनी-अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रहे हैं। उल्लेखनीय यह भी है कि बनारस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपनी लोकसभा सीट है। 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को पूर्वाचल में मात्र चार ही सीटें मिली थीं। लेकिन यह मोदी का ही असर था कि वर्ष-2014 के लोकसभा चुनाव में यहां की 40 में से 38 सीटों पर भाजपा एवं उसके सहयोगी अपना दल ने बढ़त बनाई थी। अब अगर इन सीटों पर भाजपा का प्रदर्शन कमजोर रहा तो असर सीधा प्रधानमंत्री पर पड़ेगा। लोग कहेंगे कि अब मोदी का जादू खत्म हो गया है। कारण यही है कि उन्होंने पूर्वांचल के चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया है। हालांकि, उन्होंने पूरे उत्तरप्रदेश में अपनी ताकत लगाई है, पर पूर्वाचल में वे कुछ ज्यादा ही सक्रिय हैं, क्योंकि सवाल प्रतिष्ठा का है। राहुल गांधी और अखिलेश यादव भी वहां इसीलिए सक्रिय हैं, ताकि भाजपा हारे और प्रधानमंत्री का आभामंडल कमजोर पड़े। चर्चा तो यहां तक थी कि समाजवादी पार्टी पूर्वाचल में मुलायम सिंह यादव को उतारेगी, तो वहीं कांग्रेस सोनिया गांधी को। लेकिन ऐसा हुआ नहीं, तो इसलिए कि सोनिया और मुलायम, दोनों ही गठबंधन से नाखुश बताए जाते हैं। अत: मोर्चे पर राहुल गांधी तो हैं ही और अपनी पत्नी डिंपल के साथ अखिलेश भी मैदान में हैं। पूर्वाचल के मतदाता क्या करेंगे और क्या नहीं, यह अलग बात है। फिलहाल तो सवाल यह है कि क्या यह प्रतिस्पर्धा लोकतंत्र के लिए शुभ है?

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