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संपादकीय

अवसाद का एक ही इलाज दोस्त बनाओ

By Raj Express | Publish Date: 3/7/2017 11:26:00 AM
अवसाद का एक ही इलाज दोस्त बनाओ

हमारे देश में अवसाद से जुड़े मामले बहुत तेजी से सामने आने लगे हैं। गौरतलब है कि हमारे यहां इस समय तकरीबन पांच करोड़ नागरिक अवसाद के शिकार हैं। अवसाद के फैलते इस दायरे से लगता है, जैसे अपनी चिंता के सामने दूसरों की चिंता पटल से गायब हो रही है। अध्ययन बताते हैं कि लोगों की निजी इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं का दायरा लगातार बढ़ने लगा है। इसमें कुछ गलत नहीं है, क्योंकि महत्वाकांक्षी समाज ही प्रगति करता है। पर इसके लिए जो प्रतिस्पर्धा हो रही है, वह अब स्वस्थ नहीं रही। लिहाजा ईष्र्या, गलाकाट होड़ और रातों-रात सब कुछ पा लेने की इच्छा भी चिंता और अवसाद के चक्र को और मजबूत बना रही है। अभी हाल ही में ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन ने डिप्रेशन व अन्य सामाजिक विकार-एक स्वस्थ आकलन’ विषय पर अपनी एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। डब्ल्यूएचओ ने 18 देशों के तकरीबन एक लाख लोगों का सर्वेक्षण करके अपनी यह रिपोर्ट तैयार की है। यह रिपोर्ट खुलासा करती है कि चीन व भारत जैसे देश बुरी तरह से अवसाद (डिप्रेशन) की गिरफ्त में हैं। यह रिपोर्ट यह भी साफ करती है कि इस समय दुनिया में 32 करोड़ से भी अधिक लोग अवसाद के शिकार हैं। चिंता की बात यह है कि इनमें से 50 फीसदी भारत व चीन में हैं। तकलीफदेह बात तो यह है कि हमारे देश में करीब 36 फीसदी लोग तो मेजर डिप्रेसिव एपिसोड के शिकार हैं। मतलब, यह बीमारी वैश्विक तो है, लेकिन भारत इस मामले में नंबर वन है। दूसरे नंबर पर फ्रांस है, जहां 32.2 फीसदी लोग अवसाद के शिकार हैं। उधर, तीसरे पायदान पर अमेरिका है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि लगभग 30.9 फीसदी अमेरिकी इस डिसऑर्डर के शिकार हैं। रिपोर्ट यह भी खुलासा करती है कि विगत एक दशक में अवसाद और चिंता से जुड़ी भावनात्मक समस्याओं में 18 फीसदी से भी अधिक का इजाफा हुआ है। इस रिपोर्ट के आंकड़े यह भी बताते हैं कि भारत व अन्य मध्यम आय वर्ग वाले देशों में आत्महत्या से जुड़े मामलों का जिम्मेदार अवसाद है। रिपोर्ट में इस बात की ओर भी इशारा है कि अन्य देशों के मुकाबले भारत में आत्महत्या की दर भी सबसे अधिक है। स्थिति तो यह है कि यहां हर 40 सेकंड में एक व्यक्ति आत्महत्या कर रहा है। इसी रिपोर्ट में इस बात की ओर भी संकेत है कि पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में अवसाद कुछ ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है। इस सर्वे से जुड़े विशेषज्ञों का मत है कि गलाकाट होड़ के माहौल में चाहे छात्र हो या फिर सेवाकर्मी, वे सभी अपनी कार्यक्षमता से अधिक काम करने को मजबूर हैं। इस वजह से इन लोगों की नींद के घंटे लगातार कम होने लगे हैं। इसका दुष्परिणाम यह हो रहा है कि तकरीबन 48 फीसदी बच्चे व युवा अब निरंतर थकान की अवस्था में हैं। उनकी ऊर्जा कम होने लगी है। इस नए प्रकार के तनाव को मनोवैज्ञानिक टैक्सोस्ट्रेस की संज्ञा दे रहे हैं। दरअसल, यह एक प्रकार का दबाव ही है, जो तकनीक के साथ शारीरिक तालमेल ठीक न होने से पैदा होता है। सही बात तो यह है कि वैश्वीकरण से प्रेरित बाजारवाद व नवउदारवाद की आर्थिक नीतियों के आने के बाद से लगातार काम ही काम और मोटी पगार प्राप्त करने व भौतिक सुख-सुविधाओं को जुटाने की होड़ सी लग गई है। आज के दौर का यही सच है कि अब भौतिक जिंदगी जीने की होड़ में जो पिछड़ता है, वह काफी कुछ अवसाद और निराशा का शिकार हो जाता है। ऐसा नहीं है कि जिनके पास धन, पूंजी एवं नई तकनीकियां हैं, वे सुखी हैं। सच तो यह है कि इस दौर में जो लोग जितने विकसित होने का दंभ भरते हैं, वही अधिक अवसाद और चिंता के शिकार पाए जाते हैं। शोध बताते हैं कि भौतिक विकास के साथ अवसाद, आत्महत्याएं, नशाखोरी, घरेलू कलह व अन्य आपराधिक घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। अभी हाल ही में दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ने भी दिल्ली में एक सर्वेक्षण किया था। यह सर्वे बताता है कि आज तीस फीसदी से अधिक युवा गंभीर मानसिक समस्याओं से जूझ रहे हैं। बीते दिनों विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ही अपने एक अन्य अध्ययन में बताया था कि भारत में दस प्रतिशत लोग लंबे समय से जीवन में निराशाजनक स्थिति से गुजर रहे हैं। खास बात यह है कि भारत जैसे धार्मिक एवं आध्यात्मिक देश में 36 फीसदी लोग तो गंभीर रूप से हताशा की स्थिति में हैं। जाहिर है कि यह स्थिति ठीक नहीं है। अवसाद एवं निराशा से बाहर आने के लिए यह जरूरी है कि हम सामाजिक जीवन जीना सीखें। अपनी दोस्ती व अपने निजी सामाजिक रिश्तों के अहसास व उनके मध्य संवाद की परंपरा को ताकतवर बनाएं। एक न एक ऐसा रिश्ता अवश्य बनाएं, जिसके साथ हम अपनी भावनाओं को बांट सकें। एकल परिवार अवसाद की बहुत बड़ी वजह हैं। चूंकि हम अकेले रहते हैं, इसीलिए निराशा के क्षणों में मन में यह भाव बार-बार आता है कि हमारे साथ कोई नहीं। इससे बचने का यही रास्ता है कि हम अपना सामाजिक दायरा बढ़ाएं। प्रतिस्पर्धा में भी ज्यादा न पड़ें। महत्वाकांक्षी होना अच्छी बात है, मगर इसके लिए गलाकाट प्रतिस्पर्धा में उतर पड़ना बहुत नुकसानदायक होता है।

डॉ. विशेष गुप्ता (शिक्षाविद और समाजशास्त्री)

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