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संपादकीय

वाजिब नहीं रोड शो पर सवाल

By Raj Express | Publish Date: 3/7/2017 11:30:28 AM
वाजिब नहीं रोड शो पर सवाल
क्या सर्वोच्च लोकतांत्रिक पद पर पहुंचने के बाद किसी नेता का लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सामान्य मतदाता या राजनीतिज्ञ की तरह हिस्सा लेने का अधिकार खत्म हो जाता है? उत्तरप्रदेश चुनाव में जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है, यह प्रश्न मौजूदा राजनीतिक विमर्श में शिद्दत से उछल रहा है। चुनाव मैदान में मोदी से दो-दो हाथ कर रहे ‘यूपी के लड़के’ अखिलेश-राहुल या मायावती को देश की शीर्ष लोकतांत्रिक हस्ती के विधानसभा चुनाव मैदान में पसीना बहाने पर प्रश्न उठाने का हक है। यह सवाल सोशल मीडिया पर भी खूब उठ रहा है। बीबीसी में रह चुके पत्रकार अनुराग चतुर्वेदी की वह टिप्पणी फेसबुक पर चर्चा में रही, जिसमें उन्होंने लिखा है कि एक मुख्यमंत्री को हराने के लिए प्रधानमंत्री मारे-मारे फिर रहे हैं। मोदी के रोड शो पर उठ रहे सवालों से पहले जरा राजनीति विज्ञान के सिद्धांतों को भी परख लेना उचित रहेगा। इसकी किताबों में पढ़ाया जाता है कि लोकतंत्र की निरंतरता के दो औजार होते हैं, संविधान व परंपराएं। जिस ब्रिटिश वेस्ट मिंस्टर पद्धति वाले संसदीय लोकतंत्र को हमारे देश ने अपनाया है, उसमें परंपराओं पर ही ज्यादा जोर है। ब्रिटेन में लिखित संविधान है ही नहीं, सो वहां परंपरा पर ही जोर है। सबसे बड़ी बात यह है कि वहां की परंपराएं वहां राजा और संसद के बीच चलती रही वर्चस्व की जंग के बीच से निकली हैं। राजनीति विज्ञानी मानते हैं कि सत्ता के दो केंद्रों के वर्चस्व की लड़ाई के बीच से उभरी वहां की परंपराएं खालिस देशी हैं। क्या उन अर्थो में हम अपनी लोकतांत्रिक परंपराओं को देशी मान सकते हैं? संविधान को स्वीकार करने के बाद से ही भारतीय समाज में विमर्श की एक समानांतर परंपरा चलती रही है, जिसे इस बात का मलाल रहा है कि भारत ने अपनी राज-व्यवस्था के जो लोकतांत्रिक सूत्र स्वीकार किए, उनमें देशीपन बेहद कम है। आजादी के 70 सालों बाद भी अपना समाज जिस तरह से बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा है, उसमें यह विमर्श कहीं और ज्यादा बढ़ गया है। यह मानने वालों की खासी तादाद है कि आजाद भारत में लोकराज्य के लिए जिन परंपराओं को स्वीकार किया गया, उसके अगुआ जवाहरलाल नेहरू हैं और उनके चिंतन के केंद्र में भारत से ज्यादा वह ब्रिटेन था, जहां उन्होंने पढ़ाई-लिखाई की थी। मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं कि हम वहां के ज्यादा हो जाते हैं, जहां हमारी पढ़ाई-लिखाई होती है। यह तथ्य पीछे छूट जाता है कि हमारा जन्म कहां हुआ। अपने जन्मस्थान से व्यक्ति के रागात्मक तंतु जुड़े होते हैं, पर उसके व्यक्तित्व निर्माण के तार उसी जगह से ज्यादा जुड़ते हैं, जहां उसकी पढ़ाई-लिखाई हुई होती है। नेहरूजी पहले प्रधानमंत्री थे। सो, उनकी परंपराओं पर आज की राजनीति को भी परखा जाता है।
जब हम ऐसी कसौटियों पर लोकतंत्र को लंबे वक्त तक कसते रहते हैं, तो वस्तुत: हम लोकतांत्रिक व्यवस्था की उस मूल अवधारणा को भी उपेक्षित कर रहे होते हैं, जो जम्हूरियत की निरंतरता के लिए वैचारिक और सामाजिक परिस्कार की भी पैरवी करती है। जिसके जरिए खुद को अपडेट यानी अद्यतन करने पर भी जोर दिया जाता है। क्या इन अर्थो में प्रधानमंत्री के रोड शो को नहीं देखा जाना चाहिए? वक्त आ गया है, जब उनके रोड शो की आलोचना के वक्त इन सभी संदर्भो को भी ध्यान में हर हालत में रखा जाए। अगर इन संदर्भो को परे रख भी दें तो फिर सवाल अखिलेश यादव से भी पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने जब विकास का पहिया पिछले पांच वर्ष में ज्यादा तेजी से चलाया है, तो वे स्वयं क्यों बनारस में रोड शो के लिए उतावले रहे। 2012 में साइकल की सवारी के जरिए प्रदेश की सत्ता में पहुंचे अखिलेश ने विकास के तमाम दावे किए थे। राजनीति को बदलने के उन्होंने संकेत भी दिए, पर पूरे साढ़े चार साल वे बेबस नजर आए। उनकी नाक के नीचे घोटाले हुए, मंत्री उन्हें ठेंगा दिखाते रहे, मंत्रियों पर रेप के संगीन आरोप लगे, अधिकारियों पर हमले हुए, विकास के बुनियादी औजार बिजली व सड़क लखनऊ और इटावा के आसपास ही घूमते रहे। उन्होंने यदि वास्तव में विकास किया है तो उन्हें उस पर भरोसा होना चाहिए एवं इसकी महज मुनादी के जरिए उन्हें जनता की अदालत में जाना था। भरोसा तो उन मायावती को भी करना चाहिए था, जिनका दावा है कि उनकी पार्टी सर्वजन हिताय में भरोसा करती है। यह बात और है कि उनका पूरा फोकस एक खास धर्मावलंबी वोटरों पर ज्यादा रहा। उनका आरोप है कि अखिलेश सरकार ने दलितों पर अत्याचार किए हैं। लेकिन इन अत्याचारों के वक्त वे सिर्फ प्रेस कांफ्रेंस करती रहीं। उन्होंने सड़कों पर आकर अत्याचारों का विरोध नहीं किया। उनके कार्यकर्ता सड़कों पर तब दिखे, जब पूर्व भाजपा नेता दयाशंकर सिंह ने मायावती पर ओछी टिप्पणी की। इससे साफ हुआ कि दलितों की रहनुमाई करने वाली उनकी पार्टी की चिंता के केंद्र में सिर्फ वे ही हैं, वह वोटर नहीं, जिसके समर्थन के दम पर उन्हें ताकत मिलती है। हम जिस लोकतांत्रिक परंपरा की बात करते हैं, उसकी एक सीमा यह है कि उसमें वोटर की हैसियत निरंतर कम हुई है।बहरहाल, मोदी के रोड शो पर सवाल उठाने वालों में शत्रुघ्न सिन्हा भी हैं। पटना से भाजपा सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने प्रश्न प्रधानमंत्री पर कम, उनके सलाहकारों पर ज्यादा उठाया। उन्होंने कहा कि चौक पर जलेबी खाने वाले नेताओं की सलाह पर प्रधानमंत्री जब भीड़ के बीच रोड शो करने उतरे, तो वे उनकी सुरक्षा को लेकर चिंतित थे। रोड शो का विरोध तो मंत्रिमंडल में मोदी के सहयोगी व राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने भी किया है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री की रैली ठीक है, रोड शो नहीं। विरोध और समालोचनाएं लोकतांत्रिक समाज की खूबसूरती हैं। मगर यह खासियतें तब बेकार हो जाती हैं, जब महज विरोध और आलोचना के लिए ही विरोध होता है। प्रधानमंत्री का विरोध भी इसी नजरिए से प्रेरित है। अपनी पार्टी को लोकतांत्रिक यज्ञ में अगुआ बनाए रखने के लिए हर किसी को रोड शो जैसी समिधा देने का हक है। फिर जब संसद तक में विरोध के लिए विरोध की परिपाटी बन गई है, तो फिर कोई प्रधानमंत्री संसद में अपने लिए समर्थन जुटाने की कोशिश आखिर क्यों न करे। उत्तरप्रदेश में भाजपा की जीत संसद के उच्च सदन में पार्टी के लिए नई राह खोलेगी, जहां उसे आए दिन विरोध का सामना करना पड़ता है। फिर हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अरसे बाद देश को इतना सक्रिय प्रधानमंत्री मिला है, जिसकी शारीरिक क्षमताएं श्रम की इजाजत नहीं देतीं, पर वे किसी भी कीमत पर पीछे नहीं रहना चाहते। फिर राजनीति में नई परिपाटी क्यों नहीं बनानी चाहिए। वक्त आ गया है, जब इस नजरिए से भी हम अपनी राजनीति को परखें और समझें। जब हर तरफ नवाचार का बोलबाला है, तो फिर देश की राजनीति भी क्यों इसमें पीछे रहे।
उमेश चतुर्वेदी (टेलीविजन पत्रकार और स्तंभकार)
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