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संपादकीय

राजनीतिक रसूख की करारी हार

By Raj Express | Publish Date: 3/7/2017 11:32:44 AM
राजनीतिक रसूख की करारी हार

 रेप के आरोप में फरार चल रहे उत्तरप्रदेश सरकार के मंत्री एवं अमेठी विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार गायत्री प्रजापति को सुप्रीम कोर्ट ने कोई राहत न देकर सही काम किया है। गौरतलब है कि इस मंत्री समेत सात पर समाजवादी पार्टी की ही एक महिला कार्यकर्ता ने सामूहिक दुष्कर्म का आरोप लगाया था। उस महिला का आरोप यह भी था कि इन लोगों की नजर उसकी नाबालिग बेटी पर थी और एक बार मंत्री ने उससे छेड़खानी भी की थी। पीड़िता ने मंत्री और उसके साथियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी। लेकिन यह सच तो हम जानते ही हैं कि ज्यादातर रसूखदार लोगों के साथ पुलिस का व्यवहार कैसा होता है। केवल उत्तरप्रदेश की ही नहीं, बल्कि देश के प्राय: सभी राज्यों की पुलिस रसूखदार लोगों से डरती है। गायत्री प्रजापति के मामले में करेला और वह भी नीम पर इस मामले में चढ़ा हुआ था कि एक तो उसका रसूख है, दूसरे वह उत्तरप्रदेश सरकार में मंत्री भी है। तब पुलिस की क्या हैसियत कि वह उसके खिलाफ कार्रवाई करती। उत्तरप्रदेश पुलिस के कान तब खड़े हुए, जब पीड़िता सर्वोच्च न्यायालय की शरण में जा पहुंची, जहां से आदेश मिला कि गायत्री प्रजापति पर मुकदमा दर्ज करो। हैरानी की बात यह है कि कोर्ट के आदेश पर मुकदमा तो दर्ज हो गया, लेकिन गायत्री की गिरफ्तारी तब भी नहीं हुई। जब विपक्षी दलों व मीडिया ने अखिलेश यादव सरकार को निशाने पर लिया, तो उसके ज्यादातर सहयोगी तो पकड़ लिए गए, लेकिन पांचवें चरण में अपने निर्वाचन क्षेत्र अमेठी में मतदान करके गायत्री प्रजापति फरार हो गया। इस दौरान उसके भागकर विदेश चले जाने की आशंका के मद्देनजर लुकआउट नोटिस जारी हो चुका है। हवाई अड्डों व रेलवे स्टेशनों पर नजर रखी जा रही है। इधर, उत्तरप्रदेश के राज्यपाल रामनाइक मुख्यमंत्री से पूछ चुके हैं कि रेप के आरोपी मंत्री को मंत्रिपरिषद से हटाया क्यों नहीं गया है? इस सबके बीच सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर दी गई, जिसमें यह मांग की गई थी कि गायत्री प्रजापति के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द कर उसकी गिरफ्तारी पर रोक लगाई जाए। इससे यह साबित हुआ कि रसूखदार आरोपी स्वयं को कानून की पकड़ से बचाने की हर मुमकिन कोशिश करते हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह साबित कर दिया है कि उसके सामने आरोपी केवल आरोपी होता है, समाज में उसका चाहे जितना रसूख हो। इस घटनाक्रम से अखिलेश यादव की छवि को कुछ तो नुकसान पहुंचा ही होगा। गायत्री प्रजापति पर आरोप लगते ही उन्हें न केवल उसकी अपनी मंत्रिपरिषद से छुट्टी करनी चाहिए थी, पीड़िता द्वारा एफआईआर दर्ज कराने के बाद उन्हें उसकी गिरफ्तारी भी करानी चाहिए थी। लेकिन हुआ यह है कि कुछ दिनों तक तो सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को भी तरजीह नहीं दी गई। अलबत्ता, अब तो मामला फंस चुका है। अब गायत्री प्रजापति को कानून के सामने हाजिर होना पड़ेगा और जेल भी जाना पड़ेगा। यह राजनीतिक रसूख पर कानून की जीत है और उसे यह जीत सुप्रीम कोर्ट के कारण मिली है।

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