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संपादकीय

भारतीय भाषाओं में एकता जरूरी

By Raj Express | Publish Date: 2/21/2017 2:46:30 PM
भारतीय भाषाओं में एकता जरूरी

 आज जब हम इस साल का भाषा दिवस मना रहे हैं, तब तक चार और राष्ट्रीय भाषाओं का दर्जा कम कर उन्हें स्थानीय भाषाओं में स्थानांतरित करने के लिए आकाशवाणी में कार्यरत भाषा के प्रतिनिधियों के घरों के सामने बोरिया बिस्तर समेटने के लिए ट्रक खड़े हो चुके होंगे। ये चार राष्ट्रीय भाषाएं- असमिया,उड़िया,तमिल और मलयालम हैं और इन्हें आकाशवाणी के राष्ट्रीय केंद्र से विदा किया जा रहा है। तेलुगु को हैदराबाद,कन्नड़ को बेंगलुरु और सिंधी को अहमदाबाद पहले ही भेजा जा चुका है। कन्नड़ को बेगलुरु भेजने की तैयारी साल1991के बाद से शुरू हुई थी और उसकी विदाई की प्रक्रिया साल2016 में पूरी की गई। कोंकणी को तो पणजी भेज ही दिया गया है। आकाशवाणी में1 भाषाओं के राष्ट्रीय समाचार बुलेटिन होने की सूचना आकाशवाणी द्वारा साल1992में प्रकाशित एक पुस्तक‘स्टोरी ऑफ न्यूज सर्विस डिवीजन’ से मिलती है। भारत के प्रथम सूचना एवं प्रसारण मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने सभी भारतीय भाषाओं के लिए आकाशवाणी में समाचार सेवा प्रभाग की स्थापना की थी तथा यहां से हरेक भाषा में समाचारों के प्रसारण की व्यवस्था की गई थी। आकाशवाणी ही नहीं,दूसरी संस्थाओं में भी भारतीय भाषाओं की जगह सुनिश्चित की गई थी। इनमें संसद भी है,पर यहां भारतीय भाषाओं को स्थानीय बोलियां बनाने का अभियान चल रहा है।1991के बाद से राष्ट्रीय भाषाओं को स्थानीय बनाने का जोर ज्यादा बड़ा है। आकाशवाणी से राष्ट्रीय भाषाओं को यह कहकर विदाई दी जा रही है कि वे जिस राज्य की भाषा हैं,उन्हें वहां भेजा जा रहा है। क्या गुजराती केवल गुजरात की ही भाषा है,महाराष्ट्र की नहीं है?क्या देश के दूसरे हिस्सों में गुजराती बोलने और सुनने वाले लोग नहीं हैं?सभी भाषाओं को बरतने वाले लोग देश भर में बिखरे हुए हैं। सौराष्ट्र की भाषा के लोग तमिलनाडु में हैं। सिर्फ पश्चिम बंगाल में ही बंगाली नहीं रहते हैं,बनारस में भी बंगाली रहते हैं और दिल्ली का चितरंजन पार्क भी बांग्ला भाषियों से भरा हुआ है। तब देश की प्रशासनिक राजधानी को भाषा की राजधानी में क्यों तब्दील किया जा रहा है?तब उर्दू को कहां भेजेंगे?और संस्कृत के लिए राष्ट्रीय राजधानी में जगह कैसे बनेगी?

आकाशवाणी से भारतीय भाषाओं की विदाई इस एकदम बाहियात तर्क के आधार पर की जा रही है कि भाषा से जुड़ी प्रतिभाओं को स्थानीय स्तर पर समाचार बुलेटिन से जोड़ा जा सकेगा,जबकि साल1992में न्यूज डिवीजन के बारे में आकाशवाणी द्वारा प्रकाशित पुस्तक में ही यह बताया गया है कि राष्ट्रीय भाषाओं में निकलने वाले केंद्रीय समाचार बुलेटिन कितने हुनरमंद लोगों द्वारा पढ़े जाते हैं और इस केंद्र में कितने प्रतिभावान लोग काम कर रहे हैं। लेकिन अब प्रतिभाओं की एक नई परिभाषा गढ़ी जा रही है कि राज्य की प्रतिभा राष्ट्र की प्रतिभा नहीं हो सकती। इससे दिल्ली बनाम स्थानीयता का एक संघर्ष खड़ा हो सकता है, जबकि दावा यह किया जा रहा है कि इससे बुलेटिन को बेहतर किया जा सकेगा। मगर बुलेटिन किसी राज्य की राजधानी में पहुंचकर कैसे बेहतर हो सकता है?फिर भाषाओं के बीच आपसी रिश्ते कैसे बनेंगे,जब सबको एक छत के नीचे नहीं रखा जाएगा।

हकीकत तो यह सामने आती है कि इन भाषाओं के लिए नियुक्तियां तक बंद कर दी गई हैं। सिर्फ आकाशवाणी में ही नहीं,बल्कि संसद में भी यही सब हो रहा है। भाषाओं के लिए काम करने वाले लोगों को दिहाड़ी पर रखा गया है और दिहाड़ी पर रखने का अर्थ असुरक्षा बोध के साथ काम कराने और करने का दबाव बनाना होता है। अगर आंकड़ों पर सरसरी नजर ही डालें तो आकशवाणी में तमिल भाषा के लिए सात स्थायी पदों पर नियुक्तियों का प्रावधान है,लेकिन एक भी नियुक्ति नहीं की गई है। जो असमिया अब गुवाहाटी भेजी जा रही है,उसके लिए एक भी स्थायी नियुक्ति करने के प्रयास नहीं हुए हैं। उसके छह पद खाली पड़े हैं।

स्पष्ट है कि भाषाओं का दर्जा राष्ट्रीय भाषाओं से स्थानीय बोलियां करने का फैसला पहले ही लिया जा चुका था,जो धीरे-धीरे लागू हो रहा है। यह बेदखली की प्रक्रिया शायद2019तक पूरी कर ली जाएगी। इससे पहले भाषाओं के समाचार बुलेटिन के प्रसारण का समय कम कर दिया गया था। दूरदर्शन पर पंजाबी और उर्दू के साप्ताहिक कार्यक्रम चुपके से बंद कर दिए गए। गौरतलब है कि राजधानी स्थित आकाशवाणी केंद्र से भारतीय भाषाओं की विदाई हो रही है,जबकि ब्रिटिश संस्था बीबीसी अनेक भारतीय भाषाओं में समाचार देने के काम की तैयारी लगभग पूरी कर चुकी है। क्या दिल्ली से राष्ट्रीय भाषाओं की बेदखली का रिश्ता बीबीसी के विस्तार से जुड़ा हुआ है?क्या राष्ट्रीय भाषाओं के विस्थापन का यह फैसला हिंदुस्थान समाचार नाम की एजेंसी को खड़ा करने के फैसले से जुड़ा है?यह समाचार एजेंसी भारतीय भाषाओं में अपना विस्तार कर रही है। इसे आकाशवाणी में हिंदी की समाचार सेवा को बेहतर करने का काम सौंपा गया था। इसका संकेत यह है कि राष्ट्रीय भाषाओं को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से बाहर भेजकर वहां पर हिंदुस्थान समाचार की प्रतिभाओं को भाषाओं के बुलेटिन को बेहतर करने के काम में लगाया जा सकता है।

भारत में भाषा की राजनीति यहां की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था से जुड़ी हुई है। भाषा महज एक माध्यम नहीं है। हिंदी,हिंदू और हिंदुस्ता(था)न की राजनीति का मुख्य उद्देश्य यह है कि भारतीय भाषाओं का दर्जा स्थानीय हो,तभी हिंदी को एक मात्र राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित किया जा सकता है। गौरतलब है कि हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने की मुहिम में लगे लोग राजस्थानी और भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने का विरोध कर रहे हैं। उनका मानना है कि ये भाषाएं इस अनुसूची में शामिल हो जाएंगी,तो हिंदी के पास क्या बचेगा?भाषाओं को लेकर दो दृष्टिकोण हैं। एक-हिंदी को देश की बाकी भाषाओं पर थोप दिया जाए और दो-इन भाषाओं के साथ रिश्तों के आधार पर हिंदी को खड़ा किया जाए। हम देखते हैं कि हिंदी को अन्य भारतीय भाषाओं के साथ प्रतिस्पर्धा में उतार दिया गया है। इन भाषाओं से मुकाबला कर-करके हिंदी अंग्रेजी के मुकाबले लगातार कमजोर होती जा रही है। अधिकतर सरकारी दफ्तरों में पहले अंग्रेजी में ही मसविदा तैयार होता है,बाद में उसका हिंदी में अनुवाद होता है। यह स्थिति हिंदी के लिए ज्यादा खतरनाक है। अत: भाषाओं के हितों के मद्देनजर तीन काम तत्काल होने चाहिए। एक-केंद्र में अनुवाद मंत्रलय विकसित किया जाना चाहिए। भाषाओं के लिए संवैधानिक आयोग बनना चाहिए और अनुवादक तैयार किए जाने चाहिए,क्योंकि ये लोग भाषाओं के बीच एकता कायम करेंगे,जिससे देश भी मजबूत होगा।

अनिल चमड़िया (वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार)

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