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संपादकीय

निवेश में बढ़ोतरी राहतकारी संकेत..

By Raj Express | Publish Date: 2/21/2017 2:56:26 PM

 चालू वित्त वर्ष में विदेशी निवेश में उल्लेखनीय बढ़ोतरी बताती है कि अर्थव्यवस्था के सामने आगामी वित्त वर्ष के लिए जो खतरे बताए जा रहे हैं,उनका आकलन आशंकाओं के आधार पर किया जा रहा है। बेशक,विमुद्रीकरण के बाद विकास दर में गिरावट का अनुमान गलत नहीं है,रोजगारों पर संकट है और नई नौकरियां भी कम ही पैदा होंगी। लेकिन विदेशी निवेश की आवक से लगता है कि अर्थव्यवस्था की दिशा उतनी खराब भी नहीं है,जितनी बताई जा रही है। वित्त वर्ष2016-17की पहली तीन तिमाहियों में देश में35.8अरब डालर का विदेशी निवेश हुआ,जो बीते वित्तीय वर्ष की इसी अवधि की तुलना में करीब22फीसदी अधिक है। अगर इसमें हम छोटे-मोटे निवेश भी जोड़ दें तो यह धनराशि48अरब डालर हो जाती है,जो बीते वित्त वर्ष में हुए कुल निवेश 55.5अरब डालर से7.5अरब डालर ही कम है। अभी चालू वित्त वर्ष समाप्त नहीं हुआ। बीती तीन तिमाहियों के आंकड़ों के आधार पर अनुमान है कि अंतिम तिमाही में भी विदेशी निवेश आने की प्रक्रिया चलती रहेगी। जब चालू वित्त वर्ष के पूरे आंकड़े हमारे सामने आएंगे,तब  पता चलेगा कि भारतीय अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन ठीक रहा। कुल मिलाकर बीते के मुकाबले चालू वित्त वर्ष में विदेशी निवेश में बढ़त ही दर्ज होगी,क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था की तरफ विदेशी पूंजी निवेशकों का रुझान बढ़ा हुआ है। चालू वित्त वर्ष की बीती तिमाहियों में बीते साल की इसी अवधि के मुकाबले22फीसदी की निवेश वृद्धि इसके बावजूद हुई है कि वैश्विक स्तर पर इसमें लगभग 13फीसदी की गिरावट आई है। जिन आर्थिक परिस्थितियों में ब्रिटेन,चीन और अमेरिका जैसे देशों में निवेश में गिरावट आई है, उनमें हमारे यहां इसकी बढ़त सुखद है। हालांकि,कुल निवेश का18फीसदी भाग सेवा क्षेत्र में आया है और तथ्य यह भी है कि जितना निवेश अकेले सेवा क्षेत्र में आया है,उतना और किसी एक क्षेत्र में नहीं आया। लेकिन निर्माण,कंप्यूटर हार्डवेयर,ऑटोमोबाइल और दूरसंचार क्षेत्रों में भी विदेशी निवेशकों की रुचि बनी हुई है। गौरतलब यह भी है कि जो निवेश आया है,उसका करीब90प्रतिशत हिस्सा अमेरिका,जापान,दक्षिण कोरिया, मॉरीशस,सिंगापुर और ब्रिटेन की तरफ से आया है। संयुक्त अरब अमीरात भी हमारे लिए एक बड़े निवेशक के रूप में उभर रहा है। जाहिर है कि ये सभी वह देश हैं, जिनकी अर्थव्यवस्था मजबूत है। जापान एवं ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को जरूर थोड़ा सा कमजोर माना जा सकता है,पर बाकी देश मजबूत हैं। इसका अर्थ यह है कि आगे भी हमारे देश में निवेश का प्रवाह बना रहेगा। कारोबार अब भी हमारे यहां उतना सुगम नहीं है,जितना होना चाहिए। फिर भी निवेशकों का रुझान अगर भारत की तरफ है तो इसका कारण यही है कि अर्थव्यवस्था के सभी संकेतक काफी मजबूत हैं। निवेशकों को यह उम्मीद भी होगी ही कि विमुद्रीकरण के कारण जो घरेलू मांग कमजोर हुई है,भारत उसे भी संभाल लेगा। यदि मांग सचमुच बढ़ाई जा सकी तो हमारी अर्थव्यवस्था झटका खाकर और भी मजबूत हो जाएगी।

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