• 14 साल की लड़की को बंधक बना 1000 लोगों से बनवाया शारीरिक संबंध
  • प्रशांत भूषण को पीटने वाले को बीजेपी ने बनाया प्रवक्ता
  • राजस्थान: लैंडिंग से पहले बाड़मेर में क्रैश हुआ सुखोई, दोनों पायलट सुरक्षित
  • 'लालू परिवार' हुआ रघुवंश से नाराज, राबड़ी ने बयान को बोला फूहड़
  • गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र को पांचवां प्रांत घोषित करने की तैयारी में पाकिस्तान
  • सिद्धू को मिल सकता है कांग्रेस से झटका, अमरिंदर नहीं चाहते कोई डिप्टी CM
  • लोकसभा में भाजपा सांसदों ने किया पीएम मोदी का स्वागत, लगे 'जयश्री राम' के नारे
  • पंजाब और गोवा विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद आम आदमी पार्टी में फूट के आसार!

होम |

संपादकीय

अपने दम पर आगे बढ़तीं महिलाएं

By Raj Express | Publish Date: 3/8/2017 11:25:09 AM
अपने दम पर आगे बढ़तीं महिलाएं
भारतीय महिलाओं के सशक्तीकरण की बात करें, तो वे स्वयं को सिद्ध कर रही हैं, उनमें आगे बढ़ने का माद्दा भी है और सफलता के नए आयाम छूने का हौसला भी। हालिया वर्षो में विज्ञान व तकनीक की दुनिया से लेकर सिनेमा, राजनीति, खेल, सेना और न्यायपालिका तक में उनका दखल बढ़ा है। यह सच है कि रफ्तार थोड़ी कम है, पर इस बात को कम नहीं माना जा सकता कि उनके कदम बेहतरी की ओर ही बढ़ रहे हैं। वे दोहरी जिम्मेदारी निभाते हुए भी खुद को साबित कर रही हैं। सुखद यह भी है कि उनसे जुड़े आत्म-निर्भरता और कामयाबी के नए आयाम केवल आर्थिक स्तर पर ही नहीं, सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर भी समाज और परिवार को वैचारिक दृढ़ता दे रहे हैं। लैंगिक समानता पाने व स्वतंत्र अस्तित्व गढ़ने की महिलाओं की राह भले ही आसान नहीं है, पर आज की स्त्रियां एक नया आसमान रच रही हैं। यही वजह है कि तकरीबन सभी क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने वाली भारतीय स्त्रियां आज वैश्विक स्तर पर भी अपनी ठोस पहचान रखती हैं। वैसे भी अब महिलाओं की हर क्षेत्र में बढ़ती भागीदारी एक नई उम्मीद जगाती है, क्योंकि उनके लिए अपना स्वतंत्र अस्तित्व गढ़ने के लिए ही नहीं, देश के विकास के लिए भी उनका स्वावलंबी और आत्मनिर्भर होना जरूरी है। हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में स्त्री-पुरुष समानता को बढ़ावा देने से देश की आर्थिक वृद्धि में बड़ा योगदान मिल सकता है और इससे 2025 तक देश की जीडीपी में 46 लाख करोड़ रुपए तक की बढ़ोतरी हो सकती है। गौरतलब है कि आज भारत में जो महिला उद्यमी कारोबार कर रही हैं, उनमें से ज्यादातर कारोबार स्वयं वित्त पोषित है और सफल भी। निजी कंपनियों के निदेशक मंडलों में स्त्री-पुरुष समानता तो नहीं है, पर 20 प्रतिशत महिलाएं निदेशकों के पद पर हैं। गौरतलब है कि भारत में अमेरिका से ज्यादा महिला सीईओ हैं। मौजूदा समय में सबसे तेजी से बढ़ रहे बैंकिंग और वित्तीय सेवा क्षेत्र में आधी से ज्यादा सीईओ महिलाएं ही हैं। टेक्नोलॉजी तथा विनिर्माण क्षेत्र में 13 प्रतिशत कंपनियों में महिला सीईओ हैं। एक हालिया शोध के अनुसार जिन कंपनियों के बोर्ड सदस्यों में ज्यादा महिलाओं की भागीदारी है, वह कंपनियां ज्यादा मुनाफे में हैं। कॉर्न फेरी और नेशलन यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर द्वारा किए गए इस अध्ययन में सामने आया है कि भारत, मलेशिया व आस्ट्रेलिया में कंपनियों के शीर्ष पदों पर स्त्रियों की भागीदारी तेजी से बढ़ी है। वहां उनका रुतबा कायम हुआ है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) की छठी आर्थिक गणना के मुताबिक भी भारत के व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में से 14 फीसदी महिला उद्यमियों द्वारा चलाए जा रहे हैं। इनमें 13.48 करोड़ लोगों को रोजगार मिल रहा है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में नौ फीसदी महिलाएं राजनीतिक दलों के ऊंचे पदों पर हैं। वहीं पंचायती राज व्यवस्था यानी कि जमीनी स्तर की लोकतांत्रिक संस्थाओं से भी महिलाएं बड़ी संख्या में जुड़ रही हैं। देश की प्रत्यक्ष श्रमशक्ति में 40 प्रतिशत व अप्रत्यक्ष श्रमशक्ति में 90 प्रतिशत योगदान महिलाओं का है। युवा महिलाएं शिक्षा, बैंकिंग, आईटी और यहां तक की सैन्य बलों में भी अपना स्थान बना चुकी हैं। भारत ही नहीं, विदशों में भी कई प्रतिष्ठित संस्थानों में देश की बेटियां काम कर रही हैं। 2001-2011 के दशक में देश भर में महिला शिक्षकों की संख्या में 122 फीसदी का इजाफा हुआ है। आंकड़े बताते हैं कि 2001 में जहां इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाली लड़कियों की संख्या 4.8 लाख थी, वहीं अब यह 40 लाख से भी ज्यादा है। महिला श्रमशक्ति की भूमिका खेती बाड़ी में भी है। यानी, आधी आबादी का अनगिनत समस्याओं से लड़ते हुए स्वावलंबन की ओर अग्रसर होना नई आशा जगाता है। इस बात में कोई दो राय नहीं कि शीर्ष पदों पर पहुंचने के लिए आज भी महिलाओं को कई तरह की बाधाओं का सामना करना पड़ता है। अपनी क्षमता और योग्यता को साबित करने के लिए कई अनकही-अनचाही परिस्थितियों को झेलना पड़ता है। हालांकि, आधी आबादी के सुरक्षित व सम्मानजनक जीवन जीने की लड़ाई हर मोर्चे पर जारी है। फिर भी समाज और सरकार की जो सहभागिता होनी चाहिए, वह तो नहीं दिखती। निर्भया जैसी दुर्घटनाएं होने की आशंका से हर परिवार डरा रहता है। महिलाओं के साथ होने वाली कई कुत्सित घटनाएं किसी दु:स्वप्न से कम नहीं हैं। यही बात और हालात स्त्रियों का संबल तोड़ने वाले हैं। भेदभाव के बुनियादी कारण आज हमारे सामाजिक और पारिवारिक ढांचे में मौजूद हैं। यही कारण है कि हर कदम पर खुद को साबित कर रही महिलाओं के प्रति सोच और व्यवहार में बदलाव आए बिना उनकी कामयाबी अधूरी सी है। ऐसे में घर के भीतर-बाहर कुछ ऐसे बदलावों का इंतजार है, जो उनकी अस्मिता पर आंच न आने दें।
देश के विकास के लिए हर क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ना जरूरी है। सदियों से दोयम दर्जे की नागरिक समझी जाने वाली स्त्रियां आज मुखर हैं और अपनी नई पहचान बनाने में जुटी है। उनकी यह सशक्त और सजग छवि उनका आत्मविश्वास ही दर्शाती है। यही वजह है कि आज की महिलाएं सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक मंचों पर अपना स्थान पुख्ता कर रही हैं। दरकार बस इस बात की है कि महिलाओं को सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर सुरक्षा और सम्मान मिले। ऐसा होने पर उनकी कामयाबी की यह प्रक्रिया न केवल काफी तेज हो सकती है, बल्कि महिलाओं के लिए यह सफर सुखद और सुरक्षित भी हो सकता है।
आवश्यकता इस बात की भी है कि इस बदलाव में महिलाओं की भूमिका को अहम् मानते हुए समाज, प्रशासन और परिवार सभी उनके मान-सम्मान और सुरक्षा के मायने समझें। आज की महिलाएं साहसी भी हैं और महत्वाकांक्षी भी। पर काबिल होने के बावजूद उन्हें पीछे रहने को विवश होना पड़ता है, क्योंकि दुष्कर्म, दहेज, हत्या, छेड़छाड़, भ्रूण हत्या और कार्यस्थल पर शोषण जैसे  मामलों के बढ़ते आंकड़े उनकी हिम्मत तोड़ते हैं। बीते बरसों में महिलाओं के प्रति अपराध की नई संस्कृति पनपी है, जो कि तकनीकी गैजेट्स से लेकर आम परिवेश तक उनका बुरी तरह से पीछा करने लगी है।
इस दुर्भावना की शिकार बनने वाली स्त्री परिवार और समाज में तो मानसिक यंत्रणा झेलती ही है, प्रशासन भी उसके प्रति असंवेदनशील ही रहता है। इसीलिए बदलाव की दरकार इन दोनों ही पहलुओं पर है। यह वाकई सुखद बदलाव है कि भारतीय महिलाओं की छवि एक पूर्व निर्धारित खांचे से बाहर आ रही है। अगर सरकारें, समाज और संवैधानिक संस्थाएं अपनी भूमिका ठीक से निभाएं तो महिलाएं किसी से कम नहीं। अभी उन्होंने जो पाया, अपने बलबूते पर पाया है।
 डॉ. मोनिका शर्मा (स्वतंत्र टिप्पणीकार)
Contact us: contact@rajexpress.com
Copyright © 2016 RajExpress.com. All Rights Reserved.
Designed by : 4C Plus