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संपादकीय

लोकतंत्र के हमाम में सब निर्वस्त्र

By Raj Express | Publish Date: 3/9/2017 9:18:21 AM
लोकतंत्र के हमाम में सब निर्वस्त्र
हमारे देश में जब भी कोई चुनाव होता है, तो चुनाव सुधार का मुद्दा भी उठ खड़ा होता है। इसलिए परंपरानुसार उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर के विधानसभा चुनाव से पूर्व भी चुनाव सुधार का मुद्दा चर्चा में रहा। लगभग सभी राजनीतिक दलों ने चुनाव सुधार पर लंबी -लंबी दलीलें दीं। लेकिन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स (एडीआर) ने इन चुनावों का जो पूरा लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है, उससे साफ हो गया है कि इस बार भी धनबल, बाहुबल व अपराधियों का बोलबाला रहा। यानी, लोकतंत्र के इस हमाम में सब निर्वस्त्र हैं।
गौरतलब है कि उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव लड़ रहे हर तीसरे उम्मीदवार पर बलात्कार, हत्या और अपहरण जैसे गंभीर मामले दर्ज हैं। वहीं चुनावी मैदान में किस्मत आजमा रहे करीब 30 प्रतिशत उम्मीदवार करोड़पति हैं। कमोबेस यही स्थिति अन्य राज्यों में भी है। एडीआर की रिपोर्ट दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली को कठघरे में खड़ा करती है। क्या यही वह लोकतंत्र है, जिसके संदर्भ में कहा गया है-लोगों के लिए, लोगों के द्वारा, लोगों की सरकार? क्या यह वही लोकतंत्र है, जिसके चार प्रमुख स्तंभ-न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका एवं मीडिया होते हैं? क्या यह वही लोकतंत्र है, जिसके पांच लक्षण-लोकनियोजन, लोकनीति, लोकस्वामित्व, लोकअभिव्यक्ति व लोकउम्मीदवारी होती है? क्या यह वही लोकतंत्र है, जिसमें लोक के साथ तंत्र का सतत संवाद, सहमति, सहयोग, सहभाग, सहकार व सदाचार जैसे व्यवस्था संचालन के छह सूत्र होते हैं?
इन सवालों का जवाब है, जी हां, यह वही लोकतंत्र है। लेकिन यह लोकतंत्र ऐसा हमाम बन गया है, जिसमें अब बागी, दागी, धनबल व बाहुबल से परिपूर्ण लोग अपना पाप धोने आते हैं। अब जहां दाग धुलेंगे, वहां दागदार और जहां पाप धुलेगा, वहां पापी तो जुटेंगे ही। शायद यही कारण है कि सुचिता, शिष्टाचार, आचार-विचार का परित्याग कर पार्टियों ने बलात्कारियों, अपहरणकर्ताओं व हत्यारों को हाथों-हाथ लपक लिया है।
भारत में लोकसभा या विधानसभा चुनावों में जहां दागी उम्मीदवारों के अलावा बाहुबल व धनबल का इस्तेमाल अब आम है, वहीं मणिपुर राज्य ने इस मामले में एक मिसाल पेश की। फिलहाल जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो चुके हैं, उनमें राज्य बागी, दागी, धनबल एवं बाहुबल के मामले में बाकी चार सूबों से अलग नजर आता है, यह। यानी, मणिपुर की चुनावी कमीज दूसरे राज्यों के मुकाबले सफेद है। राज्य की 60 सीटों के लिए उतरे 265 उम्मीदवारों में महज चार के खिलाफ ही आपराधिक मामले दर्ज हैं। यहां अपराध का औसत 149.5 प्रति हजार है, जबकि इस मामले में राष्ट्रीय औसत 234.2 का है। आपराधिक औसत के मामले में 156.4 के औसत के साथ पंजाब पहले नंबर पर है, जबकि 97.2 के साथ उत्तराखंड पांचवें पर। करोड़पति उम्मीदवारों के मामले में भी मणिपुर शेष राज्यों के मुकाबले पिछड़ा है। यहां उम्मीदवारों की औसत संपत्ति 1.14 करोड़ है, जबकि गोवा में यह आंकड़ा 4.75 करोड़ का है। पंजाब व उत्तराखंड में यह औसत क्रमश: 3.49 करोड़ व 1.57 करोड़ का है। उत्तरप्रदेश के उम्मीदवारों की औसत संपत्ति 1.56 से 2.81 करोड़ के बीच है। ऐसे उम्मीदवारों की तादाद के मामले में भी मणिपुर पांचों राज्यों में सबसे निचले पायदान पर है। यहां 83 करोड़पति उम्मीदवार मैदान में हैं, जबकि पहले नंबर पर रहने वाले उत्तरप्रदेश में इनकी तादाद एक हजार 325 है।
हां, एक मामले में मणिपुर का प्रदर्शन बेहतर नहीं है। वह है, महिलाओं की उम्मीदवारी। यहां चुनावों में महज 10 महिला उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रही हैं। इसके मुकाबले उत्तरप्रदेश में 344, पंजाब में 81, उत्तराखंड में 56 व गोवा में 18 महिलाएं मैदान में हैं। मगर, मणिपुर की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी शुरू से ही नगण्य रही है। वहां समाज के दूसरे क्षेत्रों में तो महिलाएं पुरुषों के मुकाबले ज्यादा सक्रिय हैं, पर जब राजनीति में भागीदारी की बात आती है, तो वे पिछड़ जाती हैं। दरअसल, पुरुष प्रधान समाज होने की वजह से कोई भी राजनीतिक दल महिलाओं को राजनीति की मुख्यधारा में शामिल करने को बढ़ावा नहीं देता है। ऐसे में चुनाव सुधार की बात करना बेमानी है।
चुनाव सुधार का मुख्य मुद्दा फिलहाल एक ही है कि चुनाव में बाहुबल और धनबल का प्रयोग और प्रभाव कम कैसे हो? धर्म और जाति के आधार पर वोट पर कब्जा, वंशवाद, उम्मीदवारों और दलों की बढ़ती संख्या, दलों में आंतरिक लोकतंत्र की कमी और घूस का स्वरूप लेते घोषणापत्रों को लेकर सुधार के कदमों की मांग धीरे-धीरे मुखर हो रही है। लेकिन उसका प्रभाव फिलहाल कहीं दिख नहीं रहा है। हालांकि, यह लोकतंत्र की मूल आस्था के विपरीत है। ताजा सुधार के कदम के तहत दो हजार से अधिक के राजनीतिक चंदे के नकद लेन-देन पर रोक लगा दी गई है। लेकिन इससे क्या होगा? सिर्फ कुछ पर्चियां और काटनी पड़ेंगी, राजनीतिक दलों को। वस्तुत: जब तक पार्टियां नंबर वन की दौड़ की जगह सुचिता और संस्कारों को आत्मसात नहीं करेंगी, स्थिति सुधरने वाली नहीं है।
वैसे भी सुधार कार्य वहीं सफल हुए, जहां इस काम के लिए समाज में पहले एक ढांचा विकसित हुआ। राजस्थान में बाल विवाह पर नियंत्रण पर कानून ने सिर्फ एक हद तक भय उत्पन्न करने की भूमिका निभाई, पर असल नियंत्रण तो स्वयं सामाजिक मानस बनने पर ही हुआ। मतदाता के सुधरने से बहुत कुछ सुधर सकता है। सुधार के कदमों को जमीन पर उतारने के लिए सुधरना स्वयं हमारे चुनाव आयोग को भी होगा।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने जाति, धर्म, समुदाय, भाषा के आधार पर वोट मांगने को गैर-कानूनी करार दिया है। दो साल से अधिक का कारावास होने पर विधायिका की सदस्यता रद्द होने का नियम है। नामांकन के वक्त झूठी जानकारी देने पर सदस्यता से वंचित किए जाने का नियम है। तय सीमा से अधिक चुनावी खर्च पर कार्रवाई होती है। इसकी जांच के लिए चुनाव आयोग उम्मीदवारों की रैलियों-सभाओं की वीडियो रिकॉर्डिग तक कराता है। इससे चुनावी खर्च में 40 फीसदी तक की कमी जरूर आई है, मगर खर्च सीमा का उल्लंघन बराबर जारी है।
इससे एक बात स्पष्ट है कि सुधार की सबसे पहली जरूरत खुद चुनाव आयोग को है। आयोग कोई न्यायिक संस्था नहीं है। लिहाजा, उसके निर्णयों को अदालत में चुनौती देकर उम्मीदवार बच जाते हैं। आचार संहिता का पालन सुनिश्चित कराने के लिए चुनाव के दौरान चुनाव आयोग को उम्मीदवार को जेल तक भेजने की वही न्यायिक शक्तियां प्रदान की जानी चाहिए, जो कि सामान्य समय में न्यायपालिका को होती हैं। अगर ऐसे कुछ कठोर कदम उठेंगे, तभी भारत की राजनीति की दशा और दिशा सुधरेगी। वरना तो दागी चुनाव लड़ते और जीतते रहेंगे।
विनोद कुमार उपाध्याय
(वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार)
 
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