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संपादकीय

मिलावट की मार से बेजार भारतवासी

By Raj Express | Publish Date: 3/10/2017 11:20:43 AM
मिलावट की मार से बेजार भारतवासी

होली का त्यौहार करीब आते ही मिलावट की खबरें फिर आने लगी हैं। हमारे देश में मिलावट कोई नया शब्द नहीं है। सालों से मिलावटखोरी चली आ रही है। मिलावट करके  धन कमाया जाता है व घटिया सामग्री उपभोक्ताओं को उपलब्ध कराई जाती है। मिलावटखोरी रोकने के शुरू से ही कई प्रयास किए जाते रहे हैं, लेकिन इस पर लगाम ही नहीं लगती। इस असफलता का एक प्रमुख कारण वह अधिकारी भी हैं, जो संबंधित विभागों में तैनात हैं। इनकी मिलीभगत के बिना मिलावटखोर धन्ना सेठ अपना कारोबार आगे नहीं बढ़ा सकते हैं। सुबह से शाम तक हम जितनी भी चीजें खाते हैं, उनमें प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से मिलावट की जाती है। एक अनुमान के अनुसार बाजार में उपलब्ध लगभग 30 से 40 प्रतिशत सामान में मिलावट होती है। मिलावटी सामान का निर्माण करने वाले हमारी आंखों में धूल झोंक रहे हैं। पिछले दिनों बड़े पैमाने पर हुई मिलावटी दूध की आपूर्ति से पता चलता है कि आजकल दूध भी स्वास्थ्यवर्धक न होकर मात्र नुकसानदेह तत्वों का पदार्थ बनकर रह गया है, जिसके इस्तेमाल से लाभ कम हानि ज्यादा होती है। हालत यह है कि लोग दूध के नाम पर यूरिया, डिटरजेंट, सोडा, पोस्टर कलर और रिफाइंड तेल पी रहे हैं। गौरतलब है कि पिछले साल सिंथेटिक दूध के काले कारोबार का पर्दाफाश हुआ था। उत्तरप्रदेश में स्वास्थ्य विभाग की जांच से यह चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया था कि यहां 25 फीसदी लोग घटिया, मिलावटी तथा हानिकारक दूध पी रहे हैं। चिंता की बात है कि मिलावट का कहर सबसे ज्यादा रोजमर्रा की जरूरत की चीजों पर ही टूट रहा है। नकली दूध, नकली घी, नकली तेल, नकली चायपत्ती, दालें, फल, सब्जियां, डिब्बा बंद खाद्य वस्तुएं, कोल्ड ड्रिंक्स, दवाइयां, मसाले यानी हर चीज मिलावट की चपेट में है। खेतों में अनाज, फल एवं सब्जियों पर छिड़के केमिकल के साथ आया जहर भी तो हमारी नसों में खून के साथ रच-बस गया है। विशेषज्ञ कहते हैं कि फल, सब्जियों तथा अनाज में यह मात्र इतनी ही रहनी चाहिए कि मनुष्यों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। पर रासायनिक खादों एवं कीटनाशकों के बल पर उपजाई गई फसलों के सेवन से लोग कैंसर, दिमागी बीमारियों के साथ ही अनुवांशिक जटिलताओं की चपेट में आते हैं एवं कई लोग स्थाई विकलांगता के शिकार हो जाते हैं। विगत वर्ष ही नूडल्स के पैकेट के नमूनों में मोनोसोडियम ग्लूटामेट और सीसा (लेड) की मात्र तय मानकों से अधिक पाई गई थी। मॉडर्न समाज के नए खान-पान नूडल्स, बर्गर, पिज्जा, पास्ता, कोल्ड ड्रिंक्स का स्वाद बढ़ाने के लिए इनमें कई तरह के रसायनों का इस्तेमाल होता है, जिसमें कमाई का पहलू ही देखा जाता है, लोगों की सेहत का नहीं। सब्जियों को गहरा हरा रंग देने के लिए प्रयोग किए जाने वाला मेलेकाइन ग्रीन लीवर, आंत, किडनी सहित पूरे ही पाचन तंत्र को नुकसान पहुंचाता है। मेलेकाइन ग्रीन का अधिक सेवन पुरूषों में नपुंसकता और औरतों में बांझपन का कारण बन सकता है। यही कैंसर की वजह भी बन सकता है। सब्जियों का आकार बढ़ाने के लिए ऑक्सीटोसिन के इंजेक्शन का प्रयोग होता है, जो पाचन तंत्र को प्रभावित करता है। दाल-चावल तथा अन्य अनाजों को रंगने, चमकाने हेतु मेटानिन यूरो तथा टाट्राजिन जैसे रसायनों का प्रयोग किया जाता है, जिससे दालों की पौष्टिकता समाप्त हो जाती है। दवाइयां तथा शराब तक मिलावटखोरी का शिकार हैं। शराब को ज्यादा मादक बनाने के लिए मिथाइल अल्कोहल का प्रयोग होता है, जिसकी थोड़ी ज्यादा मात्र भी घातक है। इस प्रकार, भारत में रोजमर्रा के खाद्य पदार्थ भी खाद्य सुरक्षा के मानकों पर खरे नहीं उतरते। इसके लिए सरकार को सख्त नियम बनाने के साथ-साथ खाद्य प्रयोगशालाओं की संख्या बढ़ानी चाहिए। चीन में प्रति दो लाख आबादी पर एक प्रयोगशाला है, जबकि भारत में नौ करोड़ लोगों पर एक। वर्तमान समय में सिर्फ 72 ही ऐसी लैब हैं, जिन्हें सौ गुना बढ़ाने की जरूरत है। अमेरिका, दुबई एवं सिंगापुर सहित कई देशों में मिलावट को लेकर बनाए गए नियम काफी सख्त हैं, लेकिन हमारे देश में तो सब चलता है, की तर्ज पर खूब मिलावट होती है। अन्य देशों में डिस्प्रिन, डी-कोल्ड, विक्स एक्शन-500, एन्ट्रोक्यूनाल, एनालजिन और सिसप्राइड जैसी दवाओं पर बैन है, लेकिन भारत में ये दवाइयां धड़ल्ले से बिक रही हैं। हमारे यहां इस्तेमाल किए जाने वाले कीटनाशकों में से करीब 70 देशों में बैन किए जा चुके हैं, क्योंकि ये हानिकारक होते हैं। ये केमिकल खाने के साथ हमारे शरीर में प्रवेश करते और अनेक स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म देते हैं। एक खिलौने के साथ मिलने वाली किंडर जॉय चॉकलेट भारत में खूब बिकती है, लेकिन यह अमेरिका में प्रतिबंधित है, क्योंकि यह बच्चों के गले चोक करती है। च्यवनप्राश कनाडा में बैन है, क्योंकि इसमें लेड और मरक्यूरी की मात्र ज्यादा है, पर भारत में प्रचारित किया जाता है कि बच्चों को इससे शक्ति मिलती है। इस तरह, मिलावट की समस्या सिर्फ पर्व-त्यौहारों तक ही सीमित नहीं है। सच तो यह है कि हम हमेशा ही मिलावटी खाद्य सामग्री खाने के लिए के लिए मजबूर हैं।

रेणु जैन (स्वतंत्र टिप्पणीकार)

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