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संपादकीय

साईबाबा जैसों को सजा ही मिले

By Raj Express | Publish Date: 3/10/2017 11:25:24 AM
साईबाबा जैसों को सजा ही मिले
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जीएन साईबाबा और उनके पांच साथियों को माओवादियों की चोरी छिपे मदद करने के आरोप में गढ़चिरौली (महाराष्ट्र) के सेशन कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनाई है। माओवादी संगठनों की विचारधारा से प्रभावित ऐसे बुद्धिजीवियों ने एक बार फिर से भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के लोकतंत्र पर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। गौरतलब है कि साईबाबा व उनके साथियों पर माओवादियों के बड़े नेताओं के संपर्क में रहने व उनके बीच मध्यस्थ का काम करने का आरोप था। माओवादी विचारधारा को राष्ट्रीय स्तर पर विस्तृत  करने में भी इनकी भूमिका बताई जाती है। कोर्ट में पुलिस द्वारा प्रस्तुत आरोप पत्र के अनुसार, माओवादी संगठनों के बीच साईबाबा ‘प्रकाश और चेतन’ के नाम से जाने जाते थे। ये छद्म नाम उन्होंने देश की आंखों में धूल झोंकने के लिए रखे थे। जाहिर है कि यह बहुत ही संगीन आरोप है और फिलहाल यह निचली अदालत में प्रमाणित भी हो गया है। मंगलवार को कड़ी सुरक्षा के बीच साईबाबा समेत सभी आरोपियों को गढ़चिरौली कोर्ट लाया गया। माओवादियों का समर्थन करने वाले बहुत से बुद्धिजीवियों को यह उम्मीद थी कि साईबाबा को सजा नहीं मिलेगी, लेकिन उनकी उम्मीद उस समय पूरी नहीं हुई, जब अदालत ने उन्हें दोषी मान लिया और उम्र कैद की सजा भी सुना दी। यह पहला मौका था, जब माओवादियों का समर्थन करने के मामले में एक साथ छह आरोपियों को उम्रकैद की सजा हुई है। बताना जरूरी है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी पढ़ाने वाले प्रो. साईबाबा (51) को नौ मई 2014 को गिरफ्तार किया गया था। उन पर सबसे संगीन आरोप यह था कि वे माओवादियों की मदद के खतरनाक उद्देश्य को पूरा करने के लिए हॉलैंड, लंदन, जर्मनी, ब्राजील, अमेरिका, हांगकांग के साथ- साथ जर्मनी का दौरा भी कर चुके थे। उनकी इन यात्रओं का लक्ष्य माओवादी विचारधारा से प्रभावित लोगों को संगठित करना, उन्हें भारत में सक्रिय माओवादियों के पक्ष में खड़ा करना और उनके नेटवर्क को मजबूत बनाना था।
प्रो. साईबाबा आंध्रप्रदेश के उत्तरी गोदावरी जिले के अमलापुरम के रहने वाले हैं। वे दिव्यांग हैं और अपनी शारीरिक दिक्कतों के चलते ट्राइसिकल से आवाजाही करते हैं। इसके बावजूद उन पर आरोप है कि वे माओवादियों के पक्ष में सक्रिय रहते थे और उन्हें सूचनाएं मुहैया कराने के साथ ही साथ सुरक्षा बलों के खिलाफ दुष्प्रचार भी करते थे। अगर माओवादियों से जूझ रहे सुरक्षा बलों पर आदिवासियों के दमन का आरोप लग जाता है तो इसमें साईबाबा जैसे लोगों का बहुत योगदान है। यह उन जैसे का ही दुष्प्रचार है। बता दें कि यह कोई पहली घटना नहीं है, जब किसी शिक्षित और समाज को सुशिक्षित करने वाले बुद्धिजीवी पर माओवादियों का समर्थन करने का आरोप लगा है। इससे पहले भी वामपंथी बुद्धिजीवियों का एक धड़ा उन्हें क्लीनचिट देता रहा है, उनके हत्याकांडों तक का समर्थन करता रहा है। यह सही है कि दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे कुछ अपवादों को अगर हम छोड़ दें तो माओवादियों का खुलकर समर्थन कोई नहीं करता। पर तर्को का जो जाल बुना जाता है, उसका मकसद माओवादियों और उनकी करतूतों का समर्थन करना ही होता है व ऐसा कई वामपंथी बुद्धिजीवी करते हैं। ऐसा करते समय वे यह भूल जाते हैं कि भले ही माओवादी संगठन खुद को गरीबों और वंचितों का हितैषी बताते हैं, लेकिन उनकी गतिविधियां इस समय आतंक का पर्याय बन चुकी हैं। वे न केवल लोकतंत्र व संविधान को ताक पर रखते हैं, बल्कि बंदूक के बल पर शासन व्यवस्था को बदलने का सपना भी देखते हैं, जबकि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में यह संभव ही नहीं है। यही वह बात है, जो माओवादियों के समर्थक बुद्धिजीवियों को समझनी चाहिए। इसके साथ ही उन्हें उनको देश की मुख्यधारा में लाने के प्रयास भी करने चाहिए, पर वे तो उन्हें क्रांति का सपना दिखाते हैं और इसका मतलब होता है, बंदूकों के दम पर सत्ता पर कब्जा करना। उल्लेखनीय है कि दिल्ली विश्वविद्यालय में न केवल देश से, बल्कि विदेशों से भी छात्र पढ़ने आते हैं। वे यहां केवल इसी उम्मीद से आते हैं कि यहां की संस्कृति और शिक्षा से कुछ सीख सकें। लेकिन जिन बुद्धिजीवियों के हाथों में देश के भविष्य की बागडोर सौंपी गई है, अब वे ही पथभ्रष्ट हो गए हैं, तो हम आम लोगों से क्या उम्मीद कर सकते हैं। तब केंद्र की सरकार को माओवादियों व उनके समर्थकों के प्रति किसी भी तरह की नरमी नहीं बरतनी चाहिए। ऐसे खतरनाक मंसूबों को पालने वालों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए, ताकि उनकी रूह कांप उठे, माओवादियों का समर्थन करने की बात दिमाग में आते ही। माना कि लोकतंत्र में हर किसी को अपने विचार रखने व प्रतिक्रिया व्यक्त करने का पूरा अधिकार होता है। इसके साथ ही नागरिक अपने लिए राजनीतिक विचारधारा का चुनाव करने के लिए भी स्वतंत्र हैं, पर देश विरोधी और निदरेष लोगों को मौत के घाट उतारने वालों का समर्थक होना कहां तक उचित है? हिंसा तो गलत ही होती है।
ऐसे लोगों का यह तर्क भी गलत है कि माओवादी संगठनों में वे गरीब एवं आदिवासी शामिल हैं, जो स्वयं को ठगा हुआ महसूस करते हैं। यदि सभी गरीब माओवादियों की तरह हथियार उठा लें, तब तो देश में अराजकता ही फैल जाएगी। जो लोग स्वयं को शोषित-पीड़ित या ठगा हुआ मानते हैं, वे अहिंसा के रास्ते पर चलकर अपनी बात देश के सामने क्यों नहीं रखते? हमारे देश का इतिहास इस बात का गवाह है कि अहिंसा के रास्ते पर चलकर हमने अंग्रेजों को खदेड़ दिया था। जब आजाद भारत में ऐसी कौन सी मांग है, जो अहिंसा के रास्ते पर चलकर पूरी न हो सके। फिर, हिंसा क्यों व हिंसा फैलाने वाले माओवादी आतंकियों का समर्थन क्यों?
वैसे भी साईबाबा जैसों ने केवल माओवादियों के हितों का ही ध्यान रखा। क्या उन्हें उन मासूमों से तनिक भी हमदर्दी नहीं, जिन्हें नक्सली मौत के घाट उतारने में जरा भी संकोच नहीं करते हैं? साईबाबा की कारगुजारी अदालत में साबित हो जाने के बाद से इसकी आशंका भी बढ़ गई है कि कहीं हमारे विश्वविद्यालयों में उनके जैसे और लोग तो नहीं हैं? एक गंभीर तथ्य यह है कि साईबाबा के साथियों में एक पत्रकार व जेएनयू का एक छात्र भी है। इस पर शायद ही किसी को हैरत हो कि जेएनयू का छात्र माओवादियों का साथी निकला। आखिर यह वही विश्वविद्यालय है, जहां माओवादियों का निशाना बने सुरक्षा बलों की मौत पर जश्न मनाया गया था। सो, इन बुद्धिजीवियों को सही रास्ते पर लाना ही होगा। साईबाबा को मिली सजा इसी दिशा में है। हां, यह मामला ऊंची अदालतों में जाएगा और वहां जब जो होगा, तब की तब देखी जाएगी। मगर गढ़चिरौली की अदालत का फैसला सही है।
सुनीता मिश्रा (टेलीविजन पत्रकार और स्तंभकार)
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