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संपादकीय

चुनाव परिणामों का इंतजार करें

By Raj Express | Publish Date: 3/10/2017 11:28:28 AM
चुनाव परिणामों का इंतजार करें
यदि हम एबीपी न्यूज को छोड़ दें तो तकरीबन सभी समाचार चैनलों ने उत्तरप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की जीत की ही संभावना अपने एक्जिट पोल में जता दी है। इंडिया टीवी-सी वोटर व एनडीटीवी ने बीजेपी को उत्तरप्रदेश में जीत के करीब दिखाया है। कमोबेश उत्तराखंड और गोवा में भी बीजेपी को लेकर एक्जिट पोल में ऐसी ही उम्मीद दिखाई गई है। पंजाब में अकाली-भाजपा सरकार की वापसी की आस आम लोगों तक को नहीं है, फिर एक्जिट पोल क्या कहेंगे? मणिपुर को लेकर साफ तस्वीर सामने नहीं आई है। पूर्वोत्तर के राज्य को उचित तवज्जो नहीं देना समझ में नहीं आया। हालांकि ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है। राष्ट्रीय मीडिया से पूर्वोत्तर के राज्य अकसर गायब ही रहते हैं। बहरहाल, एक्जिट पोल के नतीजों से बीजेपी को उत्साहित होना चाहिए और वह है भी। कांग्रेस ने उत्तरप्रदेश में उबरने की उम्मीद पाल रखी थी, इसलिए उसकी निराशा स्वाभाविक है। हालांकि, पंजाब को लेकर आ रही संभावनाएं उसके दर्द पर मरहम का काम करने वाली हैं। मायावती को मौजूदा चुनाव से काफी आस थी। लेकिन एक्जिट पोल के नतीजे उस पर पानी फेरते नजर आ रहे हैं। अपने पिता मुलायम सिंह यादव से बागी होकर और कांग्रेस से हाथ मिला कर अखिलेश यादव ने नई राजनीति का जो जोश दिखाया था, वह न्यूज एक्स के एक्जिट पोल के अलावा हर जगह धाराशायी ही नजर आया है। इससे साबित होता है कि जिस विकास के दावे और युवाओं के सहारे चुनावी नाव पार करने की उम्मीद अखिलेश ने पाली थी, वह कामयाब नहीं रही। अगर एक्जिट पोल के नतीजों से सबसे ज्यादा कोई परेशान होगा तो वे केजरीवाल होंगे। चुनाव अभियान की शुरुआत में उनकी आम आदमी पार्टी पंजाब और गोवा में सरकार बनाने की प्रबल दावेदार लग रही थी, लेकिन वह एक्जिट पोल के नतीजों में परिदृश्य से ही गायब नजर आ रही है। यह उस पार्टी के लिए सबसे बड़ा झटका ही माना जाएगा, जिससे लोगों ने नई राजनीति की बहुत उम्मीद लगा रखी थी। वैकल्पिक राजनीति का इतनी जल्दी ऐसा हश्र हो जाना एक तरह से उन लोगों की उम्मीदों का मरना ही है, जो कि मौजूदा राजनीति और व्यवस्था से परेशान हैं, उसमें बदलाव होते देखना चाहते हैं, मगर इसका यह मतलब नहीं है कि ये नतीजे हैं। बिहार और दिल्ली के विधानसभा चुनावों को लेकर भी कुछ ऐसे ही नतीजे कई एक्जिट पोल ने दिखाए थे, पर वास्तविक परिणाम कुछ और रहे थे। कभी चुनाव विश्लेषक और अब राजनीतिज्ञ योगेंद्र यादव कहा करते हैं कि एक्जिट पोल काला जादू नहीं होते। इसीलिए एक्जिट पोल को अटकलबाजी भी कहा-माना जाता है। ये कयासबाजी को जन्म तो दे सकते हैं, मगर इनके परिणाम बहुत कम मौकों पर ही सही निकलते हैं। अत: हमें नतीजों का ही इंतजार करना चाहिए। वैसे भी 11 मार्च अब दूर नहीं है और उस दिन सब स्पष्ट हो जाएगा कि कौन सा राजनीतिक दल और नेता कितने गहरे पानी में है। हम एक्जिट पोल को बस एक्जिट पोल ही मानकर चलें। 
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