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संपादकीय

गंभीर समस्या बन गया है ट्रैफिक जाम

By Raj Express | Publish Date: 3/11/2017 11:20:26 AM

 अब देश के महानगरों में लगने वाला ट्रैफिक जाम इतनी बुरी हालात में पहुंच गया है कि इसे महामारी तक कहा जाने लगा है। इससे करोड़ों लोगों का रोजमर्रा का जीवन भी भारी मुश्किलों में पड़ने लगा है एवं इस ट्रैफिक जाम से लोगों को रोज कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। सरकार ने ट्रैफिक कानून तो बहुत बनाए हैं, लेकिन इन पर अमल शायद ही होता है और यदि होता भी है तो बहुत कम, जिसके परिणामस्वरूप ही यह महामारी लगातार फैलती जा रही है। आईआईटी चेन्नई ने पिछले दिनों दिल्ली के ट्रैफिक के बारे में एक शोध किया। इस शोध में पता चला कि दिल्ली में लगातार बढ़ रहे वाहनों से ट्रैफिक इतना बढ़ गया है कि वहां अब वाहन चलते नहीं हैं, बल्कि सड़कों पर रेंगते हैं। देश की राजधानी में एक करोड़ से भी ज्यादा गाड़ियां हैं। एक सर्वे के मुताबिक, दुनिया भर में पार्किग की जगह को लेकर सबसे ज्यादा विवाद दिल्ली और बेंगलुरु में ही होते हैं। दिल्ली के 58 और बेंगलुरु के 44 फीसदी वाहन चालक तो पार्किग के लिए रोज बहस करते हैं। कभी-कभी यह विवाद भारी उग्र हो जाता है और लोगों को पुलिस के पास भी जाना पड़ता है। दूसरा तथ्य यह है कि एक दिन में हमारा देश 164 करोड़ रुपए से भी ज्यादा का नुकसान ट्रैफिक जमा की वजह से उठाता है, जबकि प्रतिवर्ष 47 हजार करोड़ रुपए का नुकसान इसलिए हो जाता है कि ट्रकों से ले जाया जाने वाला सामान वक्त पर अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पाता है। आईबीएम के एक सर्वे में 57 प्रतिशत लोगों ने माना है कि ट्रैफिक जाम की वजह से उनके स्वास्थ्य में खराबी आई है। चौंकाने वाली बात यह भी है कि ट्रैफिक जाम में फंसने के बाद एक व्यक्ति की 40 प्रतिशत तक क्षमता खत्म हो सकती है। चिंता की बात यह है कि ट्रैफिक के कारण लगे जाम से कुछ मौतें भी हुई हैं। डॉक्टरों का मानना है कि सड़कों पर ट्रैफिक जाम देखकर कई बार लोग लड़ाई-झगड़े पर भी उतारू हो जाते हैं, मारपीट तक हो जाती है। परिणाम यह होता है कि गुस्से की वजह से हाई ब्लड प्रेशर, सिरदर्द, थकान, चिड़चिड़ापन, स्किन प्रॉब्लम्स जैसी कई बीमारियां व्यक्ति को घेरने लगती हैं। ज्यादातर गाड़ियों से निकलने वाले धुएं में नाइट्रोजन ऑक्साइड व कैंसर पैदा करने वाले कुछ पदार्थ होते हैं। हालिया रिसर्च में इंग्लैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ सरे के भारतीय मूल के शोधकर्ता प्रशांत कुमार ने ट्रैफिक जाम पर किए रिसर्च में बताया है कि घंटों तथा लंबे ट्रैफिक जाम के कारण गाड़ियों से निकलने वाला धुंआ जहरीली गैस बनाता है, जिससे दिल की बीमारी एवं कैंसर होने का खतरा बढ़ने लगता है। इसके अलावा गाड़ियों का धुआं भूमि के तापमान को भी बढ़ाता है। यह धुआं ग्लोबल वार्मिग के प्रमुख कारणों में से एक है। ट्रैफिक जाम की समस्या से अकेला भारत ही नहीं जूझ रहा है, बल्कि पूरा विश्व ही इस पीड़ा को भोग रहा है। एक अध्ययन के अनुसार कैलिफोर्निया (अमेरिका का एक राज्य) का अकेला लांस एंजिलिस शहर एक साल में ट्रैफिक जाम की वजह से चार अरब लीटर ईंधन बर्बाद कर देता है। अमेरिका के नागरिकों को हर वर्ष करीब 68 अरब डालर (44 खरब रुपए) ट्रैफिक जाम के कारण ईंधन पर अलग से खर्च करने पड़ते हैं। वहीं, यूरोपीय देशों में भी करीब सौ खरब रुपए की बर्बादी ट्रैफिक जाम की वजह से होती है। अमेरिका के टैक्सास यातायात संस्थान ने अपने देश के 75 शहरी इलाकों का सर्वे किया, तो पाया कि वर्ष-1982 में ट्रैफिक जाम की वजह से पूरे साल के दौरान नागरिकों के 16 घंटे बेकार हो गए थे, मगर इसके बाद हर वर्ष यह गिनती बढ़ती ही चली गई।  एशियाई देशों में भी ट्रैफिक का हाल बहुत ही बुरा है। टोकियो तो ट्रैफिक जाम के लिए बदनाम है। जापान के अन्य शहर भी ट्रैफिक जाम की चपेट में हैं। वहीं, चीन में अगस्त-2010 में अभी तक का सबसे लंबा जाम लगा था। जी-6 बीजिंग तिब्बत एक्सप्रेस वे पर लगे इस जाम के दौरान सौ किलोमीटर तक गाड़ियों की लंबी लाइन लग गई थी। कई लोगों का कहना था कि वे पांच दिन तक जाम में फंसे रहे। इस बात में कितनी सच्चाई है, यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन चीन ने जाम की समस्या को बहुत गंभीरता से लिया है। उसने अब अपनी सड़कों पर ऐसी बसों को दौड़ाने की तैयारी कर ली है, जिनमें एक साथ 14 सौ यात्री सफर कर सकते हैं। खास बात यह है कि इन बसों को इस तरह बनाया गया है कि कारें या दूसरी छोटी गाड़ियां इनके नीचे से गुजर सकती हैं। लेकिन हम इसकी गंभीरता समझ ही नहीं पा रहे हैं। पहले तो यह होना चाहिए कि हम लोगों के मन में सड़क सुरक्षा के नियमों के प्रति सम्मान पैदा करें। भारत में ट्रैफिक नियमों एवं कानूनों की कमी नहीं है, पर उनको बहुत कम ही लोग मानते हैं। तब सरकार को यातायात के नियम तोड़ने वालों के प्रति जीरो टालरेंस की ही नीति अपनानी होगी। एक ग्लोबल सर्वे के मुताबिक दिल्ली और बेंगलुरु ट्रैफिक के मामले में दुनिया के दस सबसे खराब शहरों में शामिल हैं। सड़कों पर लेन सिस्टम का पालन नहीं होता है, इसके अलावा रैलियां, प्रदर्शन व जुलूस वगैरह के कारण भी जाम लग जाते हैं। इसीलिए नियंत्रित इन सभी को भी करना होगा।

 नवीन जैन (स्वतंत्र टिप्पणीकार)
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