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संपादकीय

मोदी ने बदला राजनीति का मिजाज

By Raj Express | Publish Date: 3/14/2017 4:54:35 PM
मोदी ने बदला राजनीति का मिजाज
पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणामों को यदि राज्यवार देखा जाए तो कांग्रेस और भाजपा के लिए मिले-जुले ही कहे जा सकते हैं, लेकिन उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड में भाजपा को मिली ऐतिहासिक जीत ने राष्ट्रीय परिदृश्य पर एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी एवं भाजपाध्यक्ष अमित शाह को निर्विवाद स्वीकृति दे दी है। खासतौर पर भाजपा को मिली यह विराट विजय मोदी लहर के अब भी बरकरार रहने के दावे पर मुहर लगाती है। इस लहर के बारे में अनेक लोग यह मान रहे थे कि वह उतार पर है। इसकी वजह ये लोग यह बताते थे कि मोदी सरकार जनता की वे अपेक्षाएं पूरी नहीं कर पाई है, जो 2014 के लोकसभा चुनाव में जगाई गई थीं। पर अब यह दावा हवा हुआ और साबित यह हो गया है कि देश में मोदी की लहर बरकरार है। यूं तो इस देश ने पं.जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी की लहरें भी देखी हैं, लेकिन मोदी लहर इस मायने में सबसे भिन्न है कि नोटबंदी जैसा कदम उठाने के बाद भी वह बनी हुई है, जबकि इसके नुकसानों को गिनाने वालों की संख्या भी इस देश में कम नहीं है। जो भी हो, लेकिन इन परिणामों ने मायावती, अखिलेश यादव, अजित सिंह जैसे बड़े छत्रपों की लुटिया डुबो दी है। इन लोगों को इतनी जबर्दस्त शिकस्त मिली है, जिसकी कल्पना भी नहीं की होगी। जो अजित सिंह पश्चिमी उत्तरप्रदेश की राजनीति में सिरमौर हुआ करते थे, वे अब कहीं के नहीं रहे हैं। मायावती का भी यही हाल हुआ है। वैसे भी यह लगातार देखने में आ रहा है कि भाजपा अपनी आक्रामक राजनीतिक शैली के दम पर क्षेत्रीय दलों को हाशिए पर धकेलने में कामयाब हो रही है। यह 2014 में झारखंड और महाराष्ट्र में दिखा। फिर हरियाणा व 2016 में असम में भी दिखा। अभी हाल में महाराष्ट्र में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में भी यही देखा गया। यूपी भी इसका अपवाद नहीं है। इससे एक बार फिर देश के अंदर किसी राष्ट्रीय दल के अखिल भारतीय आधिपत्य का दौर शुरू हो गया है। यह अलग बात है कि कांग्रेस की जगह भाजपा ने ले ली है। एक समय कांग्रेस का वर्चस्व था, तो अब उसकी जगह भाजपा लेने लगी है। तर्क यह भी दिया जा सकता है कि एंटीइनकंबेंसी फैक्टर के कारण मतदाताओं ने इन पांचों राज्यों में सत्तारूढ़ दलों को कुर्सी से उतार फेंका या यूपी में लगभग 60 फीसदी लोगों ने भाजपा के विरोध में भी तो मतदान किया, लेकिन ये लंगड़े तर्क हैं। हकीकत यह है कि भाजपा के पाले में जाने के लिए मतदाताओं ने इस बार जाति, धर्म और परिवारवाद की सीमाएं तोड़ डाली हैं और एक भी मुस्लिम को टिकट न देने के बाद भी उन सीटों पर भी कमल खिला दिया है, जहां मुस्लिम या यादव मतदाता निर्णायक रहते थे। और तो और, देवबंद सीट पर भी कमल खिल गया, जहां किसी गैर-मुस्लिम प्रत्याशी की जीत की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।
ब्राह्मणों और बनियों की पार्टी के नाम से पहचानी जाने वाली भाजपा ने दलितों की पार्टी कही जाने वाली बसपा एवं मुस्लिमों की प्रिय पार्टी सपा से क्रमश: दलितों और मुस्लिमों के एक बड़े धड़े को तोड़कर अपनी तरफ कर लिया है। भाजपा को यूपी के 41 प्रतिशत एससी, 45 प्रतिशत जाट, 38 प्रतिशत यादव और 44 प्रतिशत सामान्य मतदाताओं ने वोट दिया। यह यूपी और देश की बदलती राजनीति का संकेत है, जो भाजपा के लिए वोट बैंक का अखिल भारतीय नमूना बन सकता है। यदि ऐसा हो गया तो देश के तकरीबन हर बड़े राज्य में आने वाले कई वर्षो तक किसी भी राजनीतिक पार्टी के लिए भाजपा से पार पाना मुश्किल होगा।
इस महत्वपूर्ण बदलाव के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व भाजपा संगठन के मुखिया अमित शाह को पूरा श्रेय  देना ही पड़ेगा। दोनों ने समूचे यूपी में 2014 के लोकसभा चुनावों की सुनामी के बाद अब विधानसभा चुनावों में मिली रिकॉर्ड जीत से 2019 के आम चुनावों की मजबूत पीठिका तैयार कर दी है। यूपी में सर्वत्र मिली जीत भाजपा को 2018 के मध्य तक राज्यसभा में मजबूत कर देगी, जिससे वह अहम नीतिगत फैसले लेने के लिए स्वतंत्र हो जाएगी। आगामी राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए भाजपा आत्मनिर्भर हो जाएगी और इस साल के अंत में होने जा रहे गुजरात व हिमाचल के विधानसभा चुनाव भी इन नतीजों से अछूते नहीं रहेंगे। सब जानते हैं कि 80 लोकसभा सीटों वाले यूपी से ही केंद्र की सत्ता का रास्ता जाता है और यूपी में मोदी के लगातार चल रहे जादू ने कांग्रेस, सपा, बसपा और अन्य क्षेत्रीय दलों के मन में भय भर दिया है। हो सकता है कि सभी गैर-भाजपाई विपक्षी दल भाजपा के खिलाफ महागठबंधन बनाने के प्रयासों में जुट जाएं। मायावती दलित विमर्श को लेकर भले ही चर्चाओं में बनी रहें, लेकिन लोकसभा में वे सांसद विहीन हैं और अब यूपी में उंगलियों पर गिनने लायक सीटों पर सिमट गई हैं। अखिलेश यादव की बुरी पराजय वर्चस्व की लड़ाई में सपा के विभीषणों के हौसले बुलंद करेगी, जिसका साफ-साफ इशारा उनकी सौतेली मां साधना गुप्ता व उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव ने कर भी दिया है। पश्चिमी उत्तरप्रदेश को अपना गढ़ मानकर चलते रहे अजित सिंह मात्र एक सीट जीत पाए हैं, पर इस चुनाव का सबसे ज्यादा असर कांग्रेस पर पड़ेगा, जो समाजवादी पार्टी से गठबंधन करने के बाद भी कुछ हासिल नहीं कर पाई है। अत: पार्टी के अंदर राहुल गांधी के खिलाफ आवाज उठ सकती है और अगर ऐसा न भी हो तब भी उसे गठजोड़ की राजनीति की शरण में तो जाना पड़ेगा। वह दौर अब शुरू हो गया, जब कांग्रेस गठजोड़ की राजनीति से कन्नी नहीं काट सकती है। हालांकि, वह पहले भी गठबंधन करती रही है, पर तब ज्यादातर मौकों पर यह काम उसकी शर्तो पर होता था, जो अब नहीं हो पाएगा।
इधर, यूपी की इस जीत अथवा देश में पिछले दिनों संपन्न स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा को मिली जीत का आर्थिक मोर्चे पर असर देखें, तो नोटबंदी के दुष्प्रभाव की बहस निष्प्राण हो चुकी है। अब जीएसटी पूरे प्रभाव के साथ अमल में आ सकेगा व मार्केट पर देशी-विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा। केंद्र सरकार श्रम सुधारों के साथ ही साथ पांच प्रमुख सेक्टरों में एफडीआई के नियमों में ढील देने का भी फैसला ले सकती है। लेकिन यूपी की विराट जीत का एक बड़ा खतरा यह है कि भाजपा के समर्थक पूरे देश में पहले से ज्यादा आक्रामक हो सकते हैं। इससे समाज में ध्रुवीकरण की गति तेज होगी और अस्थिरता भी बढ़ सकती है। इसके फलस्वरूप मोदी को वे सभी वादे पूरे करने में दिक्कत आ सकती है, जो उन्होंने 2014 में देश और अब उत्तरप्रदेश की आम जनता से किए हैं। इस तरह, भाजपा को मिली यह भारी सफलता देश की राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत दे रही है, लेकिन यह बदलाव यदि सकारात्मक दिशा में होगा, तभी देश का कुछ भला हो सकेगा।
विजय शंकर चतुर्वेदी (वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार)
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