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संपादकीय

संघर्ष की मिसाल दोस्तोयेव्स्की

By Raj Express | Publish Date: 3/14/2017 5:08:48 PM
संघर्ष की मिसाल दोस्तोयेव्स्की

फ्योदोर दोस्तोयेव्स्की रूस के लेखक थे। उनका शुरुआती जीवन बेहद दुखद रहा। जब वे मात्र तेरह वर्ष के थे, तभी उनकी मां की मृत्यु हो गई। 18 वर्ष के हुए तो नौकरों ने उनके पिता की हत्या कर दी। इसके बाद उन्हें मिरगी के दौरे पड़ने लगे। एक दिन एक दौरे में उनकी दायीं आंख फूट गई। उनके सामने न तो परिवार था और न ही कोई प्रेरणा। कुछ समय बाद उन्हें मिलिट्री इंजीनियर की नौकरी मिल गई। लेकिन उन्हें बार-बार लगता कि उनकी मंजिल यह नौकरी नहीं, बल्कि कुछ और है। उन्हें लिखने का शौक था, पर नौकरी के कारण उन्हें लेखन के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता था। एक दिन उन्होंने नौकरी छोड़ दी व पूरे समय लिखने का मन बना लिया। उनका पहला उपन्यास ‘पुअर फोक’ बहुत लोकप्रिय हुआ, पर कुछ समय बाद ही उन पर क्रांतिकारी षड्यंत्र रचने का आरोप लगाकर उन्हें मृत्युदंड की सजा सुना दी गई। मृत्युदंड देने से कुछ मिनट पहले ही उनकी सजा बदल दी गई व उन्हें साइबेरिया जाने की सजा दी गई। 10 साल बाद लेनिनग्राद लौटकर दोस्तोयेव्स्की ने फिर से लिखना शुरू कर दिया। खराब स्वास्थ्य, गरीबी व कष्टों से भरे जीवन के बावजूद उन्होंने कई अमर कृतियां रचीं। जेल में रहते समय उन्होंने कैदियों को करीब से देखा था। इसका वर्णन उनकी कृति ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ में मिलता है। मनोवैज्ञानिक उपन्यास के जनक दोस्तोयेव्स्की पाठकों के हृदय को छूने में सफल इसलिए रहे, क्योंकि उन्होंने जो कष्ट भोगे थे, उन्हीं को लेखन में उतारा। उन्होंने पूरी दुनिया के समक्ष यह सिद्ध कर दिया कि यदि व्यक्ति चाहे तो कष्ट व संघर्ष से लड़कर न सिर्फ अपने लिए एक खास जगह बना सकता है, बल्कि दुनिया के लिए प्रेरणास्रोत भी बन सकता है।

रेनू सैनी

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