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संपादकीय

तेजी से न्याय मिलने की उम्मीद बढ़ी

By Raj Express | Publish Date: 3/15/2017 11:25:31 AM
तेजी से न्याय मिलने की उम्मीद बढ़ी

सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि दूसरी अन्य सेवाओं की तरह न्यायिक सेवाएं सिर्फ कानूनी सेवा नहीं हैं। ये तो समाज की सेवा का मिशन हैं। अगर कतारों में खड़े लोगों की लंबे समय तक बारी नहीं आती है तो इस सेवा का उद्देश्य हासिल नहीं होगा। वाकई हर व्यक्ति को न्याय पाने का अधिकार है। हालांकि, यह मूल अधिकारों में शामिल नहीं है, पर सुप्रीम कोर्ट ने इसे अपने एक फैसले में मूल अधिकार भी माना है। लेकिन विडंबना यह है कि न्याय में होती देरी, न केवल एक गरीब एवं आम नागरिक को शारीरिक, आर्थिक व मानसिक रूप से तोड़ देती है, बल्कि न्याय प्रक्रिया की साख पर भी गहरा कुठाराघात करती है। हमारे देश में समय पर न्याय न हो पाने का ही नतीजा है कि तमाम न्यायालयों में तीन करोड़ से ज्यादा मुकदमे अभी लंबित पड़े हैं। हद तो यह है कि हमारे न्यायिक तंत्र में पर्याप्त न्यायाधीश भी नहीं हैं। बीते वर्ष आई एक रिपोर्ट के अनुसार देश में न्यायाधीशों की मौजूदा संख्या लगभग 21 हजार है, जबकि मौजूदा मुकदमों की सुनवाई के लिए यह संख्या 40 हजार होनी चाहिए। यहां तक कि सुनवाई तिथि का लगातार आगे बढ़ते रहना और वकीलों की हड़तालों से भी केसों की लंबी लिस्ट बनती रहती है। पिछले साल तत्कालीन न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने अदालतों में लंबित पड़े तीन करोड़ से ज्यादा केसों को निपटाने के लिए 40 हजार जजों की जरूरत बताई थी। तब ठाकुर के इस कथन से मोदी सरकार ने यह कहते हुए पल्ला झाड़ लिया था कि उनके इस बयान के पीछे कोई वैज्ञानिक शोध या आंकड़ा नहीं है। यह आंकड़ा सही नहीं। तब आठ मई-1987 को लॉ कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर टीएस ठाकुर ने कहा था कि न्यायपालिका को लंबित पड़े करोड़ों केसों को निपटाने के लिए 40 हजार जजों की जरूरत है। उन्होंने कहा था, अभी भारत में 10 लाख की जनसंख्या पर 10.5 जज हैं, यह संख्या दुनिया में सबसे कम में से एक है। 1987 में लॉ कमीशन ने अनुशंसा की थी कि 10 लाख जनसंख्या पर कम से कम 40 जज होने चाहिए। 2014 में कमीशन ने अपनी 245वीं रिपोर्ट में कहा था कि 10 लाख की आबादी पर 50 जज हों। बहरहाल, अभी हमारे पास 20 हजार 502 ट्रायल कोर्ट जज, एक हजार 65 हाईकोर्ट जज, 31 सुप्रीम कोर्ट के जजों समेत कुल 21 हजार 598 जज हैं। मोदी सरकार के दो वर्ष पूरे होने के मौके पर अपने मंत्रलय के कामकाज की रिपोर्ट पेश करते हुए कानून मंत्री सदानंद गौड़ा ने सफाई दी थी कि केंद्र जजों की नियुक्ति में जानबूझकर देरी नहीं कर रहा है। उन्होंने कहा था कि केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में चार जजों की नियुक्ति के लिए आए नामों पर छह दिनों में फैसला ले लिया था। उन्होंने कहा था, केंद्र ने हाईकोर्टो में 170 जजों की नियुक्ति के लिए नामों के चयन की प्रक्रिया शुरू कर दी है। ये नाम जल्द ही साफ हो जाएंगे। गौड़ा ने बताया था कि एक जून-2014 को हाईकोर्ट में जजों की संख्या 906 थी, जो कि अब बढ़कर एक हजार 44 हो गई। इसके अलावा, सबऑर्डिनेट कोर्टो में जजों की संख्या 2012 में 17 हजार 715 थी, जो अब 20 हजार 502 हो गई है। यानी, स्थिति में सुधार हो रहा है। उल्लेखनीय है कि मुकदमों के लंबित होने का एकमात्र कारण जजों की संख्या का कम होना ही नहीं है। कानून मंत्रलय ने इससे जुड़े तथ्यों की जांच जब कराई, तो यही पाया कि इसके और भी कारण हैं। इनमें न्यायालय प्रबंधन की खामियां, सुनवाई तिथि का आगे बढ़ते रहना, वकीलों की हड़ताल व पहली अपील का लंबित रहना जैसे कारण प्रमुख थे। इसीलिए अब इसका संज्ञान लेते हुए बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट ने केस निपटाने की डेडलाइन तय कर दी है। न्यायमूर्ति एके गोयल तथा यूयू ललित की पीठ ने देशभर के हाईकोर्ट व ट्रायल कोर्टो में लंबे समय से लंबित आपराधिक केस निपटाने को कहा है। उसने कहा कि ट्रायल कोर्ट जमानत के मामले एक हफ्ते में निपटा दें। न्यायालय ने सरकार से कहा कि जांच में तेजी लाने के लिए फॉरेंसिक लैब स्थापित करने में भी तेजी लाना जरूरी है। कोर्ट का यह निर्देश फौरन माना जाना चाहिए। आरोपियों को समय पर समन तामील कराना, चार्जशीट समय पर फाइल करना एवं आरोपियों को चार्जशीट की कॉपी समय पर देने जैसे कामों की निगरानी जरूरी है। वहीं, बार एसोसिएशन से अदालत ने कहा कि वह अकसर हड़ताल और शोकसभा इत्यादि के बहाने काम बंद कर देते हैं, जिससे केस प्रभावित होते हैं। सो, वकीलों को हड़ताल आदि करने से बचना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि हाईकोर्ट अपने समक्ष दायर जमानत याचिकाएं अधिकतम एक महीने में निपटा दें। हाईकोर्ट अधीनस्थ अदालतों के लिए डेडलाइन तय करें व गंभीर आपराधिक केस दो साल में निपटाएं। यदि आरोपी जेल में है तो सत्र अदालतें गंभीर अपराधों के केस भी दो साल में निपटाएं। साफ है कि सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश पर अमल होने की संभावना भी है। वस्तुत: उसने निर्देश सरकार को नहीं दिया, बल्कि उन अदालतों को दिया है, जो उसी के अधीन रहकर काम करती हैं। अत: हमें मानकर चलना चाहिए कि अपराधों का न्याय अब एक समय सीमा में हो सकेगा।

अक्षय नेमा (स्वतंत्र टिप्पणीकार) 

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