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संपादकीय

छत्तीसगढ़ में हाथियों की घर वापसी

By Raj Express | Publish Date: 3/15/2017 11:31:40 AM
छत्तीसगढ़ में हाथियों की घर वापसी
अविभाजित मध्यप्रदेश के छत्तीसगढ़ में हाथियों के उत्पात की खबर मैंने सर्वप्रथम अस्सी के दशक के अंत में सुनी थी। वर्ष-1988 में ये जशपुर से लगभग 25 किलोमीटर दूर मनोरा ग्राम में देखे गए थे। जनवरी-1989 में गजराजों का एक झुंड सरगुजा जिले के कुसमी इलाके में देखा गया। जनवरी-1990 में ये जशपुर-सरगुजा सीमा पर सिविलदाग ग्राम के आसपास देखे गए। इस ग्राम के नामकरण की कहानी बहुत दिलचस्प है। अठारहवीं सदी के अंत में सेवाइल नामक एक अंग्रेज अफसर, जो जशपुर में रेजीडेंट था, बंदोबस्त कार्य के सिलसिले में यहां काफी दिनों तक डेरा डाले पड़ा रहा। उसी के नाम पर गांव का नाम सिविलदाग हो गया। फरवरी-1991 में  हाथियों का यह घुमंतु झुंड कुसमी रेंज के चांदो पठार व सामरी के पास अवतरित हुआ। इनकी संख्या सदैव 10 से 18 तक देखी गई थी। अप्रैल-1991 में ये हाथी बिहार की सीमा पर जशपुर के पूर्व में जामाटोला में देखे गए।
अविभाजित मध्यप्रदेश के वन विभाग में जनसंपर्क -प्रमुख था मैं। अप्रैल में अपनी सेवानिवृत्ति तक मैंने इन हाथियों की आवाजाही का अध्ययन किया। तीन तार के एक विद्युत प्रवाहित बाड़े में 10 हाथियों के एक झुंड को सीमित करने का एक तत्कालीन मुख्य वन संरक्षक (वन्य प्राणी) का तुगलकी ऑपरेशन भी देखा, जिसका उल्लेख इसी लेख में आगे किया जाएगा। एक पर्यावरण-अध्येता की जिज्ञासा से मैंने यह जानने की कोशिश की आखिर जंगली हाथियों की ये नियमित आवाजाही बिहार और उड़ीसा से छत्तीसगढ़ में ही क्यों होती है? पहले तो इन दोनों राज्यों ने साफ कह दिया था कि ये हाथी उनके यहां से नहीं आते, मगर जब तत्कालीन केंद्रीय वन महानिरीक्षक पीएन ओक के सामने चर्चा में यह बिंदु रेखांकित हुआ कि हाथी बंगाल या तमिलनाडु से तो नहीं आ सकते, तब उक्त दोनों राज्यों ने मान लिया कि हाथी उन्हीं के यहां से आते हैं। आवाजाही के मार्गो के नक्शे देखकर बिहार के तत्कालीन मुख्य वनसंरक्षक आरपी सिंह ने भी यह बात मान ली। वन अधिकारियों ने माना था कि इनके प्राकृतिक रहवास क्षेत्र में साल-वनों की अंधाधुंध कटाई के कारण जो विघ्न-बाधा उपस्थित हुई है, उसके नतीजतन घबराकर ये गजराज छत्तीसगढ़ के साल-वनों की तरफ आते हैं, जिन्हें ये अपना वैकल्पिक रहवास समझते हैं। इनकी आवाजाही के रास्तों में दो वनक्षेत्रों के बीच गांव बसे हैं। कोई प्राकृतिक कॉरीडोर नहीं है। धान की फसल व आदिवासियों द्वारा बनाई चावल-महुआ की शराब भी इन्हें आकषिर्त करती है। झोपड़ियों के छप्परों में से सूंड डालकर ये नीचे रखे चावल खा लेते हैं। ग्रामवासियों से टकराव स्वाभाविक है, इनका। 1980 से अब तक सैकड़ों ग्रामीण हाथियों ने मार डाले हैं। अभी इसी महीने खबर आई है कि 42 गांवों के लोग हाथियों के डर की वजह से रात को सो नहीं पाते हैं। पहले तो ये आकर चले जाते थे, मगर बाद में छह-छह मास तक रुकने लगे और प्रजनन भी किया। कैप्टन जे. फारसायथ की पुस्तक ‘द हाइलेंट्स ऑफ सेंट्रल इंडिया’ (पृष्ठ-436-37) में जब मैंने शहडोल और बिलासपुर जिलों में हाथियों की उपस्थिति का वृतांत पढ़ा, तो ऐसा लगा कि बिहार-उड़ीसा से विस्थापित हाथी छत्तीसगढ़ में अब अपने पुराने घर को वापस लौट रहे हैं। फारसायथ ने अमरकंटक और पेंड्रा से लगे 12 सौ मील क्षेत्र में 1865-67 के बीच दो से तीन सौ हाथी होने का उल्लेख किया है। एक अंग्रेज सैटिलमेंट अफसर जेडब्ल्यू चिशोल्म ने अपनी रिपोर्ट में उक्त अवधि में ब्रिटिश सरकार द्वारा इसी वनक्षेत्र में हाथी पकड़वाने का उल्लेख भी किया है। अंतिम जंगली हाथी सरगुजा के जंगल में 1939 में मारे जाने का उल्लेख है। जंगली हाथियों की उपस्थिति का एक विवरण फारसायथ के शब्दों में-‘माटिन से उत्तरपूर्व में मालिनडेह नामक पहाड़ी के ढलान पर हाथियों की बहुत सी हड्डियां पड़ी थीं।.. माटिन के ठाकुर सदल-बल पहाड़ी की चोटी पर बने मंदिर में पूजा के लिए जा रहे थे। ढोल-नगाड़े बज रहे थे। वे नहीं जानते थे कि वहीं पांच हाथियों का एक झुंड था, जो इन आवाजों से चौंक-बिदक कर ढलान की तरफ भागा। यद्यपि हाथी फूंक-फूंक कर पांव रखते हैं, किन्तु भीड़ और शोर-शराबे के कारण चार हाथी नीचे गिर गए और पांचवें ने ठाकुर के दल पर हमला बोल दिया..। संभवत: यही वह हाथी था, जिसने मुझ पर भी हमला किया था।..नीचे जो कंकाल पड़े थे, वे उन्हीं चार हाथियों के थे..।’ इस लेख को समाप्त करने से पहले मध्यप्रदेश वन विभाग के उस प्रकल्प का भी उल्लेख करना प्रासंगिक है, जो उसने सिविलदाग ग्राम के पास लगभग 62 वर्ग किलोमीटर का एक विद्युत प्रवाहित बाड़ा बनाकर 10 जंगली हाथियों को कैद करने के लिए क्रियान्वित किया था। मैंने उस सरकारी उपक्रम का एक जिज्ञासु की भांति अवलोकन किया था। तीन तारों के इस बाड़े की लंबाई 32 किलोमीटर थी, जो मोटे-मोटे साल वृक्षों के तनों में ठोककर बनाया गया था। दरअसल, इस झुंड में 11 हाथी थे। 10 तो इस बाड़े मैं फंस गए। एक दतैल मस्त गजराज बाहर रह गया। इस इलाके में बिजली नहीं थी। इस कारण सोलर-पैनलों की सहायता से सौर-ऊर्जा का प्रवाह किया गया। सिविलदाग ग्राम में ही वन विभाग ने जंगली हाथियों को फंसाने के लिए आठ पालतू हथनियां भी रखी थीं। इनमें से दो गजगामिनियों का नाम था-प्रेमकली, रूपकली। वह ग्यारहवां मस्त नर हाथी भी इस ‘रूप-प्रेम’ के चक्कर में फंसकर बाड़े में कैद हो गया। सिविलदाग गांव के नाम पर इस हाथी का नाम सिविल बहादुर रख दिया गया। वष्र ऋतु में भीषण आंधी-पानी से एक वृक्ष गिर गया। हाथी तो वन विभाग से ज्यादा समझदार थे, सो वे उसी वृक्ष पर पांव रखकर फरार हो गए। तब एक सुझाव यह भी आया था कि जशपुर के 430 किलोमीटर के समरस्रोत अभयारण्य में इन हाथियों को रोककर रख लिया जाए, लेकिन यह व्यवहारिक साबित नहीं हुआ। हाथियों को रोका नहीं जा सका। उस समय आए कुछ सुझाव तो बड़े ‘विलक्षण’ किस्म के थे। एक अतिवरिष्ठ वन अधिकारी का सुझाव यह था कि बाघ की आवाज रिकार्ड करके कैसेट बनाए जाएं और गजराज की आवाजाही के मार्ग पर बाघ का मूत्र छिड़का जाए। हाथी डरकर नहीं आएंगे। भोपाल स्थित वन विहार उद्यान में वनकर्मी महीनों तक बाघ का मूत्र इकट्ठा करते रहे। अच्छा यह हुआ कि इस प्रयोग का परिणाम आने के पहले ही संबंधित अधिकारी रिटायर हो गए। मूल समस्या यह है कि बिहार से छत्तीसगढ़ तक लगे साल-वन क्षेत्र में हाथियों के आवागमन मार्ग पर अब कोई ऐसा गलियारा नहीं बचा है, जो मानव विघ्न-बाधा से मुक्त हो। ये हाथी तो निरंतर आते रहेंगे, गलियारा हो या न हो। यह उनकी घर वापसी है, जो समय-समय पर होती रहेगी और छत्तीसगढ़ इस समस्या से जूझता रहेगा।
घनश्याम सक्सेना (वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार) 
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