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संपादकीय

उत्तरप्रदेश में ओछी बयानबाजी का दौर

By Raj Express | Publish Date: 2/22/2017 1:50:06 PM
उत्तरप्रदेश में ओछी बयानबाजी का दौर

 उत्तरप्रदेश में तीन चरण का मतदान हो चुका है और इस दौरान राजनीति के मिजाज में एक बुनियादी बदलाव देखा जा सकता है। चुनाव अभियान की शुरुआत विकास,जन-समस्याओं के समाधान के मुद्दों से हुई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी,सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव,बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती,उत्तरप्रदेश के यह चारों ही बड़े राजनीतिक खिलाड़ी विकास की राजनीति करते दिख रहे थे। जहां अखिलेश अपनी सरकार की उपलब्धियां बताते थे,वहीं नरेंद्र मोदी अपनी केंद्र सरकार कीं। इसके अतिरिक्त वे अखिलेश के दावों की पोल भी खोलते थे। समाजवादी पार्टी एवं कांग्रेस के बीच गठबंधन होने से पहले तक राहुल गांधी भी राज्य सरकार के दावों की पोल ही खोलते थे और खैर बहुजन समाज पार्टी यूपी में समाजवादी पार्टी की वास्तविक प्रतिद्वंद्वी है,इसीलिए मायावती न सिर्फ अखिलेश पर प्रहार कर रही थीं,बल्कि मुलायम सिंह पर भी। इन पारस्परिक प्रहारों के बावजूद चुनाव अभियान के केंद्र में मूल रूप से विकास ही था। लेकिन अब चीजें बदलने लगी हैं। अब स्थिति यह है कि नेता एक-दूसरे पर अत्यंत फूहड़ आरोप तो लगा ही रहे हैं,सभी अपने-अपने हिसाब से ध्रुवीकरण की भी कोशिशें कर रहे हैं। भाजपा को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण लुभाता है,इसलिए वह इस कोशिश में लगी दिखने लगी है,तो समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को जातीय अंक गणित आकर्षित करता है। अत:ये दोनों पार्टियां खुलकर जातिवाद का खेल शुरू कर चुकी हैं। मतदाताओं को आरक्षण का डर सपा भी दिखा रही है और बसपा भी। संघ के नेताओं के पुराने बयानों का हवाला दे-देकर मायावती कह रही हैं कि उत्तरप्रदेश में भाजपा अगर जीत गई तो वह केंद्र में भी मजबूत होगी। राज्यसभा में उसके सांसदों की संख्या बढ़ेगी और तब वह आरक्षण समाप्त कर देगी। ऐसा ही कुछ अखिलेश यादव भी कहते हैं। अलबत्ता,वे अपने मतदाताओं को केवल डर ही नहीं दिखाते, बल्कि यह भी कहते हैं कि उनकी पार्टी जब तक है,आरक्षण खत्म करने की हिम्मत कोई नहीं जुटा सकता। चूंकि आरक्षण देश के सबसे ज्वलंत राजनीतिक मुद्दों में से एक है,इसीलिए चुनावी राजनीति में अगर इसे लाया जाता है तो मेरे जैसे बहुत से लोग इस बात को गलत नहीं मान सकते,पर आरक्षण के लिए जातिगत ध्रुवीकरण को बढ़ाकर चुनाव में बढ़त बनाने के प्रयास सही नहीं हैं। राजनीतिक दलों को सत्ता के लिए समाज को बांटने के प्रयास नहीं करने चाहिए। लेकिन इस मामले में भाजपा भी पीछे नहीं है। उसके सामने जब आरक्षण या अगर सीधे शब्दों में कहें तो उसके सामने जब जातिवाद की राजनीति का सवाल आता है तो वह असहज हो जाती है,क्योंकि यदि वह कहे भी कि वह आरक्षण की समर्थक है,तब भी दलित व पिछड़े उस पर भरोसा नहीं करते। अत:वह धर्म का सहारा लेती है।

भाजपा के तमाम नेता वैसे भी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ा रहे थे,कोई दंगे कराने की बात कर रहा था तो कोई पश्चिमी यूपी के कश्मीर बनने की,लेकिन इसे हवा तब ज्यादा मिली,जब खुद मोदी ने श्मशान और कब्रस्तान का मसला छेड़ दिया। इसमें कोई संदेह नहीं कि उनकी बात को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया गया है,लेकिन यह सवाल तो उठेगा ही कि उन्होंने ऐसी बात की क्यों है, जिसे तोड़ा-मरोड़ा जा सकता था?कहने वाले कहते हैं कि मोदी चूके नहीं हैं,बल्कि उन्होंने जान-बूझकर इस तरह की बात की है, जिसे तोड़ा-मरोड़ा जा सके और फिर उत्तरप्रदेश में सांप्रदायिकता  के आधार पर ध्रुवीकरण हो,जिसका भाजपा को लाभ मिले और शायद प्रधानमंत्री इसमें सफल भी रहे हैं। जब सूबे में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण होता है,तो उसका सबसे ज्यादा नुकसान सपा को ही होता है। मायावती का दलित वोट बैंक एकदम फिक्स है। उसका90-92फीसदी वोट बीएसपी को हमेशा मिलता है। यह इसलिए कि हिंदुत्व दलितों को आकर्षित नहीं करता। यह वह समुदाय है, जिसने हिंदू धर्म की मान्यताओं के कारण लंबे समय तक दोयम दर्जे का जीवन व्यतीत किया है,पर सपा हिंदुत्व का नाम सुनकर इसलिए बेचैन हो जाती है कि अतिपिछड़ों का उसका प्रमुख वोट बैंक हिंदुत्व की ओर आकर्षित होता है। इस वर्ग की कई जातियां भूतकाल में दलितों की तरह ही उपेक्षित थीं,लेकिन चूंकि उनकी संख्या ज्यादा है और आजाद भारत,खासतौर पर मंडल कमीशन की सिफारिशों के बाद राजनीति एवं प्रशासन में उनकी हिस्सेदारी बढ़ी है। अत:अब उन्हें हिंदुत्व आकर्षित करने लगा है। जब यूपी में जाति की राजनीति होती है तो ये जातियां सपा को ही चुनती हैं,मगर हिंदुत्व की राजनीति जोर पकड़ते ही ये भाजपा की तरफ झुक जाती हैं। सपा के सामने यही खतरा पैदा हो चुका है,इसलिए उसके और भाजपा के बीच कर्कश बयानबाजी शुरू हो चुकी है। उसके एक छुटभैया नेता ने मोदी व अमित शाह को आतंकी तक बता दिया,जिसे सुनकर शर्म भी शर्म से पानी-पानी हो गई होगी। अखिलेश गधों-घोड़ों की बात करने लगे व यह भी शर्मनाक है। सच यह है कि जब चुनावी रेल विकास की पटरी से उतर गई है,तो फिर इसी तरह की बयानबाजी भी होगी ही।
 डॉ. आरके महाजनी (राजनीतिक विश्लेषक)
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