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संपादकीय

हमारा आर्थिक पैमाना शेयर बाजार नहीं

By Raj Express | Publish Date: 3/16/2017 11:06:45 AM
हमारा आर्थिक पैमाना शेयर बाजार नहीं

मंगलवार को भारतीय शेयर बाजारों में एक ऊंची छलांग देखी गई। उस दिन घरेलू और विदेशी फंडों ने जो खरीदारी की, वह ऐतिहासिक थी। विदेशी संस्थागत निवेशकों की खरीदारी तो चार हजार करोड़ को पार कर गई थी। यह स्वाभाविक भी था। उत्तरप्रदेश में भाजपा की भारी-भरकम जीत के बाद देशी-विदेशी निवेशकों में यह भरोसा बढ़ा है कि मोदी सरकार मजबूत हो गई है और अब वह आर्थिक सुधारों के अपने एजेंडे को आगे बढ़ाएगी। शेयर बाजार पर इसी भरोसे की छाप देखी जा रही है, पर दूसरे आर्थिक तथ्य की तरफ या तो हमारा ध्यान गया ही नहीं या फिर उसे पर्याप्त तवज्जो नहीं मिल पाई है। वह तथ्य है, महंगाई के आंकड़े। मंगलवार को ही यह खबर आई थी कि थोक महंगाई पर आधारित मुद्रास्फीति (डब्ल्यूपीआई) के आंकड़ों में फरवरी में भारी बढ़ोतरी हुई है। वैसे तो महंगाई की दरों में थोड़ा-बहुत उतार चढ़ाव होता रहता है। यह दोनों ही दरों यानी डब्ल्यूपीआई और सीपीआई (खुदरा महंगाई दर) में होता है। कभी इन दरों में चौथाई फीसदी या इससे कम-ज्यादा की कमी देखी जाती है, तो कभी इतनी ही बढ़त भी। मगर फरवरी के डब्ल्यूपीआई के आंकड़ों में जो वृद्धि देखी गई है, वह असाधारण है, जो महंगाई में इजाफा होने की ही सूचना दे रही है। अलबत्ता, उसकी ओर ध्यान नहीं गया है। लब्बोलुआब यह है कि फरवरी के महीने में डब्ल्यूपीआई की दर 6.55 फीसदी पर पहुंच गई, जबकि यह दर जनवरी के महीने में 5.25 फीसदी थी। मतलब, एक महीने में इसमें 1.3 फीसदी का इजाफा हुआ है, जो सामान्य नहीं है। अगर हम इसकी तुलना पिछले साल की समान अवधि यानी फरवरी-2016 से करें, तब तो स्थिति और भी मुश्किल लगती है। बीते वर्ष फरवरी के महीने में डब्ल्यूपीआई की दर 3.68 फीसदी थी, जबकि अब 6.55 पर है। मतलब, पिछले एक वर्ष में थोक महंगाई में 2.87 फीसदी का इजाफा हो चुका है। नवंबर-2016 में हुए विमुद्रीकरण के बाद से जहां आम नागरिकों की आमदनी में गिरावट आई है, वहीं महंगाई में इजाफा हुआ है। इस तरह से जनता पर दोहरा बोझ पड़ा है। ऐसे में यह आश्चर्यजनक है कि महंगाई की तरफ किसी का ध्यान भी नहीं गया है। सच तो यह है कि महंगाई में वृद्धि भी नवंबर-2016 के बाद ही हुई है। इस महीने में डब्ल्यूपीआई की दर 3.62 फीसदी पर थी, जो दिसंबर में बढ़कर वहीं पहुंच गई थी, जहां वर्ष-2016 के फरवरी के महीने में थी। यानी, 3.68 फीसदी पर। तब यह भी कहा जा सकता है कि डब्ल्यूपीआई के आंकड़ों में 2.87 फीसदी का जो इजाफा हुआ है, वह बीते दो महीनों में ही हुआ है। सबसे ज्यादा मूल्य वृद्धि ईंधन व ऊर्जा में हुई है। डब्ल्यूपीआई की दर पर इसी का सबसे ज्यादा असर पड़ा है। लेकिन बाजार में जाकर महसूस किया जा सकता है कि खाद्य पदार्थ भी महंगाई की मार से अछूते नहीं हैं। जब पेट्रोल-डीजल आदि के दाम बढ़ते हैं, तो कोई भी सामान महंगाई के असर से अछूता नहीं रहता, क्योंकि जब माल की ढुलाई महंगी हो जाती है, तो उसकी कीमत को उन चीजों के दामों में स्वत: जोड़ दिया जाता है, जो कि यातायात के साधनों के माध्यम से एक से दूसरी जगह भेजी जाती हैं। इसलिए जब ईंधन के दाम बढ़ते हैं, तो सबकुछ महंगा हो जाता है। इसकी एक वजह यह भी है कि महंगाई का अपना एक मनोविज्ञान अलग से होता है। वह यह कि जब एक चीज के दाम बढ़ते हैं, तो दूसरी के बाजार अपने आप बढ़ा देता है। इसके लिए उसे किसी की भी इजाजत की जरूरत नहीं पड़ती। इस कारण उन वस्तुओं के दाम भी बढ़ जाते हैं, जिनका परिवहन महंगा नहीं हुआ होता है। तब भी डब्ल्यूपीआई में असाधारण वृद्धि ऊर्जा व ईंधन की कीमतें बढ़ने के कारण ही हुई है। जनवरी में खाने-पीने के सामानों की कीमतों में 0.56 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई थी, जबकि फरवरी में इन सामग्रियों की कीमतों में 2.69 फीसदी का इजाफा दर्ज किया जा रहा है। यानी, एक महीने के इस छोटे से अंतराल में आम जनता के लिए खाने-पीने का खर्चा कोई तीन फीसदी बढ़ गया है। जिस चीज के लिए उसे पहले सौ रुपए खर्च करने पड़ रहे थे, उसी के लिए अब उसे 103 खर्च करने पड़ रहे हैं। ईंधन पर तो यह खर्चा करीब 20 फीसदी बढ़ गया है। जाहिर है कि महंगाई तो एक बार फिर से बेकाबू होने लगी है एवं आगे इसके बढ़ने की ही आशंका है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम ज्यों-ज्यों बढ़ेंगे, त्यों ही हमारे देश में भी पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस की कीमतें बढ़ जाएंगी, जो कि जनता के बजट पर बुरा असर डालेंगी। लिहाजा, इस समस्या की ओर सरकार को अभी से ध्यान देना होगा। महंगाई पर नियंत्रण के लिए वह भारतीय रिजर्व बैंक पर न तो निर्भर रह सकती है और न ही उसे ऐसा करना भी चाहिए। यह इसलिए कि वह ब्याज दरों को यथावत रखकर या बढ़ाकर बाजार में सिर्फ नकदी का प्रवाह ही कम कर सकता है। इसके आगे वह कुछ भी नहीं कर सकता। इसके आगे का काम सरकार का है, जो तभी होगा, जब उसका ध्यान शेयर बाजार पर कम, तो महंगाई की दरों पर ज्यादा होगा। भारतीय अर्थव्यवस्था का पैमाना शेयर बाजार नहीं है, क्योंकि उससे एक फीसदी से कम लोग ही जुड़े हैं।

डॉ. आरके महाजनी (वरिष्ठ स्तंभकार और लेखक)

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