• 14 साल की लड़की को बंधक बना 1000 लोगों से बनवाया शारीरिक संबंध
  • प्रशांत भूषण को पीटने वाले को बीजेपी ने बनाया प्रवक्ता
  • राजस्थान: लैंडिंग से पहले बाड़मेर में क्रैश हुआ सुखोई, दोनों पायलट सुरक्षित
  • 'लालू परिवार' हुआ रघुवंश से नाराज, राबड़ी ने बयान को बोला फूहड़
  • गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र को पांचवां प्रांत घोषित करने की तैयारी में पाकिस्तान
  • सिद्धू को मिल सकता है कांग्रेस से झटका, अमरिंदर नहीं चाहते कोई डिप्टी CM
  • लोकसभा में भाजपा सांसदों ने किया पीएम मोदी का स्वागत, लगे 'जयश्री राम' के नारे
  • पंजाब और गोवा विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद आम आदमी पार्टी में फूट के आसार!

होम |

संपादकीय

शालीनता से स्वीकार करें हार

By Raj Express | Publish Date: 3/16/2017 11:11:01 AM
शालीनता से स्वीकार करें हार
उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी अपनी करारी हार को पचा नहीं पा रही हैं। अखिलेश यादव तो इस हार को शालीनता पूर्वक स्वीकार करने की बजाय कह रहे हैं कि चुनाव में वोट समझाने से नहीं, बरगलाने से मिलते हैं। वहीं, मायावती ईवीएम मशीनों में गड़बड़ी को अपनी पराजय की वजह बता रही हैं। कांग्रेस भी मायावती के इस राग में शामिल हो गई है। लोकतंत्र में उम्मीद की जाती है कि नेता जनादेश का सम्मान करते हुए अपनी पराजय को विनम्रता से स्वीकार करके सियासी पथ पर आगे की भूमिका के लिए अपना कदम बढ़ाएंगे। लेकिन मौजूदा राजनीति में ऐसा नहीं हो रहा है। अखिलेश हों या गुलाम नबी आजाद या राज बब्बर या फिर मायावती, पराजय के बाद की उनकी ऐसी प्रतिक्रियाएं उनकी हताशा और  राजनीतिक कमियों को ही जाहिर करती हैं। उत्तरप्रदेश में 1993 में जब पहली बार समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन की सरकार बनी, तो उसने सूबे के पिछड़ों व दलितों के बीच नए सवेरे का संकेत दिया था। उसके पहले तक सूबे में ब्राह्मणों, दलितों व मुसलमानों के समीकरण से चलती रही कांग्रेसी राजनीति को इस नए समीकरण ने धता बता दिया था। उस चुनाव ने दलितों और पिछड़ों के गौरवबोध को बढ़ाने में मदद तो दी थी, मगर जिस कीमत पर यह बोध बढ़ा था, वह महंगा साबित हुआ। पांच हजार साल से चली आ रही सामाजिक संरचना और आपसी भाईचारे को उसने ग्रामीण स्तर पर बर्बाद कर दिया। स्थानीय स्तर पर सामाजिक विद्वेष का जो भाव फैलना शुरू हुआ, वह अपने अतिवाद के स्तर पर जा पहुंचा। गौरतलब है कि इसी दौरान बसपा और सपा में विवाद हुआ। जून-1995 के गेस्ट हाउस कांड ने सामाजिक ढांचे के द्वारा राजनीतिक बदलाव लाने की कोशिशों को जोरदार झटका दिया। इसके बाद से देखते ही देखते पूरी राजनीति सिर्फ और सिर्फ जातियों के इर्द-गिर्द केंद्रित होती चली गई। इसका मतलब यह नहीं है कि पहले जातियां और जाति केंद्रित राजनीति नहीं होती थी। लेकिन पिछड़े-दलित गठजोड़ के उभार ने  उनके बीच दुश्मनी की हद तक लड़ाई बढ़ाकर जातीय राजनीति को गहरे तक मथकर रख दिया। इसका असर यह हुआ कि अगड़े-पिछड़े-दलित की लड़ाई के बीच कमजोर मानी जाती रही जातियों के बीच भी नए तरह का वर्ग संघर्ष पैदा हुआ। समाजवादी राजनीति के वर्चस्व के दौर में यादव बिरादरी के साथ ही खाए-अघाए मुस्लिम तबके के लोग खुद को राज्य का खुद मुख्तार मानने लगे, तो बहुजन समाज पार्टी के सत्तासीन होने के दौर में वर्ग का यह ढांचा शिफ्ट होकर दलित जातियों व उनके नए-नवेले खाए-अघाए वर्ग की तरफ पहुंचता रहा। गेस्ट हाउस कांड के चलते पिछड़े व दलितों में उभरे इन वर्गो के निशाने पर अपनी-अपनी सत्ताओं के दौर में दूसरा वर्ग रहा। वहीं, शहरी बौद्धिक समाज इसे सशक्तीकरण मानता रहा। लेकिन इसके जरिए पांच हजार साल पुराने सामाजिक ढांचे को जो नुकसान पहुंचा, उसका अंदाज लगाने में यह बौद्धिक तबका पूरी तरह नाकाम रहा या फिर वह इसे जान-बूझकर नकारता रहा। जबकि देश की करीब 72 फीसदी आबादी को उसी पांच हजार साल पुराने ढांचे के ही भीतर रहना था। शिक्षा, संचार तकनीक के बढ़ते प्रभाव, और तकनीकी विस्तार ने जातियों के पारंपरिक खांचों की कठोरता को जब कम करना भी शुरू कर दिया, तब यह सहज सवाल उठने लगा कि फिर नए तरह का यह वर्ग संघर्ष क्यों? इसी प्रश्न ने गैर यादव पिछड़ी जातियों को  गोलबंद किया, तो मुसलमानों के प्रगतिशील तबके ने सांप्रदायिकता के डर को तक झुठलाना शुरू कर दिया। यही हालत दलित समुदाय के लोगों की भी रही। सत्ता के इर्द-गिर्द जुटकर मलाई खाते रहे वर्गो से उन्हीं की जातियों के बाकी लोगों का मोहभंग होना शुरू हुआ। समाजवादी सत्ता ने परिवारवाद, कुनबावाद का जो गंदा खेल खेला और उसके जरिए भ्रष्टाचार की विषबेल फैलाई, उससे पिछड़े समुदाय की गैर यादव जातियों को निराश ही नहीं किया, बल्कि गुस्से से भी भर दिया। यह गुस्सा कहीं भी दिख जाता था। दूसरी तरफ, सत्ता से बाहर रहने के दौरान बहुजन समाज पार्टी की तरफ से कभी कोई जनांदोलन नहीं चलाया गया। आंदोलन सिर्फ समर्थकों के अधिकारों के लिए ही नहीं चलाए जाते, बल्कि सत्ताओं के विरुद्ध भी चलाए जाते हैं। मायावती इस तथ्य को समझने में नाकाम रही हैं। उनकी जीवनशैली ने उन्हें अपने ही लोगों के बीच में खास वर्ग की तरह ही स्थापित किया। इसने दूसरे लोगों में नकारात्मकता का बोध भरने में तो बड़ी भूमिका निभाई ही, मायावती की अपने समर्थकों -कार्यकर्ताओं से भी दूरियां बढ़ती चली गईं। यही दूरी उनकी हार की सबसे बड़ी वजह है। रही बात अगड़ी जातियों की तो वे मौजूदा जाति आधारित राजनीतिक में खुद को कमजोर व अल्पसंख्यक मानने लगीं। अत: उनका गोलबंद होना लाजमी था। भाजपा के रणनीतिकारों ने इस तथ्य को भली प्रकार समझा। फिर, अगड़े वर्ग के सामने भाजपा के पास जाने के अलावा दूसरा विकल्प भी नहीं था, जिसका उसे लाभ मिला। वहीं, उसने गैर यादव पिछड़ी जातियों को भी साधा, गरीब मुस्लिम महिलाओं में उज्ज्वला योजना ने मोदी की साख बढ़ाने में मदद की, जबकि तीन तलाक पर पढ़ी-लिखी मुस्लिम महिलाओं ने भी भाजपा का साथ दिया। यानी, गैर यादव पिछड़ी जातियों, गैर जाटव दलित, पढ़ी-लिखी मुस्लिम महिलाओं के साथ ही अगड़ी जातियों के सहारे भाजपा ने जो कलाइडोस्कोप तैयार किया, उसमें राजनीतिक दूरबीन से छनकर जो नजारा सामने आया, वह उत्तरप्रदेश की जीत का नया मुहावरा बना और राजनीति का नया व्याकरण।
हमने जिस लोकतांत्रिक मॉडल को जहां से स्वीकार किया है, वहां जाति व वर्ग की बजाय मुद्दों पर आधारित समर्थन और विरोध की परिपाटी रही है। ब्रिटेन हो या अमेरिका या फिर दूसरे पश्चिमी लोकतांत्रिक देश, वहां जाति-समुदाय की बजाय राजनीतिक दलों के कार्यक्रम और मुद्दों पर अपने प्रतिनिधियों को चुनने की परंपरा रही है। दुर्भाग्यवश, अपने महान लोकतंत्र में आजादी के बाद से ही यह तत्व नदारद रहा। भाजपा की उत्तरप्रदेश में जीत भी जाति एवं वर्ग के आपसी संघर्ष के साथ ही उनकी अंदरूनी खींचतान से उभरे नए समीकरण की ही जीत है। बहरहाल, इस समीकरण ने एक उम्मीद भी जगाई है। वर्ग और जाति से बाहर झांकने की यह उम्मीद भारतीय लोकतंत्र के लिए एक नया अनुभव है। मगर जाति तोड़ने या वर्ग को नकारने की बात करने वाले दल भी राजनीतिक लाभ के लिए इससे बचने का साहस नहीं दिखा पाते। भाजपा ने इससे अलग झांकने का साहस दिखाया और उसकी जीत इसी साहस की जीत है। दूसरी ओर मायावती व अखिलेश अपने पुराने राजनीतिक समीकरणों में उलझे रहे। अब वे शालीनता से अपनी हार स्वीकार करें और आगे बढ़ें।
उमेश चतुर्वेदी (टेलीविजन पत्रकार और स्तंभकार) 
Contact us: contact@rajexpress.com
Copyright © 2016 RajExpress.com. All Rights Reserved.
Designed by : 4C Plus