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संपादकीय

न्यायिक नियुक्ति का रास्ता साफ

By Raj Express | Publish Date: 3/16/2017 11:12:40 AM
न्यायिक नियुक्ति का रास्ता साफ
अब सर्वोच्च और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति का रास्ता आसान हो गया है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति जेएस खेहर की अध्यक्षता वाले कॉलेजियम ने वह मेमोरेंडम ऑफ प्रोसिजर (एमओपी) स्वीकार कर लिया है, जो सरकार ने उनके पास विचार के लिए भेजा था। बताते चलें कि  अक्टूबर-2015 में सुप्रीम कोर्ट की जिस संविधान पीठ ने सरकार द्वारा बनाए गए न्यायिक नियुक्ति आयोग को असंवैधानिक बताया था, उसके अध्यक्ष भी न्यायमूर्ति जेएस खेहर ही थे। सरकार को यह न्यायिक फैसला अखरा तो बहुत था, लेकिन न्यायपालिका के सामने वह लाचार पड़ गई थी। इसके बाद इस संविधान पीठ ने इस पर भी विचार-विमर्श किया था कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्टो में न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया किस तरह पारदर्शी बने और इस काम में सरकार की दखलंदाजी भी न हो। इस विचार विमर्श के बाद ही इसी संविधान पीठ ने सरकार को निर्देश दिया था कि वह न्यायाधीशों की नियुक्ति हेतु एक एमओपी बनाकर पेश करे, जिस पर विचार होगा कि उसे स्वीकार किया जाए या नहीं। यह एमओपी करीब एक वर्ष पहले कॉलेजियम के सामने पेश कर दिया गया था, लेकिन उसके कुछ प्रावधानों पर न्यायपालिका व सरकार में मतभेद थे। सरकार चाहती थी कि न्यायपालिका सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्टो के लिए सचिव (सेक्रेटिएट्स) जैसे पद सृजित करे, सभी न्यायालयों के लिए एक-एक पद, जिसके लिए न्यायपालिका राजी नहीं थी। वह यह भी चाहती थी कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए एक न्यूनतम पात्रता निर्धारित की जाए। इसके साथ ही कुछ और विषय भी ऐसे थे, जिन्हें लेकर न्यायपालिका और सरकार में सहमति नहीं बन पा रही थी। लेकिन अब कॉलेजियम ने एमओपी को स्वीकार कर लिया है। न्यायमूर्ति जेएस खेहर की अध्यक्षता वाले इस कॉलेजियम में न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति मदन बी. लोकुर, न्यायमूर्ति जे. चेलामेश्वर और न्यायमूर्ति रंजन गोगोई शामिल हैं, जिसने एमओपी को स्वीकार किया है। गौरतलब है कि इस मामले में झुकना न्यायपालिका को ही पड़ा है, क्योंकि उसने सरकार की लगभग सभी शर्तो को स्वीकार कर लिया है। इसका कारण यह है कि जो तनातनी चल रही थी, उसके कारण सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्टो में न्यायाधीशों की नियुक्ति बहुत कम हो पा रही थी, जिससे न्यायमूर्ति जेएस खेहर बहुत परेशान रहते थे और उनके पूर्ववर्ती मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर तो अपनी तकलीफ को सार्वजनिक तौर पर भी बयां कर देते थे। अब जबकि एमओपी को स्वीकार कर लिया गया है, जिसका सीधा अर्थ यह है कि न्यायिक नियुक्तियों में कॉलेजियम की मदद करने के लिए उसी के समानांतर एक समिति और बन जाएगी, तब उम्मीद है कि सरकार भी अब न्यायपालिका का सहयोग करेगी। वह एमओपी से केवल इसलिए असहमत नहीं होगी कि सुप्रीम कोर्ट ने उसकी बहुत सी बातों को माना नहीं। इसीलिए उम्मीद यह भी है कि अब न्यायपालिका में न्यायाधीशों की कमी भी जल्दी दूर होगी।
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