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संपादकीय

बनी रहेगी इरोम की प्रासंगिकता...

By Raj Express | Publish Date: 2/22/2017 1:59:13 PM
बनी रहेगी इरोम की प्रासंगिकता...

 मणिपुर की लौह महिला के तौर पर विख्यात इरोम शर्मिला चानू ने इंफाल जिले की थोइबाल सीट से पर्चा दाखिल कर राजनीति की ही औपचारिक शुरुआत नहीं की है,बल्कि राज्य के मुख्यमंत्री और कांग्रेस के ताकतवर नेता इबोबी सिंह को उनके ही गढ़ में चुनौती भी दी है। 11मार्च को आने वाले चुनाव नतीजों से पता चलेगा कि इरोम विधानसभा पहुंच पाएंगी या नहीं,लेकिन यह स्पष्ट है कि वे पीछे नहीं हटने जा रहीं। ऐसा मानने की प्रमुख वजह है,इरोम का जीवट भरा व्यक्तित्व,जिसने16साल तक सशस्त्र सुरक्षा बल विशेषाधिकार कानून(अफ्सपा)के विरुद्ध भूख हड़ताल की। इरोम का अपना इतिहास है,जो कि अपने मुकाम तक पहुंचने के लिए हर मुमकिन हद तक जाने को तैयार रहता है।

इस पर बहस हो सकती है कि इरोम ने अफ्सपा का विरोध करके सही किया या गलत,मगर यह भी सच है कि उनकी यातनापूर्ण लड़ाई ने इरोम को राज्यव्यापी समर्थन और राष्ट्रव्यापी सम्मान और शोहरत दिलाई है। लेकिन भूख हड़ताल खत्म करने और चुनाव लड़ने के उनके फैसले ने कम से कम राज्य के बीच उनका समर्थन और सम्मान जरूर घटा दिया है। ऐसे माहौल में इरोम के लिए चुनावी समर को पार कर पाना आसान नहीं लगता। फिर भी यह निश्चित है कि अगर वे चुनाव जीतती हैं,इबोबी सिंह को मात देने में कामयाब रहती हैं, तो इतिहास रच देंगी।
फिर अपनी राष्ट्रव्यापी छवि के सहारे कम से कम मणिपुर में विपक्षी सियासत की वे केंद्रीय धुरी बन जाएंगी। राष्ट्रीय मीडिया का भी उन पर खासा ध्यान है, लिहाजा इस जीत के सहारे वे पूर्वोत्तर में भाजपा विरोधी आवाज बनकर उभर सकती हैं। बेशक इरोम ने अपनी पार्टी‘पीपुल्स रिसर्जेस एंड जस्टिस एलाएंस’बना ली है। पर उनके पास मौजूदा माहौल में पार्टी को चलाने लायक संसाधन नहीं हैं। इरोम की कुल जमा पूंजी उनका संघर्षमय इतिहास है। मानवाधिकार के पक्ष और अन्याय के खिलाफ उनका जीवट भरा संघर्ष उनकी सबसे बड़ी थाती है। संघर्षो वाली दुनिया में यह थाती काम आ सकती है,खबरों की केंद्र भी बन सकती है,पर मौजूदा सत्ता केंद्रित राजनीति की दौड़ में यह पूंजी लंबे वक्त तक बने रहने में सहायक नहीं हो सकती। महज तीन साल में राजनीति का केंद्रीय चेहरा बन चुके अरविंद केजरीवाल इरोम की राजनीति व उनकी पार्टी की इस सीमा को जानते हैं। सो,उन्हें50हजार रुपए की मदद का केजरीवाल का ऐलान सहयोग करना भर नहीं,बल्कि उत्तर पूर्व में इरोम के तौर पर अपने लिए एक ऐसे चेहरे का साथ हासिल करना है,जिसके सहारे वहां वे अपनी राजनीति कर सकते हैं।
‘आप’सांसद भगवंत मान ने इरोम को अपना एक महीने का वेतन देने की घोषणा करके एक तरह से केजरीवाल की ही बात को आगे बढ़ाया है। केजरीवाल के पास इरोम को साधने के लिए बहाना भी है। वह यह कि इरोम भी उनकी ही तरह मानवाधिकारों की बहाली और अन्याय के खिलाफ लड़ाई लड़ रही हैं। लेकिन यह मान लेना अभी जल्दबाजी होगी कि इरोम एक झटके में ही केजरीवाल के साथ चली जाएंगी। अगर वे जीत जाती हैं,तो उनकी राह अलग होगी। तब इसकी संभावना ज्यादा होगी कि उनकी पार्टी का केजरीवाल समेत समान विचारधारा और लक्ष्य वाली पार्टियों के साथ गठबंधन हो जाए। तब वे राजनीतिक राह पर तेजी से आगे बढ़ जाएंगी। तब उनका अपना अलग और साफ सियासी वजूद होगा। लेकिन अगर वे हार गईं तो सबके निशाने पर होंगी। ऐसी हालत में वे लोग भी उनके साथ खड़े होने से कतराएंगे,जो उनके राजनीति में जाने के पहले तक उनके समर्थक थे। राजनीति की यह विडंबना ही है कि उसके बिना कार्य-व्यवस्था नहीं चलती,लेकिन किसी राजनीतिक व्यक्ति से न्यूनतम निष्पक्षता की भी उम्मीद नहीं की जाती। इसके लिए सबसे ज्यादा राजनेता ही जिम्मेदार माने जाने चाहिए। चाहे जिस विधा में किसी भी शख्सियत की कितनी भी उपलब्धियां क्यों न हों,पर वो जैसे ही दलीय राजनीति के चौखट्टे के भीतर कदम रखता है,उसकी पूरी निष्पक्षता व सारी साख एक किनारे रख दी जाती है और उस शख्सियत का भी मूल्यांकन राजनीतिक चश्मे से ही किया जाने लगता है। भूख हड़ताल तोड़ने के बाद इरोम से मणिपुरी समाज जैसा व्यवहार कर रहा है, उसके पीछे यही अवधारणा काम कर रही है। इसलिए यदि उन्हें चुनावी हार मिलती है,तो उनकी मणिपुरी जनता के बीच प्रासंगिकता घटेगी।
फिर,उन्होंने चुनाव बाद शादी करने का भी ऐलान कर रखा है,इसलिए भी स्थानीय लोग उनसे खुश नहीं हैं। चुनावी हार के बाद इस वजह से भी वे स्थानीय लोगों के निशाने पर आ सकती हैं। ऐसी हालत में उनके पास एक ही विकल्प हो सकता है कि वे आम आदमी पार्टी का दामन थाम लें। इसके बाद उन्हें अपने साथ खड़े होने व राष्ट्रीय स्तर पर कवच बन सकने वाली एक ताकत मिल जाएगी,जिससे उन्हें अपने स्थानीय राजनीतिक विरोधियों से मुकाबला करना सरल हो जाएगा। इससे फायदा आप को भी होगा। उत्तर पूर्व की उसकी राजनीतिक राह की इरोम बड़ी और गंभीर सहयोगी बन सकेंगी।
भूख हड़ताल तोड़ने के बाद स्थानीय समुदाय की आलोचनाओं के घेरे में आईं इरोम ने कहा था कि अफ्सपा के विरुद्ध उनकी लड़ाई खत्म नहीं हुई है, बल्कि उन्होंने सिर्फ रणनीति बदली है। तब यदि उन्हें जीत मिलती है तो इसके दो संदेश होंगे। पहला यह कि मणिपुरी लोगों ने उन्हें माफ कर दिया है। दूसरा संदेश यह होगा कि मणिपुर ने अफ्सपा को लेकर इरोम की नई रणनीति को स्वीकार कर लिया है। जीतने के बाद इरोम के पास संवैधानिक अधिकार व राजनीतिक ताकत भी होगी। इसकी वजह से उनका संघर्ष आगे बढ़ जाएगा और नए उत्साह से वे अफ्सपा के खिलाफ मोर्चा खोल देंगी। चूंकि तब वे एक सीमावर्ती राज्य की विधायक भी होंगी। लिहाजा उनकी आवाज को अब की तुलना में तब कहीं ज्यादा अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां मिल सकेंगी। इससे केंद्रीय व्यवस्था की चुनौतियां बढ़ जाएंगी।
भारत में मानवाधिकारों की बात करने वालों के बारे में माना जाता है कि उनके पास अकूत संपत्ति होती है। मगर इरोम ने पर्चा दाखिल करते वक्त अपनी संपत्ति का जो हलफनामा पेश किया है,उसमें उन्होंने सिर्फ दो लाख साठ हजार की संपत्ति अपने पास होने की बात स्वीकार की है। फिर वे20किलोमीटर साइकल चलाकर पर्चा दाखिल करने पहुंचीं। इसके कारण उन लोगों का मुंह बंद हुआ, जो कहते थे कि अनशन के नाम पर उन्होंने दौलत जुटा ली है। उनकी छवि साफ हुई,जिसका उन्हें लाभ मिल सकता है। इरोम पूरब की ऐसी योद्धा हैं,जिन्होंने कभी हार नहीं मानी। इसलिए यह मानने से गुरेज नहीं होना चाहिए कि चाहे उन्हें चुनावी जीत मिले या हार,मगर अपनी संघर्षशील शख्सियत से वे अपनी प्रासंगिकता बनाए रखेंगी। जीत के बाद उनका महत्व कुछ ज्यादा ही बढ़ सकता है।
उमेश चतुर्वेदी (टेलीविजन पत्रकार और स्तंभकार)
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