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संपादकीय

जल्दी से जल्दी हो कांग्रेस में बदलाव

By Raj Express | Publish Date: 3/17/2017 11:16:39 AM
जल्दी से जल्दी हो कांग्रेस में बदलाव

पांच राज्यों के चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की सबसे पहली प्रतिक्रिया यह रही कि अब पार्टी के संगठन में ढांचागत बदलाव किया जाएगा। देश के वे लोग भी, जिनकी लोकतंत्र में आस्था है और जो इस समय या तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थक हैं या फिर भाजपा के, यह नहीं चाहेंगे कि कांग्रेस इतनी कमजोर हो जाए कि वह विपक्ष की भूमिका निभाने लायक न रहे। संसदीय लोकतंत्र में जितनी प्रभावी भूमिका विपक्ष की होती है, उतनी सत्तापक्ष की भी। इन दोनों की भूमिका एक गाड़ी के दो पहियों जैसी होती है और अगर उनमें से एक भी कमजोर हो जाए तो फिर गाड़ी चल नहीं पाती। लोकतंत्र की गाड़ी तभी ठीक से चलेगी, जब भाजपा जितनी मजबूत होती दिख रही है, कांग्रेस भी स्वयं को उतना ही मजबूत करे। वस्तुत: विपक्ष की कारगर भूमिका निभाने की उम्मीद केवल कांग्रेस से ही है। किसी अन्य दल से यह आशा की ही नहीं जा सकती। दरअसल, क्षेत्रीय पार्टियां केवल स्थानीय क्षत्रप हैं। अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी, मायावती की बहुजन समाज पार्टी या नीतीश कुमार का जनता दल-यू या लालू प्रसाद यादव का राष्ट्रीय जनता दल या उड़ीसा का बीजू जनता दल या फिर शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस, ये दल राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की भूमिका कभी नहीं निभा सकते। बिलकुल यही बात ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पर भी लागू होती है। तमिलनाडु के दोनों बड़े राजनीतिक दलों यानी एआईएडीएमके व डीएमके ने कभी राष्ट्रीय राजनीति में रुचि ली हो, ऐसा याद नहीं आता। ये दोनों ही दल केवल अपने निजी हित देखते हैं, ज्यादा से ज्यादा राज्य के हित और इसीलिए जो भी दल तमिलनाडु की सत्ता में होता है, वह केंद्र की सरकार के साथ बढ़िया रिश्ते बना लेता है। जम्मू कश्मीर के दोनों ही दल यानी पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस की रुचि भी केवल अपने ही राज्य तक है। हालांकि, वामपंथी पार्टियों की मौजूदगी कहीं कम व कहीं ज्यादा, पूरे देश में है। मगर पहली बात तो यह है कि ये दल बहुत रूढ़ीवादी हैं और दूसरी यह कि ये आपस में एकजुट नहीं हैं, इसलिए इनसे भी कोई उम्मीद नहीं की जा सकती। निचोड़ यह है कि संसद में हंगामा खड़ा करना अलग बात है, सड़क पर राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की भूमिका निभाने की क्षमता इन दलों में से एक के भी पास नहीं है। अगर ये कांग्रेस को शामिल करके एक मोर्चा भी बना लें तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि ये आपस में ही लड़ेंगे नहीं। जब देश में गैर-कांग्रेसवाद की राजनीति चल रही थी, तो भी ये आपस में लड़ जाते थे, जबकि अब गैर-भाजपावाद की राजनीति यदि शुरू होती है तो उसमें भी ये आपस में लड़ेंगे। इस सूरत में विपक्ष की प्रभावी भूमिका अगर कोई पार्टी निभा सकती है तो वह कांग्रेस ही है। वह चाहे तो सभी राजनीतिक दलों का एक गठजोड़ बनाकर आगे बढ़े, चाहे तो अकेले ही चुनौती को स्वीकार करे, पर विपक्ष की भूमिका में उसे ही आना होगा। जाहिर है कि कांग्रेस जब तक स्वयं को सहेजती, संवारती नहीं, तब तक वह कुछ भी नहीं कर पाएगी। इसके लिए सबसे पहले उसे मानना यह पड़ेगा कि भारत में लोकतंत्र है, जिसमें चुनाव होते ही होते हैं और इनमें हार-जीत चलती रहती है। जब तक वह इस तथ्य को मानेगी नहीं, दिल से स्वीकार नहीं करेगी, तब तक चुनावी पराजयों के सदमे से मुक्त नहीं हो सकती एवं यदि वह इस सदमें से मुक्त नहीं होगी तो कुछ नहीं कर पाएगी। दुनिया का अनुभव यही है कि सदमाग्रस्त व्यक्ति या संगठन कभी कुछ भी हासिल नहीं कर पाता है। जो गिर कर बार-बार उठ खड़े होने की क्षमता रखते हैं, दुनिया में वही लोग कुछ कर पाते हैं। कांग्रेस को एक मोर्चे पर और भी सुधार करना होगा। पार्टी में शीर्ष पर वही चेहरे हैं, जिन्हें देशवासी पिछले तीन-चार दशक से देखते चले आ रहे हैं। आम जनता ने इन चेहरों को सत्ता में देखा और उससे बाहर भी। इनमें से बहुतों ने ऐसा कोई काम नहीं किया, जिसे देखकर जनता एक बार फिर से इन पर भरोसा करे। जब कांग्रेस सत्ता में थी, तो इन्हीं में से कई चेहरे सामंतों की तरह व्यवहार करते देखे जाते थे, जिसे नागरिक अभी भूल नहीं पाए हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि किसी भी दल को अनुभवी नेताओं की जरूरत होती ही है। लेकिन सामने सिर्फ और सिर्फ यही लोग दिखेंगे, तो कांग्रेस कुछ नहीं कर पाएगी। ऐसे में उसे नए लोगों को सामने लाना चाहिए। ऐसे लोगों को, जिनके चेहरे देखकर आम जनता को कोयला की खदानें याद न आएं, न टूजी और राष्ट्रमंडल खेल। कांग्रेस को धर्मनिरपेक्षता पर भी अपना रवैया बदलना होगा। इसका मतलब यह नहीं है कि वह भी हिंदुत्ववादी हो जाए, लेकिन एक समुदाय विशेष की गलतियों को सही ठहराने की आदत उसे छोड़नी होगी व गलतियों के लिए उसकी आलोचना भी करनी होगी। यह काम भी बिना शर्त किया जाना चाहिए, न कि संतुलन बनाकर, जैसा कि कांग्रेस करती रही है कि जब मुस्लिम सांप्रदायिकता पर कुछ कहने का मौका आया, तो उसने हिंदू सांप्रदायिकता को भी लपेट लिया। जो भी हो, मगर जब राहुल गांधी अपनी पार्टी को बदलने की बात करने लगे हैं, तो उम्मीद है कि वे उसकी दिशा को जरूर दुरुस्त कर दिखाएंगे।

हरीश कुमार ‘शम्स’ (राजनीतिक विश्लेषक)  

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