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संपादकीय

कैप्टन के सामने चुनौतियां अनेक

By Raj Express | Publish Date: 3/17/2017 11:21:27 AM
कैप्टन के सामने चुनौतियां अनेक

 जनाकांक्षाओं का बोझ अगर राजनीतिक दलों को जिम्मेदारी के बोध से न भर सके तो सियासत ही नहीं, लोक अपेक्षाएं भी कमजोर हो जाती हैं। जवाबदेही और जिम्मेदारी के बोध से रहित राजनीतिक दल सिर्फ लोक अपेक्षाओं को ही प्रभावित नहीं करते, अंतत: लोकतंत्र और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर भी नकारात्मक असर डालते हैं। इस लिहाज से देखें, तो पंजाब के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के सामने चुनौतियां कुछ ज्यादा हैं। उन्होंने पंजाब की जनता को बदलाव का जो सपना दिखाया, उस सपने की डोर के सहारे ही ठीक 10 साल बाद उन्होंने अपने दल को सत्ता की दहलीज तक पहुंचाया है। पंजाब के लोगों के सपनों को कांग्रेस के जरिए तब नया वितान मिला है, जब पूरे देश में तकरीबन कांग्रेस की हालत पस्त है। इस आधार पर भी देखें, तो पंजाब सरकार के सामने चुनौतियों का एक पहाड़ है। इस राज्य में 10 वर्ष से सत्ता पर काबिज अकाली-भाजपा गठबंधन के खिलाफ अगर जनभावना उभरी तो उसकी एक वजह सत्ता विरोधी रुझान तो रहा ही, पंजाब में खास कारण अकाली नेताओं का भ्रष्टाचार भी रहा। जिस पंजाब की धरती अपनी हरियाली, अपनी खेती की उपज और अपने वीर बलिदानियों के लिए याद की जाती है, वह धरती नशाखोरों, भ्रष्टाचारियों के लिए जानी जाने लगी। पंजाब की खेती बेशक अब भी अपनी रिकॉर्ड पैदावार के लिए जानी जा रही है, लेकिन सच यह भी है कि खेती के नए औजार और उसमें इस्तेमाल हो रहे रासायनिक खाद व कीटनाशक उस पर भारी पड़ रहे हैं। हर साल पैदावार बढ़ाने के लिए हर साल की बनिस्बत और ज्यादा खाद, कीटनाशक और पानी की मांग बढ़ती जा रही है। आधुनिक कही जाने वाली इस खेती के कुचक्र में आम किसान फंसता जा रहा है एवं वह कर्जदार होता जा रहा है। पंजाब में बढ़ती ड्रग्स की खपत और आधुनिक खेती के कुचक्र में फंसे किसान को कर्ज से छुटकारा दिलाना कैप्टन अमरिंदर सरकार की सबसे बड़ी चुनौती होने जा रही है। कैप्टन को भ्रष्टाचार से तो निपटना ही होगा, ड्रग्स तस्करी से राज्य को मुक्ति दिलाने के साथ ही साथ वहां के किसानों की कर्ज माफी भी करनी होगी। लेकिन पंजाब की आर्थिक हालत खराब है। केंद्र में कांग्रेस की बजाय भाजपा की सरकार है। अत: उनके लिए राज्य को आर्थिक मोर्चे पर मजबूत बनाए रखना कठिन होगा। पंजाब चूंकि सीमावर्ती राज्य है, पाकिस्तान की नापाक निगाह उस पर लगातार बनी रहती है, सो कैप्टन सरकार की अनदेखी केंद्र सरकार नहीं कर सकती। फिर भी कैप्टन को अपनी पार्टी की लाइन के इतर जाकर केंद्र सरकार से मधुर संबंध कायम करने होंगे। यानी, एक तरफ उन्हें अपने राज्य के लोगों की अपेक्षाएं पूरी करने के लिए जूझना होगा, तो वहीं अपनी पार्टी को भी साधकर रखना होगा। इसके साथ ही वे केंद्र सरकार को भी नाराज नहीं कर सकते। तभी जाकर वे अपनी अंतिम राजनीतिक पारी को यादगार बना पाएंगे। देखना है कि वे अपनी इन चुनौतियों से किस तरह से निपटते हैं।

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