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संपादकीय

जीवों पर दया सबसे बड़ा धर्म

By Raj Express | Publish Date: 3/17/2017 11:26:48 AM
जीवों पर दया सबसे बड़ा धर्म
राजा भोज स्वयं तो बड़े विद्वान थे ही, वे अन्य विद्वानों का भी खूब सम्मान करते थे। एक बार उनकी सभा में बाहर के विद्वान आमंत्रित किए गए। राजा भोज ने उन सभी से आग्रह किया-आप सभी विद्वान अपने जीवन में घटित कोई आदर्श घटना एक-एक करके सुनाएं। बस फिर क्या था, सभी विद्वानजनों ने अपनी-अपनी आपबीती भोज को कह सुनाई। अंत में एक दीन-हीन सा दिखने वाला विद्वान अपने आसन से उठा और बोला-मैं क्या बताऊं महाराज! वास्तव में तो मैं आपकी इस विद्वत सभा में आने का तक अधिकारी नहीं था, परंतु मेरी पत्नी का बड़ा आग्रह था, इसलिए चला आया। यात्रा का ध्यान करते हुए मेरी पत्नी ने एक पोटली में मेरे लिए चार रोटियां बांध दी थीं। रास्ते में चलते-चलते भूख लगने पर जब मैं एक जगह खाना खाने के लिए बैठा, तभी एक कुतिया मेरे पास आकर बैठ गई। उसके हाव-भाव से साफ लग रहा था कि वह भूखी थी। मुझे उस पर दया आ गई और मैंने उसके सामने एक रोटी रख दी। वह उसे वह तुरंत खा गई। इसके बाद मैंने जैसे ही खाने के लिए रोटियों को छुआ, वह फिर रोटी मिलने की इच्छा से अपनी दुम हिलाने लगी। मुझे लगा, जैसे वह कह रही है कि बाकी रोटियां भी मुझे ही दे दो। मैंने बची हुई बाकी तीन रोटियां भी उसके आगे डाल दीं। बस महाराज, यही है मेरे जीवन में हाल में घटित सत्य और आदर्श घटना। स्वयं भूखा रहकर एक भूखे जीव को मैंने तृप्त किया है और ऐसा करने से जो सुखद अहसास मुझे हुआ, वह मैं जीवन भर नहीं भूलूंगा। राजा भोज इस वृतांत को सुनकर भाव-विभोर हो गए। उस विद्वान को उन्होंने मूल्यवान वस्तुएं भेंट कर विदा करते हुए कहा-यही है जीवन का आदर्श।
राधा नाचीज
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