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संपादकीय

राजनीति में युवाओं की भूमिका का प्रश्न

By Raj Express | Publish Date: 3/18/2017 12:47:07 PM
राजनीति में युवाओं की भूमिका का प्रश्न

यह तथ्य हमारे लगभग सभी नेता दोहराते हैं कि हम एक युवा देश हैं और जब वे ऐसा कहते हैं, तो वह कुल मिलाकर देश की युवा आबादी की ही बात कर रहे होते हैं। उनकी यह बात सच भी होती है। एक मोटा अनुमान यह है कि हमारे देश में करीब 52 करोड़ युवा मतदाता हैं। इनकी उम्र 18 से 35 वर्ष के बीच है। अगर इस संख्या में 36 से 45 वर्ष की उम्र के लोगों को भी जोड़ लें तो मतदाताओं की यह संख्या बढ़कर 61 करोड़ के आसपास हो जाती है। तकनीकी दृष्टि से 36 से 45 साल की उम्र की लोगों को युवा नहीं माना जाता है। रोजगार में उन्हें बहुत ही कम प्राथमिकता मिलती है, युवा उन्हें युवा नहीं मानते हैं, उधर प्रौढ़ उन्हें प्रौढ़ नहीं मानते। लेकिन ये युवा ही होते हैं और वे उम्र की ऐसी दहलीज पर होते हैं, जहां उनमें ऊर्जा की कोई कमी नहीं होती और जिंदगी के तमाम अनुभव भी उनके पास होते हैं। खैर, भारत युवाओं का देश है, क्योंकि यहां के करीब 61 करोड़ वोटर युवा हैं। अत: राजनीति में इनकी भागीदारी का सवाल क्यों नहीं उठाया जाना चाहिए? राजनीतिक दलों से यह मांग क्यों नहीं की जानी चाहिए कि वे युवाओं को उसमें उचित भागीदारी दें? लेकिन राजनीति की कहानी तो बिलकुल अलग है। यह बात वैसे तो सभी दल कहते हैं कि उनके पास युवा कार्यकर्ताओं की अच्छी खासी तादाद है। कोई यह तादाद लाखों में बताता रहता है, तो कोई करोड़ों में। लेकिन राजनीति में अव्वल तो युवा दिखते ही नहीं और दूसरे यदि दिखते भी हैं तो वे युवा की स्थापित परिभाषा से बाहर के होते हैं। सामान्य जीवन में 18 से 45 साल के लोगों को युवा माना जाता है, जबकि राजनीति में जो युवा दिखते हैं, वे 45 वर्ष से ऊपर के ही होते हैं। इससे कम आयु वर्ग के जो युवा राजनीति के मंच पर दिखते हैं, वे लगभग सभी के सभी वंशवाद की राजनीति से आए हुए होते हैं। वे मुलायम सिंह परिवार के हो सकते हैं, लालू परिवार के हो सकते हैं, करुणानिधि परिवार के हो सकते हैं। गांधी परिवार का वंशवाद तो जगजाहिर है ही, भाजपा में ऊंचे स्तर पर भले ही परिवारवाद न दिखता हो, लेकिन उसमें यह बुराई है तो। इस दल में नेताओं के तमाम परिजन सक्रिय हैं। यही नहीं, वे विधायक और सांसद भी बनते हैं। इस तरह का उदाहरण दिया जाना जरूरी नहीं है। हम अपने आसपास नजर डालकर यह तथ्य आराम से देख सकते हैं कि एक भी राजनीतिक दल शायद ऐसा नहीं है, जिसमें युवाओं के नाम पर नेताओं ने अपने परिवार के लोगों को आगे न बढ़ाया हो। इसका मतलब यह है कि पार्टियों के पास जो सामान्य युवा कार्यकर्ता हैं, वे केवल रैलियों में भीड़ जुटाने, मतदान के रोज पोलिंग बूथों पर तैनात रहने और नेतागणों की जय-जयकार करने के लिए होते हैं। राजनीति में उन्हें निर्णायक भूमिका देने की कोई रणनीति किसी भी दल के पास नहीं है। इसे यूं कहना ज्यादा सही होगा कि कोई पार्टी उन्हें निर्णायक भूमिका देना ही नहीं चाहती। इसीलिए पार्टियों के युवा संगठनों में बहुत से युवा चेहरे अचानक चमकने लगते हैं और फिर एक समय आ ही जाता है, जब इनमें से ज्यादातर चेहरे गायब हो जाते हैं। इसका अंतिम नतीजा यह होता है कि युवा भारत का एक तरह से पूरा ही नेतृत्व अति वरिष्ठ अथवा बुजुर्ग नेताओं के हाथों में है। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल 89 वर्ष के हो चुके हैं, जबकि उनकी जगह जिन कैप्टन अमरिंदर सिंह ने ली है, वे भी 71 वर्ष के हैं। 73 वर्ष के मुलायम सिंह यादव समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो एक बार फिर बन सकते हैं, जबकि 93 साल के एम. करुणानिधि अपनी पार्टी डीएमके का नेतृत्व कर रहे हैं। केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन की उम्र 65 साल से ज्यादा है, बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर व हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर की उम्र साठ वर्ष से भी ज्यादा है। अगर शिवराज सिंह चौहान, देवेंद्र फड़नवीस, सर्वानंद सोनोवाल जैसे कुछ अपवादों को हम छोड़ दें तो फिर हमारे देश का लगभग पूरा ही नेतृत्व 60 वर्ष और उससे ज्यादा की उम्र के लोगों के ही पास है। अभी उत्तरप्रदेश चुनावों की जमीनी पड़ताल करने के लिए जब इन पंक्तियों का लेखक घूमते-घूमते जसवंत नगर पहुंचा, तो वहां यह देखकर चौंक पड़ा कि दीवारों पर चस्पा कुछ पोस्टरों में समाजवादी पार्टी के 61 वर्षीय प्रत्याशी शिवपाल यादव को युवा प्रत्याशी लिखा गया था। वैसे, यह बात हम स्वयं मानते हैं कि जब तक व्यक्ति सक्रिय है, उसका शरीर एवं इंद्रियां उसका साथ दे रही हैं, तब तक खुद को युवा कहने-बताने में भी कोई बुराई नहीं है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पार्टियां युवाओं को राजनीति में निर्णायक भूमिका देने से बचें। तथ्य यह भी है कि यह गड़बड़ी केवल हमारी राजनीति में ही नहीं है, दुनिया के सभी देशों की कहानी ऐसी ही है, चाहे उन्होंने अपने लिए कोई भी राजनीतिक पद्धति चुनी हो। चीन के राष्ट्रपति 63 वर्ष के हैं, सऊदी अरब के राजा की उम्र 80 वर्ष है, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 71 वर्ष के हो चुके हैं। इस तथ्य के बाद भी भारत के राजनीतिक दलों को युवाओं को आगे बढ़ाना होगा। बुजुर्गो को सेवानिवृत्ति भी देनी होगी, क्योंकि हम युवा देश हैं। प्रो. सतीश कुमार (शिक्षाविद् और समाजशास्त्री) 

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