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संपादकीय

जीएसटी की ओर एक और कदम

By Raj Express | Publish Date: 3/18/2017 12:52:15 PM
जीएसटी की ओर एक और कदम
जीएसटी (वस्तु एवं सेवाकर) एक जुलाई से लागू होने की उम्मीद अब कुछ ज्यादा पुख्ता हो गई है। दरअसल, गुरुवार को हुई जीएसटी परिषद की बैठक में इसकी राह के दो प्रमुख अड़ंगे हटा दिए गए हैं। उसने केंद्रीय व एकीकृत जीएसटी विधेयकों के प्रारूप को तो अपनी पिछली बैठक में ही मंजूरी दे दी थी और उसी के बाद से यह सवाल पूछा जा रहा था कि राज्यों और संघ शासित प्रदेशों से जुड़े जो दो विधेयक हैं, कहीं उनको लेकर तो कोई पेंच नहीं फंस जाएगा? वस्तुत: जीएसटी परिषद के अध्यक्ष, जो कि पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री भी हैं, उस समय उनका रवैया थोड़ा रूखा सा लगा था, लेकिन गुरुवार की बैठक में वे बदले-बदले से नजर आए। शायद यह पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद बढ़ी भाजपा की ताकत का ही असर था कि उन्होंने कोई पेंच नहीं फंसाया। यदि इन चुनावों के नतीजे केंद्र सरकार के विपरीत रहे होते तो वे निश्चित ही कुछ न कुछ खुरापात तो करते। उन्हें अपने सुर में सुर मिलाने वाले भी मिल जाते, पर ऐसा हुआ नहीं। लिहाजा, जीएसटी परिषद ने राज्यों और संघ शासित प्रदेशों से जुड़े दोनों विधेयकों यानी एस-जीएसटी और यूटी-जीएसटी के प्रारूपों को भी मंजूरी दे दी है। अब थोड़ी-बहुत दिक्कत जीएसटी की दरों को लेकर आएगी। वैसे तो इसकी चार दरें निर्धारित की जा चुकी हैं-चार, 12, 18 और 28 प्रतिशत। लेकिन इस पर बहस ही नहीं, बल्कि विवाद की भी गुंजाइश है कि किस वस्तु और सेवा पर कौन सी दर से जीएसटी लगाया जाए। अलबत्ता, यह ऐसा मसला नहीं है, जो सुलझ न सके या जिसके कारण जीएसटी एक बार फिर से फंसकर रह जाए। जो असली मसले थे, वे सुलझ चुके हैं। इस कर प्रणाली से जुड़े चारों विधेयकों के प्रारूपों को परिषद की मंजूरी ही सबसे कठिन कार्य थी और यह काम हो चुका है। जब 31 मार्च को जीएसटी परिषद की अगली बैठक होगी, तो उम्मीद है कि उसमें यह मसला भी सुलझ जाएगा कि किस वस्तु एवं सेवा को कितने प्रतिशत के जीएसटी के दायरे में रखा जाए। जब जीएसटी परिषद अपना काम ठीक से कर रही है, तो संसद में इन विधेयकों के फंसने की तो आशंका ही नहीं है। इस संबंध में सबसे ज्यादा गौरतलब तो यही तथ्य है कि जीएसटी से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक बहुत पहले ही न केवल संसद में पारित हो चुका है, बल्कि उसे देश की दो तिहाई राज्य विधानसभाएं भी पारित कर चुकी हैं। यहां तक कि उस पर राष्ट्रपति तक के हस्ताक्षर हो चुके हैं। तब इन चारों विधेयकों के संसद में फंसने का कोई कारण ही नहीं है। विरोध के लिए विरोध तो अब विपक्षी राजनीतिक दल नहीं ही करेंगे, क्योंकि जीएसटी के विरोध में राजनीति की गुंजाइश भी अब लगभग समाप्त हो गई है। उन्हें जनता का मूड समझ में आ गया है कि वह नरेंद्र मोदी के पक्ष में है। ऐसे में अगर ये चारों विधेयक संसद के चालू सत्र में ही पेश किए जाते हैं तो पारित हो जाएंगे, वरना मानसून सत्र में तो पारित हो ही जाएंगे। इस तरह, लगता तो है कि जीएसटी इसी वर्ष एक जुलाई से लागू हो जाएगा।
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