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संपादकीय

निर्मल मन से दें दान

By Raj Express | Publish Date: 3/18/2017 12:53:56 PM
निर्मल मन से दें दान
एक बार चीन के चांग चू प्रदेश में वहां के एक महंत ने भगवान बुद्ध की एक प्रतिमा बनवाने के लिए धन इकट्ठा करने के प्रयोजन से अपने शिष्यों को घर-घर भिजवाया। लोगों ने श्रद्धानुसार धन दिया। वे अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग लोगों से धन एकत्र कर रहे थे। एक शिष्य को एक छोटी सी बालिका मिली। बालिका का नाम तिन-नू था। तिन-नू के पास एक सिक्का था, वह उस शिष्य को एक सिक्का दान कर रही थी, ताकि भगवान बुद्ध की मूर्ति बनने में उसका भी सहयोग शामिल हो जाए। किंतु शिष्य तिन-नू के हाथ में सिक्का देखकर नाक-भौंह सिकोड़ने लगा व उसने बालिका से उस सिक्के को नहीं लिया। कुछ दिनों बाद धन की पूर्ति होने पर भगवान बुद्ध की सुंदर मूर्ति का निर्माण होना प्रारंभ हो गया। किंतु बार-बार प्रयासों के बाद भी मूर्ति सुंदर ढंग से पूर्ण नहीं हो पा रही थी। किसी को यह भी समझ नहीं आ रहा था कि आखिरकार मूर्ति पूर्ण एकाग्रता व लगन से बनाने के बाद भी सुंदर क्यों नहीं बन पा रही है। अंत में महंत ने सभी शिष्यों को बुलाया और उनसे दान एकत्र करते समय घटे प्रसंगों को सुनाने को कहा। कुछ ही देर बाद एक शिष्य के वृत्तांत में तिन-नू बालिका का भी प्रसंग आया। तिन-नू बालिका का प्रसंग सुनकर महंत को झटका लगा और उन्होंने शिष्य से उसी समय बालिका के पास जाकर क्षमा मांगने व वह सिक्का लाने का आदेश दिया। आदेश सुनकर शिष्य ने बालिका तिन-नू से क्षमा मांगकर सहर्ष वह सिक्का ले लिया। कहते हैं कि धातुओं के घोल में उस एक सिक्के  को मिला देने पर सहज ही एक सुंदर मूर्ति का निर्माण हो गया। कहा जाता है कि अब भी उस प्रतिमा के हृदय के ऊपर एक सिक्के जैसा उभार है। निर्मल मन से दिया गया दान ऐसा ही होता है।
रैनू सैनी
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