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संपादकीय

कैप्टन बदल देंगे पंजाब की दिशा

By Raj Express | Publish Date: 3/20/2017 11:18:46 AM
कैप्टन बदल देंगे पंजाब की दिशा
पंजाब में हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव से अगर कोई व्यक्ति कोई निष्कर्ष निकालना चाहता है तो वह आपस में गुंथे यह तीन सवाल कर सकता है। पहला, शिरोमणि अकाली दल-भाजपा गठबंधन क्यों हारा? दूसरा, आम आदमी पार्टी की जीत क्यों नहीं हुई और तीसरा कांग्रेस कैसे जीती? इन सब बातों का जवाब इस सहजबोध में है कि पंजाब में कांग्रेस की जीत असल में उसकी नहीं है और न ही इसे उसका पुनरुद्धार मानना चाहिए। चूंकि भारत के अन्य राज्यों में लंबे समय से पतन की ओर जाने वाली कांग्रेस का सितारा पंजाब में भी अस्त होने की ओर अग्रसर था, लिहाजा यहां उसे मिली बड़ी विजय को मुख्य तौर पर कैप्टन अमरिंदर सिंह की ही विजय कहा जाएगा। कुल मिलाकर कैप्टन पंजाब में कांग्रेस के असाधारण नेता हैं। प्रताप सिंह कैरों, जिन्हें कांग्रेस पार्टी का अब तक का सबसे कद्दावर नेता माना जाता है, उनके समेत पंजाब में हुए सभी कांग्रेसी नेता हाईकमान के मातहत ही रहे हैं। लेकिन अमरिंदर सिंह उन सबसे अलग सिद्ध हुए हैं। 1984 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने स्वर्ण मंदिर पर सैनिक कार्रवाई का आदेश दिया, तब अमरिंदर सिंह ने ऑपरेशन ब्लूस्टार के विरोध में कांग्रेस पार्टी व संसद से इस्तीफा दे दिया था। ऐसा कहा जाता है कि इंदिरा गांधी ने उन्हें ऐसा करने की एवज में ‘एक भावुक मूर्ख’ तक कहा था, जबकि इस कार्रवाई से दुनिया भर के सिखों ने अमरिंदर सिंह के इस कदम को अस्मिता अक्षुण्ण रखने और पंथ के सम्मिलित गर्व को जिलाए रखने वाला कहकर सराहना की थी। वहीं, बाद में 2002-07 तक बतौर मुख्यमंत्री रहे अमरिंदर सिंह ने सतलुज के पानी पर उत्तरी राज्यों के मध्य हुए समझौते को पंजाब के हितों के सरासर खिलाफ ठहराते हुए इसे विधानसभा में पास किए गए प्रस्ताव के जरिए निरस्त कर दिया था। उनकी इस दबंगता ने, जिसे पंजाबी एक साहसिक कदम बताते हैं, तब दिल्ली के राजनीतिक और मीडिया जगत में तूफान खड़ा कर दिया था, लेकिन अमरिंदर सिंह अपने रुख पर दृढ़ता से कायम रहे। उस वक्त मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए की सरकार केंद्र में थी। जैसा कि हाल ही में अमरिंदर सिंह ने खुद रहस्योदघाटन किया है कि उनकी इस अवज्ञा से खफा होकर कांग्रेस अध्यक्ष ने छह महीने तक मिलने का समय नहीं दिया था, जबकि कैप्टन की इस अक्खड़ता के चलते पंजाब के सिखों के एक बड़े वर्ग व बाहर बैठे पंजाबी प्रवासियों की नजर में उनकी इज्जत और बढ़ गई थी। कैप्टन अमरिंदर सिंह की इसी दूरदृष्टि के कारण ही पंजाब में उनकी छवि और साख ऐसी बनी, जो  अन्य किसी कांग्रेसी नेता की कभी नहीं बन पाई थी। कैप्टन की यही गैर-रिवायती जीवनशैली, जिसमें निजी संबंध भी शामिल हैं, उनकी छवि को एक आधुनिक एवं खुली मानसिकता वाले व्यक्तित्व का बनाती है। इस तथ्य के बावजूद कि उन्होंने आपरेशन ब्लू स्टार की मुखालफत की थी, हिंदू उन्हें कट्टरपंथी सिख नहीं मानते। पंजाब के दो संप्रदायों, सिख और हिंदुओं, दोनों में समान स्वीकार्यता रखने वाली इसी खूबी ने पंजाब में कांग्रेस की जीत सुनिश्चित की। अगर पांच साल बाद वे राजनीति से संन्यास ले लेते हैं, जैसा कि उन्होंने सार्वजनिक तौर पर स्वयं ही कहा है, तो फिलहाल कांग्रेस में ऐसा कोई नेता दिखाई नहीं देता, जो उनकी जगह की भरपाई कर सके। इसलिए अमरिंदर सिंह कांग्रेस के उस पतन को अस्थायी तौर पर रोकने का एक कामचलाऊ जरिया बन गए हैं, जो बाकी देश की तरह पंजाब में भी होकर रहता। भले ही पंजाब में कांग्रेस पार्टी को कैप्टन की वजह से चुनावी सफलता मिली है, लेकिन जिस तरह उन्होंने जीत के फौरन बाद इसका श्रेय राहुल और सोनिया गांधी को दिया है, इस बात से यह पहलू भी सामने आता है कि वे कांग्रेस के नेतृत्व के सामने स्वयं को छोटा मानते हैं।
हालांकि यह बताना भी जरूरी है कि कैप्टन ने इंदिरा गांधी का जिक्र करने से गुरेज किया, ताकि स्वर्ण मंदिर में की गई सैन्य कार्रवाई की वजह से सिखों के मन में जो क्षोभ है, कहीं वह फिर से न दिखने लगे। कांग्रेस को अमरिंदर सिंह का आभारी होना चाहिए कि उनके प्रभाव के चलते पंजाब में उसकी सरकार बनने से पार्टी की राजनीतिक साख कुछ तो कायम रह सकी। जब कैप्टन राजनीति से संन्यास ले लेंगे, उसके बाद कांग्रेस में जो उथल-पुथल वाली स्थिति बन सकती है, उसके आलोक में कहा जा सकता है कि कांग्रेस ने अगर स्वयं को संभाला नहीं तो पंजाब में एक नई क्षेत्रीय पार्टी उभर सकती है। इस तरह की क्षेत्रीय पार्टी विभिन्न विचारधाराओं वाले उन कार्यकर्ताओं को एक मंच पर लाकर एकजुट कर सकती है, जो फिलहाल वजूद तो रखते हैं, लेकिन अनेक दलों में बंटे हुए हैं। इसका उदाहरण आम आदमी पार्टी है। चुनाव के वक्त ऐसा लग रहा था कि यह पार्टी कांग्रेस से बेहतर सीटें लाएगी। ऐसा ही सर्वेक्षण करने वाली कई एजेंसियां भी मान रही थीं। इसके बाद भी आम आदमी पार्टी क्यों नहीं जीत पाई, इसका मुख्य कारण यह हो सकता है कि मुख्यत: दिल्ली से चलाए जाने वाले इस दल की अति-केंद्रीयकृत प्रणाली ने पंजाब में इसकी क्षेत्रीय इकाई को खुलकर संगठनात्मक विकास नहीं करने दिया। इसके चलते क्षेत्र-आधारित राजनीतिक विचारधारा विकसित नहीं हो पाई। इस दल के जो भी नेता चुनाव में जीते हैं, मसलन एचएस फूलका, कंवर संधू, सुखपाल खैहरा और बलजिंदर कौर इत्यादि, वे ज्यादातर अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक छवि और चुनाव क्षेत्र में बूथस्तर तक की गई सख्त मेहनत की बदौलत जीते हैं। उनकी इस जीत में दिल्ली के नेतृत्व और संगठन का कोई योगदान नहीं। 
इसी तरह शिरोमणि अकाली दल को जैसी पराजय मिली है, वैसी पंजाब के गठन के बाद कभी किसी दल को नहीं मिली। हार के मुख्य कारणों में एक यह है कि अकाली दल भाजपा पर पूरी तरह से निर्भर था। गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी वाले प्रकरणों में अकाली सरकार का असफल सिद्ध होना उसकी हार का एक अन्य महत्वपूर्ण कारण है। वहीं राज्य में ड्रग्स माफिया के चलते वहां का युवा वर्ग इसकी चपेट में आ रहा था। पानी की समस्या से किसान परेशान थे। इसके बाद यह सरकार एक के बाद एक गलतियां करती गई और अंतत: गाड़ी पटरी से उतर गई। अकाली दल की इन गलतियों का खमियाजा बीजेपी को भी भुगतना पड़ा। यही कारण है कि पूरे देश में मोदी की लहर के बाद भी वहां बीजेपी अपने प्रत्याशी नहीं जिता पाई। बहरहाल, प्रत्येक चुनाव नए माहौल को जन्म देता है, पंजाब में भी इसका प्रभाव हुआ है। देखना होगा कि कैप्टन अमरिंदर सिंह इस बदली हवा में लोगों की अपेक्षाओं पर कितने खरे उतरते हैं। फिर भी उम्मीद यह है कि इस नवीनतम चुनावी उथलपुथल के बाद पंजाब में एक नए आर्थिक और राजनीतिक निजाम का जन्म होगा।
प्रीतम सिंह (प्रोफेसर, ऑक्सफोर्ड ब्रुक्स यूनिवर्सिटी-ब्रिटेन)
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