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संपादकीय

नगालैंड में संविधान की पराजय!...

By Raj Express | Publish Date: 2/23/2017 4:31:15 PM
नगालैंड में संविधान की पराजय!...

 आजादी के70साल बाद एक राज्य के मुख्यमंत्री को महिलाओं को कानूनी हक दिलवाने की कोशिश करने की वजह से पद छोड़ना पड़ा है। ऐसी चिंताजनक घटना हुई है,नगालैंड में,जहां के मुख्यमंत्री टीआर जेलियांग को प्रचंड बहुमत के बावजूद नगा संगठनों के विरोध के कारण मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ा। जेलियांग चाहते थे कि बाकी राज्यों की तरह नगालैंड के स्थानीय निकाय के चुनावों में भी महिलाओं को33फीसदी आरक्षण दिया जाए। उन्होंने इसका ऐलान भी कर दिया। पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने नगा महिलाओं के संगठन की अर्जी पर स्थानीय निकायों में महिलाओं को33फीसदी आरक्षण को संवैधानिक ठहराया था। अदालत के इसी आदेश के बाद जेलियांग ने एक फरवरी को होने वाले स्थानीय निकाय के चुनाव को महिलाओं को33फीसदी आरक्षण देने की घोषणा करके कराना चाहा था। उनके इस फैसले का वहां हिंसक विरोध शुरू हो गया। नगा और अन्य आदिवासी संगठनों ने सरकार के इस फैसले का विरोध शुरू कर दिया। महिलाओं को चुनाव में आरक्षण दिए जाने के विरोध में नगा संगठनों के कार्यकर्ताओं ने न केवल नगर पालिका के कार्यालय को फूंक दिया,बल्कि मुख्यमंत्री के दफ्तर पर भी हमले कर दिए। तब सेना को तक बुलाना पड़ गया था। विरोध की आग में जल रहे नगालैंड में पारंपरिक तौर पर पुरुष प्रधान नगा संगठनों ने मुख्यमंत्री जेलियांग का खुलकर विरोध शुरू कर दिया,अंतत:और अब इन संगठनों के दबाव में उन्हें अपना पद छोड़ना पड़ा। वह भी तब,जब60सदस्यीय विधानसभा में जेलियांग की नगालैंड पीपुल्स पार्टी के46विधायक हैं व बाकी उनके समर्थक हैं। परंपरा के नाम पर यह लोकतंत्र को बंधक बनाने जैसा कृत्य है। आदिवासियों के जो संगठन वहां के चुनाव में महिलाओं के आरक्षण का विरोध कर रहे हैं,वे संविधान में वहां की जनता को मिले अधिकारों की अस्पष्टता की आड़ ले रहे हैं, बहुत ही चालाकी से। इन संगठनों का दावा है कि संविधान आदिवासियों को अपनी प्रचीन परंपराओं और रीति-रिवाजों की हिफाजत का अधिकार देता है। संविधान के अनुच्छेद371(ए)के मुताबिक नगालैंड की धार्मिक और सामाजिक परंपराओं के मामलों में संसद का कोई कानून वहां लागू नहीं होता है। वे अपनी परंपरा के हिसाब से काम करते रहते हैं। नगा आदिवासियों की लंबे समय से चली आ रही रूढ़ियों और प्रथाओं के अलावा संपत्ति के मामले भी इसके दायरे में आते हैं। संविधान के इसी अनुच्छेद को ढाल बनाकर इस राज्य में महिलाओं को उनका हक नहीं दिया जाता।

नगा आदिवासियों के सभी संगठनों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व नहीं है और राजनीतिक सच्चाई यह है कि वर्ष-1964में हुए पहले विधानसभा चुनाव से लेकर अब तक वहां की विधानसभा में कोई महिला विधायक नहीं चुनी गई है। इससे पता चलता है कि नगालैंड में पितृ-सत्तात्मक समाज की जड़ें कितनी गहरी हैं और संविधान के उपरोक्त अनुच्छेद की अस्पष्टता और उसकी उचित व्याख्या न होने की आड़ लेकर पुरुषवादी सामंती सोच को वैधता प्रदान की जाती है। जब भी महिलाओं को लोकतांत्रिक अधिकार देने की बात आती है,लोग संविधान की आड़ में खड़े हो जाते हैं,उसकी दुहाइयां देते हैं।
हां,इस मसले पर संविधान में भी भ्रम की स्थिति है। एक तरफ तो वह अपने अनुच्छेद371(ए)में नगालैंड के आदिवासियों को अपनी परंपराओं और रीति-रिवाजों के संरक्षण का अधिकार देता है,तो दूसरी तरफ अनुच्छेद 243(डी)में वह महिलाओं को आरक्षण देने की बात करता है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि अनुच्छेद371(ए)संविधान में प्रदान किए गए समानता के अधिकार की राह में बाधा बनकर खड़ा हो जाता है। आमतौर पर जब मौलिक अधिकारों के रास्ते में कोई पारंपरिक कानून अड़चन बन कर खड़ा होता है,तो मौलिक अधिकारों को ही तरजीह दी जाती है। संविधान में मिले मौलिक अधिकारों से समझौता नहीं हो सकता। जरूरत पड़ने पर इसके लिए संविधान में संशोधन करने से भी हमें नहीं हिचकना चाहिए। हमारी लोकतांत्रिक प्रकिया में कोई राज्य अथवा कोई संगठन महिलाओं को दरकिनार करके देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूती नहीं दे सकता है। इस वक्त नगालैंड में अजीब द्वंद्व की स्थिति है, जहां एक तरफ महिलाएं अपना हक मांग रही हैं,तो वहीं दूसरी ओर आदिवासियों की पंचायतें परंपरा और रूढ़ियों के नाम पर उन्हें संवैधानिक अधिकारों से वंचित करने का खुला खेल; खेल रही हैं। नगालैंड में कोई भी विधायक जातीय संगठनों के इस फैसले के खिलाफ खड़ा होने की हिम्मत नहीं दिखा पाया। क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि पारंपरिक रूढ़ियां-परंपराएं हमारे संविधान पर अब भी भारी पड़ती हैं?वैसे नगालैंड में तो संविधान की अस्पष्टता विरोध करने वालों को एक आधार दे रही है,मगर अन्य प्रदेशों में जातीय पंचायतें महिलाओं के मसले को लेकर कितनी अनुदार होती हैं,समय-समय पर यह भी देखने को मिलता रहता है। समान गोत्र में प्रेम विवाह के विरोध से लेकर ऑनर किलिंग तक में पुरुष सत्ता अपने क्रूरतम रूप में सामने आती है। देश की महिलाओं को बराबरी का हक देने-दिलाने की खूब बातें हमारे रहनुमा करते हैं। चुनावों के वक्त नारी शक्ति की बातें फिजां में जोर-शोर से गूंजती हैं,लेकिन जब कानूनी रूप से उनको हक देने की बात आती है,तो पुरुष सत्ता अपना असली रूप दिखा देती है। यह रूप बहुत ही डरावना होता है।
संसद और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के आरक्षण का मुद्दा दो दशक से भी अधिक समय से अटका हुआ है। वर्ष-1996में एचडी देवगौड़ा के प्रधानमंत्रित्व काल में इस आरक्षण बिल को लोकसभा में पेश किया गया था। दो साल बाद फिर से अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में यह बिल लोकसभा में पेश किया गया,लेकिन हंगामे के अलावा कुछ हो नहीं पाया। संसदीय कमेटियों के रास्ते इस बिल को कई बार संसद में पेश किया जा चुका है,मगर राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में यह पास नहीं हो पा रहा है। पिछले साल सितंबर में इस बिल को संसद में पेश हुए20साल हो गए। यह पास क्यों नहीं हो पा रहा है,इसके पीछे की सोच पर विचार करने की जरूरत है। हमारे पुरुष प्रधान समाज के नेता इस तरह के बयान देते हैं कि अगर संसद और विधानमंडलों में महिलाओं को आरक्षण देने का कानून बनेगा,तो फिर सदन में सीटियां गूंजेगीं। इस आरक्षण के विरोध में पूरे देश ने देखा था कि संसद किस तरह से एक सांसद की करतूत से शर्मसार हो गई थी। अब जबकि नगालैंड के मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा है,तो यह भी लोकतंत्र के लिए कोई शुभ संकेत नहीं है। चिंता की बात यह है कि आदिवासी संगठनों का विरोध करने की हिम्मत भी कोई जुटा नहीं पा रहा है।
अनंत विजय (टेलीविजन पत्रकार और स्तंभकार)
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