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संपादकीय

ट्रंप अपना रवैया शायद ही बदलेंगे....

By Raj Express | Publish Date: 2/23/2017 4:39:13 PM
ट्रंप अपना रवैया शायद ही बदलेंगे....
भारत आए19सदस्यीय अमेरिकी सांसदों के दल के सामने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एच-1बी वीजा से जुड़ी भारत की चिंता जताकर सही मौके पर बिलकुल सही बात कही है। वहां के दोनों ही दलों,सत्तारूढ़ रिपब्लिकन और प्रतिपक्ष डेमोक्रेटिक पार्टी के ये सांसद हमारे देश में25फरवरी तक रहेंगे। अत:सरकार का यह संकेत भी सही है कि वीजा के विषय में उनसे आगे भी बात होती रहेगी। अमेरिका से ही आठ सांसदों का एक दल और आया है, जो आज वापस चला जाएगा। वीजा के विषय में उससे भी बात हुई है। प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ से बुधवार को जारी किए गए एक बयान के अनुसार,मोदी ने सांसदों से कहा है कि अमेरिका और उसकी अर्थव्यवस्था आज जिस मुकाम पर है,उसे वहां पहुंचाने में भारतीय पेशेवरों का बहुत योगदान है। अब यदि एच-1बी वीजा सुविधा में कटौती की गई या फिर उसे हासिल करने की प्रक्रिया को महंगा बनाया गया तो इससे भारतीय आईटी उद्योग का नुकसान होगा, फायदे में अमेरिका भी नहीं रहेगा। अत: ट्रंप-प्रशासन को चाहिए कि वह कुशल पेशेवरों की आवाजाही के मामले में संतुलित,व्यापारिक,व्यवहारिक और दूरदर्शी नजरिया ही अपनाए।
मोदी का बात करने का यह अंदाज संतुलित है। वैसे भी अमेरिकी सांसदों से तल्ख लहजे में बात की भी नहीं जा सकती थी। दरअसल,ट्रंप का रवैया इस तरह का है कि वे किसी की सुनने को तैयार नहीं हैं। उदाहरण के लिए, सात मुस्लिम देशों के नागरिकों के अमेरिका आने पर जो प्रतिबंध उन्होंने लगाया था और जब वे अदालत में उसे सही सिद्ध नहीं कर पाए थे,तो उससे पीछे हट गए थे। इसके बाद क्या हुआ?यही कि कुछ हल्के-फुल्के संशोधनों के बाद इन देशों के नागरिकों पर उन्होंने फिर प्रतिबंध लगा दिया। ट्रंप ने इसी तरह का रुख चीन को लेकर भी अपनाया है। कभी वन चाइना पॉलिसी का वे समर्थन करने लगते हैं,तो कभी विरोध। रूस के प्रति उनके मन में जो नरमी थी,वह अभी तक बनी हुई है। वह इसके बावजूद बनी हुई है कि वे कह चुके हैं कि अमेरिका रूस को अपनी नहीं चलाने देगा। लेकिन रूस अपनी चला रहा है, उसकी फौज पूर्वी यूक्रेन में चाहे जब घुस जाती है,तो भी डोनाल्ड ट्रंप चुप हैं।
जब उनका रुख न कुछ मुस्लिम देशों को लेकर बदला है और न रूस और चीन को लेकर भी,तो एच-1बी वीजा पर उनके विचारों में तब्दीली आने की कल्पना ही हम क्यों करें?हालांकि,प्रधानमंत्री को अमेरिकी सांसदों ने आश्वासन दिया है कि वे इस विषय पर न केवल ट्रंप से बात करेंगे, बल्कि उन्हें भारत का महत्व भी बताएंगे,मगर इस बात की क्या गारंटी है कि वे अपने सांसदों की बात मान ही लेंगे?जब वे किसी की नहीं मानते,अदालत की भी नहीं, तब सांसदों की बात क्यों मानेंगे?लगता है कि वे एच-1 बी वीजा उन लोगों को देने का नियम बना ही डालेंगे, जिनका वेतन1.30लाख डालर प्रतिवर्ष होगा। ऐसी आशंका के बीच अमेरिकी सांसदों से तल्ख लहजे में बात करने का कोई अर्थ नहीं था। बात जिस तरह की जानी चाहिए थी,प्रधानमंत्री ने की भी उसी तरह है।   
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