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संपादकीय

अखिलेश का तोड़ अभी से खोजे कांग्रेस

By Raj Express | Publish Date: 2/24/2017 1:08:29 PM
अखिलेश का तोड़ अभी से खोजे कांग्रेस

 उत्तरप्रदेश राजनीति की पहली पाठशाला है। कहा जाता है कि यहां की उर्वर सियासी जमीन से दिल्ली के सिंहासन का रास्ता तय होता है। राज्य में चौथे चरण की वोटिंग हो चुकी है। भाजपा,बसपा के अलावा सत्ताधारी दल सपा- कांग्रेस गठबंधन ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। चुनावी मौसम पर फागुनी रंग चढ़ गया है,मगर मुद्दों की सियासी जमीन खाली है। कब्रस्तान और श्मशान से गुजरता कारवां कसाब तक पहुंच गया है। लेकिन समाजवादी पार्टी में छिड़ी परिवारवाद की लड़ाई थमने का नाम नहीं ले रही है। बाप-बेटा व चाचा-भतीजा एक दूसरे पर वार कर रहे हैं। अखिलेश व राहुल गांधी की दोस्ती एक दूसरे के लिए अग्निपरीक्षा बनी हुई है,क्योंकि विपक्ष जहां सपा के आंतरिक विवाद का फायदा उठाना चाहता है,तो राज्य के सीएम अखिलेश का राजनीतिक भविष्य परिवारवाद की वजह से दांव पर लगा है। विरोधियों के साथ सपा में ही मुलायम सिंह यादव और शिवपाल द्वारा सपा-कांग्रेस गठबंधन पर सवाल उठाए जा रहे हैं। अखिलेश यादव ने एक अंग्रेजी अखबार को दिए साक्षात्कार में बड़ा बयान दिया।कहा है कि अगर परिवार में झगड़ा नहीं होता तो कांग्रेस से गठबंधन भी नहीं होता। कांग्रेस के साथ गठबंधन तो हालात की वजह से हुआ है। निश्चित तौर पर उन्होंने अपनी बात को बहुत ही बेवाकी से रखा है। इस बात पर शक भी नहीं है कि परिवारवाद की जंग की वजह से यह गठबंधन हुआ है। अखिलेश को पिता मुलायम और चाचा शिवपाल सिंह के साथ अमर सिंह से भी आतंरिक लड़ाई लड़नी पड़ रही थी। यह जंग कोई साधारण नहीं, बल्कि अखिलेश यादव के अस्तित्व की थी,जिसमें चाचा रामगोपाल उनके सारथी बने और कानूनी रूप से उन्होंने इस जंग को जीत लिया। मुलायम सिंह अखिलेश की नीतियों को लेकर बार -बार दुष्प्रचार कर रहे थे। उन्हें रिमोट सीएम बताया जा रहा था। इस पूरी लड़ाई में मुलायम सिंह की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता का नाम खुलकर सामने आया। वे अपने बेटे प्रतीक यादव व बहू अर्पणा यादव को राजनीति में स्थापित करना चाहती थीं,लेकिन यह बात अखिलेश को नागवार गुजर रही थी। फिलहाल इस खेल में सीएम नई भूमिका में उभरे हैं। मजबूरी में उन्होंने गठबंधन भी कर लिया। नहीं करते तो उनके पारिवारिक विवाद का सीधा लाभ बसपा को मिलता। दलित और मुस्लिम यानी एमडी इंजीनियरिंग के जरिए वह सपा को हरा देती। इसके लिए ही उसने97मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है। मुस्लिम मतों का बिखराव रोकने के लिए अखिलेश के पास कोई दूसरा विकल्प इस गठबंधन के सिवाय नहीं था। हालांकि कई सीटों पर दोनों दलों के उम्मीदवारों में सीधा मुकाबला हो रहा है,लेकिन गठबंधन से दोनों को ताकत भी मिली है। दोनों दलों की चुनावी संभावनाएं बढ़ गई हैं।

राजनीति निर्मम होती है। यहां संबंध कोई मायने नहीं रखते हैं। अवसर एवं सत्ता ही सब कुछ होती है। सपा में संकट मोचक के नाम से चर्चित अमर सिंह के साथ भी यही हुआ है और मुलायम सिंह के पहलवानी दांव के लपेटे में वे भी आ गए। आज उनका राजनीतिक अस्तित्व हाशिए पर है। यह बात सच है कि झगड़े की सारी पटकथा मुलायम सिंह ने लिखी थी,मगर अमर सिंह इससे अनभिज्ञ नहीं थे। उन्होंने खुद यह बात कही है कि चुनाव आयोग में चिन्ह को लेकर छिड़ी जंग में पक्ष रखने के लिए मुलायम सिंह यादव ने उन्हें खुद वहां भेजा था, पर बाद में अपना निर्णय बदल कर वापस बुला लिया था। जब अखिलेश को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा था,तो इसका पत्र टाइप करने का काम भी अमर सिंह को सौंपा गया था। मगर बाद में वह पत्र मुलायम के निर्देश पर शिवपाल की तरफ से जारी किया गया। यह बात सही ही है। यदि मुलायम एवं अखिलेश की लड़ाई वास्तविक होती तो मुलायम और शिवपाल समर्थकों के टिकट काट दिए जाते,मगर ऐसा हुआ नहीं है। गायत्री प्रजापति तक को टिकट मिल गया है,जो मुलायम के करीबी हैं और अपनी ही पार्टी की एक कार्यकर्ता के साथ बलात्कार के आरोपों से जूझ रहे हैं। बहरहाल,सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ है,लेकिन अभी तक उनकी गिरफ्तारी नहीं हुई है। हां,अमर सिंह के खुलासे उतने महत्वपूर्ण नहीं हैं,जितना कि अखिलेश का यह बयान कि उन्होंने मजबूरी के चलते कांग्रेस के साथ गठबंधन किया है। इसका भावार्थ यह है कि चुनाव के बाद यदि समाजवादी पार्टी अपने बलबूते पर सरकार बनाने में सफल होती है तो अखिलेश कांग्रेस से दूर हो जाएंगे। अगर ऐसा होता है तो यह मुलायम सिंह यादव व शिवपाल की इच्छा को पूरा करना होगा,क्योंकि ये दोनों ही सपा-कांग्रेस गठबंधन के विरोधी रहे हैं। इस बयानबाजी का निचोड़ यदि संक्षेप में निकाला जाए तो समझ में यह आता है कि अखिलेश ने कांग्रेस को दरकिनार कर परिवार में एकजुटता कायम करने की गुंजाइश बचाकर रखी है,मगर यह होगा तभी, जब समाजवादी पार्टी की सत्ता में आने की सूरत बन रही होगी। ऐसे में कांग्रेस को चाहिए कि वह अखिलेश यादव की राजनीति की काट अभी से खोज ले,वरना तो नुकसान होगा।
 प्रभुनाथ शुक्ला (स्वतंत्र टिप्पणीकार)
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