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संपादकीय

प्रकृति के अव्यक्त रूप हैं महादेव

By Raj Express | Publish Date: 2/24/2017 1:23:47 PM
प्रकृति के अव्यक्त रूप हैं महादेव

 संपूर्ण संस्कृत वांग्मय में शिव साधु रूप में हैं। माया मोह से लगभग निर्लिप्त। शिवजी अपने शरीर पर जो वस्तुएं धारण किए हुए हैं,उनमें भी वैभव नहीं दिखता। उनके शरीर पर राख मली हुई है। वे जटाधारी हैं। सर्प उनके गले व हाथों में गहनों की तरह शोभायमान हो रहे हैं। हिमालय उनकी आश्रयस्थली है। साधना में लीन शिव की आंखें सदैव बंद रहती हैं। हालांकि वे त्रिनेत्रधारी हैं, पर उनका तीसरा नेत्र आपातस्थिति में ही खुलता है। तब वे रौद्र रूप में होते हैं। उसी समय कभी-कभी वे तांडव नृत्य भी करते हैं। इस नृत्य का अर्थ‘देवता का नृत्य’या‘नृत्य करते देवता’है। इसका चित्रंकन नटराज की मूर्ति में किया गया है। ऐसी मान्यता है कि शिवजी ने यह नृत्य केरल के चिदंबरम् नामक स्थान पर किया था।

भगवान महादेव एक तरह से प्रकृति के अव्यक्त रूप हैं। अव्यक्त प्रकृति से स्वयं के प्रति महत्व का बोध होता है और इस बोध से अहंकार उत्पन्न होता है। इस अहंकार तत्व के अधिष्ठाता शिव हैं। यदि अहंकार एक सीमा से ज्यादा न हो तो वह शिव-तत्व का द्योतक होता है। शिव को कई नामों से जाना जाता है। इनमें महेश,शंकर, महेश्वर,महाकाल,ओंकारेश्वर,रूद्र,नीललोहित प्रमुख हैं। शिव कई जगह अनेक अंगों-उपांगों वाले दर्शाए गए हैं। इन रूपों में शिवजी पंचानन,दशबाहु,त्रिनेत्र,त्रिशूली,अष्टमूर्ति,त्र्यम्बक, अर्धनारीश्वर,चंद्रधर,भूतनाथ और वृषवाहन के नामों से पहचाने जाते हैं। शिव को पुराणों में दस भुजाओं वाला भी दर्शाया गया है। उनकी ये भुजाएं दस दिशाओं की प्रतीक हैं। शिव त्रिनेत्रधारी हैं। ये तीन आंखें सूर्य,चंद्रमा तथा अग्नि की द्योतक हैं। इन तीन आंखों को तीन गुण- सत्व,रज व तम का प्रतीक भी माना गया है। पुराणों में शिव के आठ रूप दर्शाए गए हैं। ये रूप हैं-रूद्र,भव,शर्व, ईशान,उग्र,पशुपति,भीम तथा महादेव। इन्हें आठ रूद्र कहा जाता है। पुराणों में शिव की कल्पना एक ऐसे व्यक्ति के रूप में की गई है,जिसका आधा शरीर स्त्री का तथा आधा शरीर पुरुष का है। यह स्त्री एवं पुरुष मिश्रित शरीर अर्धनारीश्वर के नाम से जाना जाता है। पुराण-सम्मत मान्यता है कि सृष्टि के आरंभ में फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के दिन शिव और शक्तिरूपा पर्वती एक हुए थे।
इसी दिन शिव अत्यंत क्रोधित हुए व संपूर्ण ब्रह्मांड के विनाश के लिए तांडव नृत्य करने लगे। अर्धनारीश्वर-संदर्भ में जो प्रमुख कथा प्रचलित है, वह यह है कि जब ब्रह्मा  ने सृष्टि के विधान को आगे बढ़ाने की बात सोची और इसे साकार करना चाहा,तो उन्हें इसे अकेले पुरुष रूप में आगे बढ़ाना संभव नहीं लगा। तब उन्होंने शिव को बुलाकर अपना मंतव्य प्रकट किया। शिव ने ब्रह्मा के भाव को समझते हुए उन्हें अर्धनारीश्वर बन दर्शन दिए। अर्थात,स्त्री-पुरुष के सम्मिलन से सृष्टि के विकास की परिकल्पना दी।
इस सूत्र के हाथ लगने के बाद ही ब्रह्माजी सृष्टि के क्रम को निरंतर गतिशील बनाए रखने का विधान रच पाए। सच्चई भी यही है कि स्त्री व पुरुष का समन्वय ही सृष्टि का वास्तविक विधान है। इसीलिए स्त्री को प्रकृति का प्रतीक माना गया है। स्त्री के सहयोग के बिना कोई कल्पना फलित नहीं हो सकती है। इसीलिए पुरुष रूपी शिव और प्रकृति रूपी स्त्री जब अर्धनारीश्वर के रूप में एकाकार होते हैं,तो सभी भेद स्वत:समाप्त हो जाते हैं। दोनों एक-दूसरे के पूरक बनकर भेद खत्म कर देते हैं।
शिवलिंग का रहस्य जाने बिना शिव-महिमा का बखान अधूरा है। अत:लिंग की प्रकृति से जुड़े महत्व और इसकी पूजा के कारण भी जान लेते हैं। वैसे प्रचलन में तो यही आम मान्यता है कि शिव व शक्ति,दोनों का संयोगात्मक प्रतीक ही शिवलिंग है और यही उनकी माया है,क्योंकि सामान्यत:पुरुष-स्त्री के गुप्तांगों का आभास देने वाले शिवलिंग की प्रतीक मूर्तियों से साधारण अर्थ यही निकलता है। लेकिन स्कंदपुराण में इसका अर्थ प्रकृति की चेतना से है। अर्थात,आकाश लिंग है व पृथ्वी उसकी पीठिका है। यह आकाश इसलिए लिंग कहलाता है,क्योंकि इसी में देवताओं का वास है और इसी में वे गतिशील रहते हैं। आकाश को पुराणकारों ने इसलिए लिंग माना है, क्योंकि इसका स्वरूप शिवलिंग जैसा अर्धवृत्ताकार है। दूसरे,वह पृथ्वी रूपी पीठिका पर अधिरोपित होने जैसा दिखाई देता है। वैदिक ऋचाओं को पढ़ने वाले जानते ही होंगे कि रूद्र गण शक्तिशाली होने के साथ स्वेच्छाचारी भी थे,पर उनकी स्वेच्छाचारिता स्वाभिमान से जुड़ी हुई थी। ये लोग उस समय के प्रमुख संगठक व नेतृत्वकर्ता इंद्र,वरुण,दैत्य और दानव,किसी भी समूह में रहना पसंद नहीं करते थे। जब इंद्र ने अलग देव संगठन बना लिया और उसका स्वयं को स्वयंभू घोषित करते हुए देवराज इंद्र कहलाना शुरू कर दिया,तब उन्होंने रुद्रों की उपेक्षा भी की। उन्हें संगठन से वंचित रखा। परिणामस्वरूप वे यज्ञ-भाग से भी वंचित हो गए। इसके बाद ही सूर्य समेत इन सभी देवों ने व्यक्ति-पूजा की शुरुआत कर दी। ब्राह्मणों  को दान-दक्षिणा देकर अपनी अर्चना से संबद्ध प्रार्थना से जुड़े स्तुति गान व वैदिक सूक्तों की नई रचनाओं के माध्यम से प्रशंसा-प्रणाली की एक नई वैचारिक धारा को जन्म दे दिया।
इस एकपक्षीय स्थिति का निर्माण होते देख रूद्रों को अपने अस्तित्व की चिंता सताने लगी और तब उन्होंने इस विषय को गंभीरता से लेते हुए भग और लिंग की पूजा आरंभ कर दी। मिट्टी,काठ और पत्थर के योनि-लिंग भी इसी कालखंड में अस्तित्व में आए। रूद्रों द्वारा यह पूजा शुरू करने से जो लोग इनके समर्थक थे और इनके गुटों से जुड़े थे,वे भी लिंग-पूजक बन गए। चूंकि ये ताकतवर थे और इनके निष्ठावान अनुयाइयों की एक पूरी श्रृंखला भी थी,इसलिए लिंग-पूजा ने एक प्रथा का विस्तृत रूप ले लिया। शिव महिमा के अंत में नंदी का वर्णन जरूरी है। नंदी शिव के वाहन के रूप में इसलिए उपयुक्त हैं,क्योंकि वृषभ लोकव्यापी प्राणी होने के साथ ही साथ खेती-किसानी का भी प्रमुख आधार है। यांत्रिकीकरण होने से पहले बिना बैल के खेती संभव ही नहीं थी। पुराणों में वृषभ को धर्म-रूप में प्रस्तुत किया गया है। उसके चार पैरों को सत्य,ज्ञान,तप तथा दान का प्रतीक माना गया है। यह भी माना गया है कि शिवलिंग की उत्पत्ति विद्युत तरंग से हुई है। इसके आकार को ब्रह्मांड का रूप माना गया है। अत:शिव को विद्युताग्नि व नंदी को बादलों का प्रतीक माना गया है।
वृषभ को काम का प्रतीक भी माना गया है,क्योंकि इसमें काम शक्ति प्रचुर मात्र में होती है। इस नाते वृषभ सृजन शक्ति का प्रतीक है। शिव को नंदी पर आरूढ़ दिखाया गया है। इसका आशय है,एक शिव ही हैं,जो कामियों की वासनाओं को नियंत्रित करने में सक्षम हैं। स्पष्ट है कि काम के रूप में वृषभ के प्रतीक शिव विश्व की सृष्टि के लिए अभिप्रेरणा के द्योतक भी हैं। यही कारण है कि उन्हें आदिदेव और महादेव भी कहा जाता है। वे मनुष्य में पाए जाने वाले सभी गुण-दोषों के समुच्य हैं,इसीलिए महादेव हैं।
 प्रमोद भार्गव (वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार)
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