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संपादकीय

वोटर का इशारा समझें पार्टियां

By Raj Express | Publish Date: 2/24/2017 1:50:06 PM
वोटर का इशारा समझें पार्टियां

 बृहन्मुंबई महानगर पालिका(बीएमसी)समेत महाराष्ट्र के सभी नगर निकाय चुनावों के नतीजों ने मतदाताओं के मनोभावों का स्पष्ट संकेत दे दिया है। जहां मुंबई,थाणो और नासिक में शिवसेना तथा भाजपा के बीच सीधा मुकाबला हुआ,तो वहीं पिंपरी चिंचवड़ और पुणो में भाजपा का मुकाबला शरद पवार की पार्टी एनसीपी से हुआ। नागपुर जैसे कुछ नगर निगम ऐसे भी हैं,जहां कांग्रेस दूसरे नंबर की पार्टी रही,लेकिन उसके लिए यह नतीजे कुल मिलाकर संतोषजनक नहीं माने जा सकते। बात-बात पर उछलकूद मचाने एवं अनर्गल बयान जारी कर-करके कुख्यात हो चुके राज ठाकरे को भी मतदाताओं ने अपने ही अंदाज में आईना दिखा दिया। उनकी पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना मुंबई और नासिक के अलावा किसी अन्य निकाय में बहुत उल्लेखनीय प्रदर्शन नहीं कर सकी है। अत:चुनावी राजनीति के जानकार बिलकुल ठीक कह रहे हैं कि अगर भाजपा और शिवसेना ने मिलकर चुनाव लड़ा होता तो पता नहीं कि उनके विरोधी कहीं टिक भी पाते या नहीं?मतदाताओं ने भी इन दोनों दलों को संकेत दिया है कि इन्हें मिलकर रहना चाहिए।

दरअसल,कुछ नगर निगमों के नतीजे तो इस तरह उलझे हुए हैं कि वहां भाजपा को अपनी परिषद गठित करने के लिए शिवसेना की मदद लेनी ही पड़ेगी। कुछ निगमों में यही उलझन शिवसेना के सामने भी आने वाली है। बेशक, एनसीपी वह ताकत बनकर उभरी है,जो कहीं भाजपा,तो कहीं शिवसेना के साथ जाकर दोनों को बहुमत के जादुई आंकड़े तक पहुंचा सकती है,मगर राजनीतिक नैतिकता उसे अलग-अलग निगमों में अलग-अलग दलों का समर्थन करने से रोकेगी। मतलब,एक नगर निगम में वह भाजपा, तो दूसरे में शिवसेना के साथ नहीं जाएगी और यदि उसने ऐसा किया तो फिर शरद पवार देश के सबसे बड़े अवसरवादी राजनीतिज्ञ माने जाएंगे। यही आरोप भाजपा और शिवसेना पर भी लगेगा। अत:संभव है कि ये दोनों दल वैसी ही समझदारी दिखाएं,जैसी उन्होंने विधानसभा चुनाव के बाद दिखाई थी। वह चुनाव भी इन दोनों ने अलग-अलग लड़ा था,मगर सरकार बनाने के लिए एकजुट हो गए थे। अलबत्ता,इस बार गुत्थी जरा ज्यादा उलझ गई है। चुनाव नतीजे बता रहे हैं कि शिवसेना और भाजपा,दोनों का प्रदर्शन इनके वर्ष-2012के प्रदर्शन से ठीक रहा है। इसलिए दोनों दल एक-दूसरे के साथ आने के लिए आसानी से शायद ही तैयार होंगे। फिर भी इन दोनों के लिए सबक यही है कि ये साथ-साथ रहें,तो इनकी राजनीति के लिए बेहतर होगा,जबकि राज ठाकरे के लिए सबक यह है कि यदि उन्हें राजनीति में कुछ करना है तो सबको साथ लेकर चलना सीखना पड़ेगा। उत्तर भारतीयों के खिलाफ हमलावर रुख अपनाने से सुर्खियां तो बटोरी जा सकती हैं,पर वोट नहीं पाए जा सकते। कांग्रेस की वही समस्या उभरकर सामने आई है, जिससे वह देश के कई राज्यों में जूझ रही है। यह समस्या है,गुटबाजी की। यदि महाराष्ट्र कांग्रेस के नेता एकजुट होते तो पार्टी का प्रदर्शन दयनीय नहीं होता। अत: यह पार्टी भी अपने हिस्से का सबक ग्रहण करे।
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